Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीनित्यानन्द–गुणवर्णन

Locana Dāsa Ṭhākura1 min read
NityanandaBhakti
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निताइ गुणमणि आमार निताइ गुणमणि।आनिया प्रेमेर वन्या भासाइल अवनी॥१॥
प्रेमेर वन्या लइया निताइ आइल गौड़देशे।डुबिल भकतगण दीन हीन भासे॥२॥
दीन हीन पतित पामर नाहि बाछे।ब्रह्मार दुर्लभ प्रेम सबाकारे याचे॥३॥
आबद्ध करुणा–सिन्धु काटिया मुहान।घरे घरे बुले प्रेम–अमियार वान॥४॥
लोचन बले मोर निताइ जेवा ना भजिल।जानिया सुनिया सेइ आत्मघाती हैल॥५॥

गुणोंके भण्डारस्वरूप नित्यानन्दप्रभुजीने प्रेमरूप बाढ़को लाकर उसमें सम्पूर्ण जगतको डुबा दिया। प्रेमकी बाढ़को लेकर वे गौड़ देशमें आए। जिससे भक्त लोग तो उस बाढ़में डूबे ही, परन्तु उनके अतिरिक्त जितने भी दीन–हीन थे, वे भी उस बाढ़में बह गए। दीन–हीन एवं पतितोंकी अयोग्यताका भी विचार न कर ब्रह्माजीके लिए भी दुर्लभ प्रेम सबको वितरण किया। आज तक जो करुणाका सागर आबद्ध था, उसके मुहानेको काटकर घर–घरमें प्रेमामृतकी बाढ़ ला दी। श्रीलोचनदास ठाकुर कहते हैं—मेरे प्रभु श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुजीकी महिमाको जानकर भी जो उनका भजन नहीं करता है, वह तो आत्मघाती ही है।

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