Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीनित्यानन्द–निष्ठा

Narottama Dāsa Ṭhākura3 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaHarinamBhakti
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निताइ–पद–कमल, कोटिचन्द्र सुशीतल,जे छायाय जगत् जुड़ाय।हेन निताइ बिने भाइ, राधाकृष्ण पाइते नाइ,दृढ़ करि धर निताइयेर पाय॥

से सम्बन्ध नाहि जार, वृथा जन्म गेल ता’र, सेई पशु बड़ दुराचार। निताइ ना बलिल मुखे, मजिल संसार–सुखे, विद्याकुले कि करिबे ता’र॥

अहंकारे मत्त हइञा, निताई–पद पासरिया,असत्येरे सत्य करि मानि।निताइयेर करुणा ह’बे, ब्रजे राधाकृष्ण पा’बे,धर निताइयेर चरण दु’खानि॥

निताइयेर चरण सत्य, ताँहार सेवक नित्य, निताइ–पद सदा कर आश। नरोत्तम बड़ दुःखी, निताइ मोरे कर सुखी, राख रांगा चरणेर पाश॥

श्रीनित्यानन्द प्रभुजीके श्रीचरणकमल तो करोड़ों–करोड़ों चन्द्रमाओंकी शीतलताको भी पराभूत करनेवाले हैं। क्योंकि चन्द्र तो केवल इस जड़ शरीरको ही क्षणभरके लिए शीतल करता है, परन्तु नित्यानन्दप्रभुके श्रीचरणकमल तो त्रितापोंसे दग्धीभूत हो रहे जीवोंके हृदयको चिरकालके लिए सुशीतल कर देते हैं। ऐसे श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किये बिना राधाकृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः हे भाइयो! नित्यानन्दप्रभुके श्रीचरणोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लो अर्थात् दृढ़ विश्वासपूर्वक उनका आश्रय ग्रहण करो। उनसे जिसका सम्बन्ध नहीं हुआ, समझो कि पशु सदृश उस दुराचारीका दुर्लभ मानव जन्म व्यर्थ ही चला गया। जो सांसारिक विषय भोगोंमें प्रमत्त होकर नित्यानन्दप्रभुजीके कल्याणप्रद श्रीनामका कीर्तन नहीं करता है, उच्चकुलमें जन्म तथा जड़ विद्यासे भी उसका कल्याण नहीं होगा। वह तो जड़ीय अहंकारमें प्रमत्त होकर नित्यानन्दप्रभुजीके श्रीचरणकमलोंको भूल गया तथा सांसारिक अनित्य विषयोंको नित्य मानकर उनमें ही रमा हुआ है। अरे भाई! नित्यानन्दप्रभुजीकी करुणा होनेपर ही व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा प्राप्त होती है। अतः उनके श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करो। नित्यानन्दप्रभुजीके चरण सत्य हैं और उनके सेवक भी नित्य हैं अतः उनके चरणोंमें ही सर्वदा आशा करो। यह नरोत्तम बहुत दुःखी होकर प्रार्थना कर रहा है कि हे नित्यानन्द प्रभु! आप मुझे अपने श्रीचरणोंमें आश्रय प्रदानकर सुखी करें। निताइ मोर जीवन–धन, निताइ मोर जाति। निताइ विहने मोर आर नाहि गति॥

संसार–सुखेर मुखे तुले दिव छाइ। नगरे मागिया खाब गाईया निताइ॥

जे–देशे निताइ नाइ, से देशे ना याब। निताइ–विमुख–जनार मुख ना हेरिब॥

गङ्गा जाँर पदजल, हर शिरे धरे। हेन निताइ ना भजिया दुःख पेये मरे॥

लोचन बले मोर निताइ जेबा नाहि माने। अनल भेजाइ ताँर माझ–मुखखाने॥

श्रीनित्यानन्द प्रभु ही मेरे जीवनधन हैं तथा निताइ ही मेरी जाति हैं। उन निताइके बिना मेरी और कोई गति नहीं है। मैं संसारके सुखों पर राख डाल दूँगा अर्थात् समस्त सांसारिक वस्तुओंको त्याग दूँगा। नगर–नगरमें निताइका नाम गाते–गाते माँगकर खाऊँगा। जिस देशमें निताइ नहीं हैं तथा निताइका आदर नहीं है, उस देशमें नहीं जाऊँगा। निताइसे विमुख व्यक्तियोंका मुख भी नहीं देखूँगा। जिस गंगाको शिवजी अपने मस्तक पर धारण करते हैं, वे गंगा भी जिनका चरण–जल है, ऐसे नित्यानन्द प्रभुका भजन नहीं करके लोग दुःख प्राप्त करके मरते हैं। श्रील लोचनदास ठाकुरजी कहते हैं कि मेरे निताइको जो नहीं मानता, मैं उनके मुँहमें आग देता हूँ। अक्रोध परमानन्द नित्यानन्द–राय। अभिमान–शून्य निताइ नगरे बेड़ाय॥

अधमपतित जीवेर द्वारे द्वारे गिया। हरिनाम महामंत्र दिच्छेन बिलाइया॥

जारे देखे ता’रे कहे दन्ते तृण धरि। आमारे किनिया लह, बोलो गौरहरि॥

एत बलि, नित्यानन्द भूमे गडि़, जाय। सोनार पर्वत जेन धूलाते लोटाय॥

हेन अवतारे जार रति ना जन्मिल। लोचन बले सेइ पापी एलो आर गेलो॥

अहो! क्रोधशून्य परमानन्दस्वरूप श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुजी की जय हो, जो अपने भगवत्ताके अभिमानको भी त्यागकर स्वयं नगर–नगरमें भ्रमण कर रहे हैं तथा अधम व पतित जीवोंके घर–घर जाकर उन्हें हरिनाम महामंत्र प्रदान कर रहे हैं। वे जिसे भी देखते हैं, उसीसे अत्यन्त ही दीनतापूर्वक कहते हैं—अरे भाई! तुम मात्र एकबार “गौरहरि” बोलकर मुझे खरीद लो। ऐसा कहते हुए जब वे प्रेममें आविष्ट होकर जमीनपर गिर जाते हैं तथा लोटने लगते हैं तो ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई सोनेका पहाड़ धूलमें लोट रहा हो। श्रीलोचनदास ठाकुर कहते हैं—ऐसे दयालु श्रीनित्यानन्द प्रभुजीके श्रीचरणकमलोंमें जिसकी रति नहीं हुई उसका दुर्लभ मनुष्य जन्म व्यर्थ ही चला गया।

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