Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

हिन्दी कीर्तन

Locana Dāsa Ṭhākura11 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuHarinamRasa
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गुरु–चरणकमल भज मन।गुरु–कृपा बिना नाहि कोइ साधन–बल,भज मन भज अनुक्षण॥ गुरु॰॥

मिलता नहीं ऐसा दुर्लभ जनम, भ्रमतहूँ चौदह भुवन। किसी को मिलते हैं अहो भाग्य से, हरिभक्तों के दरशन॥ गुरु॰॥

कृष्ण–कृपा की आनन्द मूर्ति,दीनजन करुणा निदान।भक्ति भाव प्रेम तीन प्रकाशत,श्रीगुरु पतित पावन॥ गुरु॰॥
श्रुति स्मृति और पुरानन माहिं,कीनो स्पष्ट प्रमाण।तन मन जीवन, गुरु पदे अर्पण,श्री हरिनाम रटन॥ गुरु॰॥
गुरुदेव कृपा करके मुझको अपना लेना।मैं शरण पड़ा तेरी, चरणोंमें जगह देना॥
करुणानिधि नाम तेरा, करुणा बरसाओ तुम।सोये हुए भाग्यको, हे नाथ जगाओ तुम।मेरी नाव भँवर डोले, उसे पार लगा देना॥

तुम सुखके सागर हो, भक्तिके सहारे हो। मेरे मनमें समाये हो, मुझे प्राणोंसे प्यारे हो। नित माला जपूँ तेरी, मेरे दोष भुला देना॥

मैं सन्तोंका सेवक हूँ, गुरु चरणोंका दास हूँ। नहीं नाथ भुलाना मुझे, इस जगमें अकेला हूँ॥

तेरे द्वारका भिखारी हूँ, नहीं दिलसे भुला देना॥
जय माधव मदनमुरारी, राधेश्याम श्यामाश्याम।जय केशव कलिमलहारी, राधेश्याम श्यामाश्याम॥
सुन्दर कुण्डल नयन विशाला, गल सोहे वैजयन्तीमाला।या छबिकी बलिहारी॥ राधेश्याम॰कबहुँ लूट लूट दधि खायो, कबहूँ मधुवन रास रचायो।नृत्यति विपिनबिहारी॥ राधेश्याम॰ग्वालबाल सङ्ग धेनु चराई, वन वन भ्रमत फिरे यदुराई।काँधे कामर कारी॥ राधेश्याम॰चुरा चुरा नवनीत जो खायो, ब्रज–वनितन पै नाम धरायो।माखन चोर मुरारी॥ राधेश्याम॰एकदिन मान इन्द्र को मार्यो, नख ऊपर गोवर्धन धार्यो।नाम पड्यो गिरिधारी॥ राधेश्याम॰दुर्योधनको भोग न खायो, रूखो साग बिदुर घर खायो।ऐसे प्रेम–पुजारी॥ राधेश्याम॰करुणा कर द्रौपदी पुकारी, पटमें लिपट गये बनवारी।निरख रहे नर नारी॥ राधेश्याम॰भक्त भक्त सब तुमने तारे, बिना भक्ति हम ठाड़े द्वारे।लीजो खबर हमारी॥ राधेश्याम॰अर्जुनके रथ हाँकन हारे, गीताके उपदेश तुम्हारे।चक्र–सुदर्शनधारी॥ राधेश्याम॰जय गोविन्द, जय गोपाल, केशव, माधव, दीनदयाल।श्यामसुन्दर कन्हैयालाल, गिरिवरधारी नन्ददुलाल॥
अच्युत, केशव, श्रीधर माधव, गोपाल गोविन्द, हरि।यमुना पुलिनमें वंशी बजावे, नटवर वेशधारी॥
ब्रज–जन मन सुखकारी।राधे–श्याम श्यामा श्याम॥
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, गल वैजयन्ती माल।चरणन नूपुर रसाल॥ राधे॰॥
सुन्दर वदन कमल दल लोचन, बाँकी चितवनहारी।मोहन बंशीविहारी॥ राधे॰॥
वृन्दावनमें धेनु चरावे, गोपीजन मनहारी।श्रीगोवर्धन धारी॥ राधे॰॥
राधा–कृष्ण मिलि अब दोऊ, गौर रूप अवतारी।कीर्तन धर्म प्रचारी॥ राधे॰॥
तुम बिन मेरे और न कोई, नाम रूप अवतारी।चरणनमें बलिहारी,नारायण बलिहारी॥ राधे॰॥
भज गोविन्द, भज गोविन्द, भज गोविन्द का नाम रे।गोविन्दके नाम बिना, तेरे कोई न आवे काम रे॥
ये जीवन है सुख दुःखका मेला,दुनियादारी स्वप्नका खेला।जाना तुझको पड़ेगा अकेला,भज ले हरिका नाम रे॥

