श्रीरूप–सनातन दैन्यमयी प्रार्थना
विषय–वासना मेरे हृदयमें उदित होकर सदैव क्रीड़ा करती रहती है। हाय! मैंने इसे दूर करनेका कितना प्रयास किया, परन्तु फिर भी मेरे मनसे यह विकार नहीं गया। इस विषय–वासनारूपी विकारने मुझे अस्थिर कर दिया है, जिससे मुझे तनिक भी शान्ति नहीं मिल रही है। मैं अत्यन्त पीडि़त हूँ। श्रीरूप गोस्वामीपाद कब अपनी कृपाके द्वारा मुझे युक्त वैराग्य प्रदान कर मेरा उद्धार करेंगे। श्रीसनातन गोस्वामीपाद कब मुझे विषयोंसे छुड़ाकर दयावानकी भाँति श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें समर्पित करेंगे। श्रीजीव गोस्वामीपाद कब मुझे सिद्धान्तोंके समुद्रमें स्नान करायेंगे, जिससे मेरा तार्किक हृदय शीतलता प्राप्त करेगा। श्रीचैतन्य महाप्रभुका नाम सुनकर मेरे शरीरमें रोमाञ्च और पुलकादि होंगे तथा श्रीराधा–कृष्णका लीलामृत पानकर शोकरहित बन जाऊँगा। मैं अतिशय दीन–हीन कंगाल हूँ, मैं अकिंचन बनकर वैष्णवोंके चरणाश्रयकी प्रार्थना करता हूँ।