Bhajana Gīti
Kirtan

श्रील तीर्थ महाराज-प्रणाम

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition1 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuHarinamBhakti
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नमः ॐ विष्णुपादाय श्रीगौरप्रियमूर्तये।श्रीमते भक्तिवल्लभ-तीर्थ-गोस्वामिनामिने॥
मायावाद विखण्डनं गुरार्वाण्यनुकीर्तनम्।पश्चदेशोपदेशकं प्रसन्नवदनं सदा॥
शुद्ध-भक्ति प्रवाहकं शुद्ध-भक्ति-भगीरथम्।भक्तिदयित माधवाभिन्न तनुं नमाम्यहम्॥
नामसंकीर्तनामृत रसास्वादविधायकम्।कृष्णाम्नायकृपामूर्तिं आचार्यं तं नमाम्यहम्॥
गौर-नाम प्रचारार्थं भक्तसेवानुकांक्षिणम्।सतीर्थ्यप्रीतिसद्भावं नौमि तीर्थ महाशयम्॥ 4॥

कलियुग पावनावतारी भगवान श्रीगौर सुन्दर जी के अत्यन्त प्रियतम् स्वरूप श्रीमद् भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी को मैं नमस्कार करता हूँ। आप मायावाद रूपी असत् शास्त्रों को भक्ति के विशुद्ध सिद्धान्तों द्वारा खण्डन करने वाले हैं। आप हमेशा ही अपने गुरुजी से सुनी दिव्य वाणी का ही अनुकीर्तन करते रहते हैं। पश्चिमी देशों में अर्थात विदेशों में भी आप भगवद्- भक्ति का उपदेश देते रहते हैं, आपका चेहरा हमेशा प्रसन्नता से खिला रहता है। आप शुद्ध-भक्ति की गंगा को प्रवाहित करने वाले हो, हे शुद्ध भक्ति के भगीरथ! आप श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी के ही अभिन्न स्वरूप हो। आपको मेरा नमस्कार है। श्रीहरिनाम-संकीर्तन के द्वारा ही अखिल-रसामृत मूर्ति, नन्द-नन्दन, भगवान श्रीकृष्ण जी के नाम, रूप, गुण, लीला व धाम आदि के अमृत रस का महा-मधुर रसास्वादन करने एवं करवाने वाले, भगवान श्रीकृष्ण की कृपा के मूर्त-स्वरूप व उनकी दिव्य-ज्ञान-परम्परा में स्वयं आचरण करके शिक्षा देने वाले हे आचार्य! आपको मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान श्रीगौरहरि के मधुर रसमय नाम का निरन्तर प्रचार करने से जिनका कोमल हृदय उस दिव्य नाम-रस से लबालब हो गया है, जो हर समय ही भगवान के भक्तों की सेवा करने की आकांक्षा करते रहते हैं तथा अपने गुरु- भाईयों में जिनका बहुत प्यार है, जो अपने प्रत्येक गुरु-भाई के प्रति सद्भाव रखते हैं, ऐसे श्रीभक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज रूपी महापुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ।(4)

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