गोविन्दकी महिमा गाके, प्रेमके उस पर फाग लगाके। जीवन अपना सफल बना ले, चल ईश्वरके धाम रे॥

सुन्दर लाला शचीर–दुलाला, नाचत श्रीहरि–कीर्तन में। भाले चन्दन तिलक मनोहर, अलका शोभे कपोलन में॥

शिरे चूडा दरश निराले, वन फुलमाला हिया पर डोले। पहिरन पीत–पटाम्बर शोभे, नूपुर रुणुझुनु चरणन में॥

कोई गावत राधा–कृष्णनाम, कोई गावत है हरिगुण गान। मृदङ्ग ताल–मधुर रसाल, कोई गावत है रङ्ग में॥

सुन्दर लाला शचीर दुलाला, नाचत श्रीहरि–कीर्तन में। बसो मेरे नयनन में नन्दलाल। मोहनी मूरति, श्यामरी सूरति, नयना बने विशाल॥

अधर सुधारस, मुरली बाजत, उर वैजन्तीमाल।क्षुद्र घन्टिका कटितट शोभित, नूपुर शब्द रसाल॥
मीरा प्रभु सन्तन सुखदायी, भकत–वत्सल गोपाल॥
पार करेंगे नैया रे, भज कृष्ण कन्हैया,कृष्ण कन्हैया दाऊजी के भैया।कृष्ण कन्हैया बंशी बजैया,माखन चुरैया रे, भज कृष्ण कन्हैया॥
कृष्ण कन्हैया गिरिवर उठैया,कृष्ण कन्हैया रास रचैया।पार करेंगे नैया रे भज कृष्ण कन्हैया॥
मित्र सुदामा तण्डुल लाए,गले लगा प्रभु भोग लगाये।कहाँ कहाँ कह भैया रे, भज कृष्ण कन्हैया॥
अर्जुन का रथ रण में हाँका,श्यामलिया गिरिधारी बाँका।कालीनाग नथैया रे, भज कृष्ण कन्हैया॥
द्रुपत–सुता जब दुष्टन घेरी,राखी लाज न कीनी देरी।आगये चीर बढैया रे, भज कृष्ण कन्हैया॥

अब तो हरिनाम लौ लागी। सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी॥

कित छोड़ी वह मोहन मुरली, कित छोड़ी सब गोपी।मूँड़ मुड़ाई डोरि कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी॥
मात यशोमति माखन कारण, बाँधे जाके पाँव।श्यामकिशोर भयो नव गोरा, चैतन्य जाको नाम॥

पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसे। गौर–कृष्ण की दासी मीरा, रसना कृष्ण बसे॥

मदन गोपाल शरण तेरी आयो।चरण कमल की सेवा दीजो,चेरो करि राखो घर जायो॥
धन्य धन्य मात पिता सुत बन्धू,धन्य जननी जिन गोद खिलायो।धन्य धन्य चरण चलत तीर्थ को,धन्य गुरु जिन हरिनाम सुनायो॥
जे नर विमुख भये गोविन्द सों,जन्म अनेक महादुःख पायो।‘श्रीभट्ट’ के प्रभु दियो अभय–पद,यम डरप्यो जब दास कहायो॥
हमारे ब्रज के रखवाले, कन्हैया राधिकारानी।कन्हैया राधिकारानी, कन्हैया राधिकारानी॥

हमारे नयनों के तारे, कन्हैया राधिकारानी। सहारा बे–सहारों के, कन्हैया राधिकारानी॥

आली! म्हांने लागे वृन्दावन नीको,घर घर तुलसी, ठाकुर पूजा, दर्शन गोविन्दजी को।आली! म्हांने लागे बृन्दावन नीको॥

