Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

विषय वासनारूप चित्तेर विकार

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaBhakti
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विषय वासनारूप चित्तेर विकार।आमार हृदये भोग करे अनिवार॥
कत ये यतन आमि करिलाम हाय।ना गेल विकार बुद्धि शेषे प्राण जाय॥
ए घोर विकार मोरे करिल अस्थिर।शान्ति ना पाइल स्थान, अन्तर अधीर॥
श्रीरूप गोस्वामी मोरे कृपा वितरिया।उद्धारिबे कबे युक्तवैराग्य अर्पिया।कबे सनातन मोरे छाड़ाये विषय।नित्यानन्दे समर्पिबे हइया सदय॥
श्रीजीव गोस्वामी कबे सिद्धान्त–सलिले।निवाइबे तर्कानल, चित्त जाहे ज्वले॥
श्रीचैतन्य–नाम शुने उदिबे पुलक।राधा कृष्णामृत–पाने हइब अशोक॥
कांगालेर सुकांगाल दुर्जन ए–जन।वैष्णव–चरणाश्रय याचे अकिञ्चन॥

विषय–वासना मेरे हृदयमें उदित होकर सदैव क्रीड़ा करती रहती है। हाय! मैंने इसे दूर करनेका कितना प्रयास किया, परन्तु फिर भी मेरे मनसे यह विकार नहीं गया। इस विषय–वासनारूपी विकारने मुझे अस्थिर कर दिया है, जिससे मुझे तनिक भी शान्ति नहीं मिल रही है। मैं अत्यन्त पीडि़त हूँ। श्रीरूप गोस्वामीपाद कब अपनी कृपाके द्वारा मुझे युक्त वैराग्य प्रदान कर मेरा उद्धार करेंगे। श्रीसनातन गोस्वामीपाद कब मुझे विषयोंसे छुड़ाकर दयावानकी भाँति श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें समर्पित करेंगे। श्रीजीव गोस्वामीपाद कब मुझे सिद्धान्तोंके समुद्रमें स्नान करायेंगे, जिससे मेरा तार्किक हृदय शीतलता प्राप्त करेगा। श्रीचैतन्य महाप्रभुका नाम सुनकर मेरे शरीरमें रोमाञ्च और पुलकादि होंगे तथा श्रीराधा–कृष्णका लीलामृत पानकर शोकरहित बन जाऊँगा। मैं अतिशय दीन–हीन कंगाल हूँ, मैं अकिंचन बनकर वैष्णवोंके चरणाश्रयकी प्रार्थना करता हूँ।

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