निर्मल नीर बहत यमुना को, भोजन दूध दही को। आली! म्हांने लागे बृन्दावन नीको॥

रत्न सिंहासन आप विराजे, मुकुट धर्यो तुलसी को।आली! म्हांने लागे बृन्दावन नीको॥
कुञ्जन कुञ्जन रहत राधिका, शब्द सुनत मुरली को।आली! म्हांने लागे बृन्दावन नीको॥
मीरा के प्रभु गिरिधरनागर, भजन बिना नर फीको।आली! म्हांने लागे बृन्दावन नीको॥
जय मोर मुकुट पीताम्बरधारी।जय मुरलीधर गोवर्धनधारी॥
श्रीराधावर कुञ्जबिहारी, मुरलीधर गोवर्धनधारी।जय यशोदानन्दन कृष्ण मुरारी, मुरलीधर गोवर्धनधारी॥
जय गोपीजनवल्लभ वंशीबिहारी, मुरलीधर गोवर्धनधारी॥
अच्युतं, केशवं, राम, नारायणं,कृष्णं दामोदरं, वासुदेवं भजे।श्रीधरं, माधवं, गोपिका–वल्लभं,जानकी नायकं रामचन्द्रं भजे।राधिका नायकं कृष्णचन्द्रं भजे॥

छाँडि़ मन, हरि–विमुखन को संग। जिनके सङ्ग कुबुधि उपजति हैं, परत भजनमें भंग॥

कहा होत पय पान कराये, विष नहिं तजत भुजंग।कागहि कहा कपूर चुगाये, स्वान न्हवाये गंग॥
खरको कहा अरगजा–लेपन, मरकट भूषन अंग।गजको कहा न्हवाये सरिता, बहुरि घरै खहि छंग॥
पाहन पतित बाँस नहीं बेधत, रीतो करत निषंग।सूरदास खल कारी कामरि, चढ़त न दूजो रंग॥

मैं तो रटूँगी राधा नाम, ब्रज की गलियन में। खोई रहूँ आठों याम, ब्रज की गलियन में॥

इत उत डोलूँ कह–कह राधा, मिट जाये जीवन की व्याधा। और मिल जाये घनश्याम, ब्रज की गलियन में॥१॥

उलझ–उलझ ब्रज करीलन में, सेवाकुञ्ज में या निधुवन में। हो जाय जीवन की शाम, ब्रज की गलियन में॥२॥

अब तो चाह यही सखि मन की, धूल मिले हरि चरणन की। और निकले तन सों प्राण, ब्रज की गलियन में॥३॥

कहीं मिल जाये घनश्याम, ब्रज की गलियन में। मैं तो रटूँगी राधा नाम, ब्रज की गलियन में॥

हरिसे बड़ा हरिका नाम, प्रभुसे बड़ा प्रभुका नाम।अन्तमें निकला ये परिणाम।सुमिरो नाम रूप बिन देखे, कौड़ी लगे न दाम॥
नामके बाँधे खिंच आयेंगे, आखिर एक दिन श्याम।द्रौपदीने जब नाम पुकारा, झट आ गए घनश्याम॥
साड़ी खैंचत हारा दुःशासन, साड़ी बढ़ाई श्याम।जल डूबत गजराज पुकारो, आये आधे नाम॥

नामीको चिन्ता रहती है, नाम न हो बदनाम। जिस सागरको लांघ सके ना, बिना पुलके राम॥

कूद गए हनुमान उसीको, लेके हरिका नाम। वो दिल वाले डूब जायेंगे, जिनमें नहीं है नाम॥

वो पत्थर भी तेरेंगे जिन पर, लिखा रामका नाम। हरिसे बड़ा हरिका नाम, प्रभुसे बड़ा प्रभुका नाम॥

हे कृष्ण हे यादव हे सखेति, गोविन्द दामोदर माधवेति।डारि मथानी दधिमें किसीने, तब ध्यान आयो दधि चोरका ही॥
गद–गद कंठ पुकारती है, गोविन्द दामोदर माधवेति।हे कृष्ण हे यादव हे सखेति, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

है लीपती आँगन नारि कोई, गोविन्द आवे मम् गृह खेले। ध्यानस्थमें यही पद गा रही है, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

माता यशोदा हरिको जगावे, जागो उठो मोहन नैन खोलो। द्वारे खड़े ग्वाल बुला रहे हैं, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

विद्यानुरागी निज पुस्तकोंमें, अर्थानुरागी धन संचयोंमें। ये ही निराली ध्वनि गा रहे हैं, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

ले के करोंमें दोहनि अनोखी, गौ दुग्ध काढ़े अवला नवेली। गौ दुग्ध धारा संग गा रही है, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

जागे पुजारी हरि मन्दिरोंमें, जाके जगावें हरिको सबेरे।हे क्षीरसिन्धु अब नेत्र खोलो, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

सोया किसीका सुत पालनेमें, डोरी करों से जब खेंचती है। हो प्रेम मग्ना उसने पुकारा, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

रोया किसीका सुत पालनेमें, हो प्रेम मग्ना उसने पुकारा।रोवो न गावो प्रभु संग मेरे, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
कोई नवेली पतिको जगावे, प्राणेश जागो अब नींद त्यागो।बेला यही है हरि गीत गावो, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जय राधे जय राधे राधे, जय राधे जय श्रीराधे।जय कृष्ण जय कृष्ण कृष्ण, जय कृष्ण जय श्रीकृष्ण॥
श्यामा गौरी नित्यकिशोरी, प्रीतमजोरी श्रीराधे।रसिक रसीलो छैलछबीलो, गनगरवीलो श्रीकृष्ण॥
रासविहारिनि रसविस्तारिनि पियउर धारिनि श्रीराधे।नव–नवरंगी नवलत्रिभङ्गी, श्यामसुअङ्गी श्रीकृष्ण॥
प्राणपियारी रूपउजारी, अतिसुकुमारी, श्रीराधे।नैन मनोहर महामोदकर, सुन्दरवरतर श्रीकृष्ण॥
शोभाश्रेनी मोहामैनी, कोकिलवैनी श्रीराधे।कीरतिवन्ता कामिनिकन्ता, श्रीभगवन्ता, श्रीकृष्ण॥
चन्दावदनी कुन्दारदनी, शोभासदनी श्रीराधे।परम उदारा प्रभा अपारा, अतिसुकुमारा श्रीकृष्ण॥
हंसागमनी राजतरमनी, क्रीड़ा कमनी श्रीराधे।रूपरसाला नयनविशाला, परमकृपाला श्रीकृष्ण॥
कंचनवेली रतिरसरेली, अति अलबेली श्रीराधे।सब सुख सागर सब गुनआगर रूप उजागर श्रीकृष्ण॥
रमणीरम्या तरुतरतम्या, गुण अगम्या श्रीराधे।धामनिवासी प्रभाप्रकाशी, सहज सुहासी श्रीकृष्ण॥
शक्त्याह्लादिनि अतिप्रियवादिनि, उरउन्मादिनि श्रीराधे।अङ्ग–अङ्ग टोना सरससलोना, सुभगसुठोना श्रीकृष्ण॥
राधानामिनि गुणअभिरामिनि श्रीहरिप्रियास्वामिनी श्रीराधे।हरे हरे हरि हरे हरे हरि, हरे हरे हरि श्रीकृष्ण॥
निसिदिन बरसत नैन हमारे।सदा रहत पावस ऋतु हमपर, जबतें स्याम सिधारे॥
अञ्जन थिर न रहत अंखियनमें, कर कपोल भये कारे।कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे॥
आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे।सूरदास अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे॥
प्रबल प्रेमके पाले पड़कर, हरिका नियम बदलते देखा।जिनकी केवल कृपादृष्टिसे, सभी सृष्टिको पलते देखा।उनको गोकुलके गोरस पर, सौ सौ बार मचलते देखा॥

जिनके चरण–कमल कमलाके, करतल से न टलते देखा। उनको ब्रज करील कुञ्जनमें, कंटक पद पर चलते देखा॥

जिनका ध्यान शुक–सनकादि से, न सम्भलते देखा।उनको–ग्वालबाल सङ्गमें, लेकर गेंद उछलते देखा॥
मो सम कौन कुटिल खल कामी।जिन तनु दियो ताहि विसरायो, ऐसौ नमक–हरामी॥१॥
भरि भरि उदर विषयकों धायो, जैसे सूकर–ग्रामी।हरिजन छाँडि़ हरि बिमुखनकी, निसदिन करत गुलामी॥२॥
पापी कौन बड़ो जग मोते, सब पतितनमें नामी।सूर पतित कौ ठौर कहाँ है, तुम बिन श्रीपति स्वामी॥३॥
ले लो रे कोई कृष्ण का प्यारा, आवाज लगाऊँ गली–गली,कृष्ण नाम के हीरे मोती, मैं बिखराऊँ गली–गली॥

जिन–जिनने यह मोती लूटे, वे सब मालामाल हुए, मायाके जो बने पुजारी, एक दिन वो कंगाल हुए। सोना–चाँदी मायाबालो, मैं समझाऊँ गली–गली॥१॥

दौलतके दीवानों सुनलो, एक दिन ऐसा आयेगा,धन, दौलत और माल खजाना, यहीं पड़ा रह जायेगा।कञ्चन काया मिट्टी होगी, चर्चा होगी गली–गली॥२॥

कैसे–कैसे हरि भक्तोंने उस प्रभुको अपनाया है, ईश्वर भी कैसे उन भक्तोंके मन भाया है। तुलसी, मीरा और नरसीका, ज्ञान सुनाऊँ गली–गली॥३॥

अर्जुनको जब मोहने घेरा, प्रभुने संशय दूर किया,ज्ञान धर्मकी ज्योति जलाकर, गीताका उपदेश दिया।गीता–रामायण वेदोंका, सार सुनाऊँ गली–गली॥४॥

पायो जी म्हे तो कृष्ण रतन धन पायो। वस्तु अमोक दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥

जनम जनमकी पूँजी पाई, जगमें सभी खोवायो।खरचै न कोई चोर न लेवै, दिन–दिन बढ़त सवायो॥
सतकी नाव खैवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।मीराके प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस गायो॥
अब आई बसंत बहार, चलो सखी कुँजनमें वृन्दावनमें।पिय प्यारे के संगमें प्यारी, याकी जोरी पै जाऊँ बलिहारी।गलमें बहियाँ गलेमें डारि, चलो सखी कुँजनमें वृन्दावनमें॥
कोई पायल ठुमक बजावें, सुर भरि–भरिके राग सुनावें।अब मन्दी–मन्दी पड़त फुहार, चलो सखी कुँजनमें वृन्दावनमें॥
चले शीतल पवन सुखदाई, चहुँ ओर हरियाली छाई।अब ठंडी–ठंडी चलत बयार, चलो सखी कुँजनमें वृन्दावनमें॥
झूला डारो कदमकी डारि, यापे झूलें वृषभानु दुलारी।सब सखियाँ गाँवें मलार, चलो सखी कुँजनमें वृन्दावनमें॥
याकि झांकि मुनिन मन मोहे, याकि उपमा कहे सबको हैं।जाऊँ बालकृष्ण बलिहार, चलो सखी कुँजनमें वृन्दावनमें॥
अब आई बसंत बहार, चलो सभी कुँजनमें वृन्दावनमें॥
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे।कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे॥१॥
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण रक्ष माम्।कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पाहि माम्॥२॥
राम राघव राम राघव राम राघव रक्ष माम्।कृष्ण केशव कृष्ण केशव कृष्ण केशव पाहि माम्॥३॥

मैंने रटना लगाई रे राधा नाम की। मेरी पलकोंमें राधा, मेरी अलकोंमें राधा। मैंने माँग भराई रे राधा नाम की॥१॥

मेरे नैनोंमें राधा, मेरे बैनोंमें राधा।मैंने बैनी गुथाई रे, राधा नाम की॥२॥
मेरी दुलरीमें राधा, मेरी चुनरीमें राधा।मैंने नथनी सजाई रे, राधा नाम की॥३॥
मेरे चलनेमें राधा, मेरे हलनेमें राधा।कटि किंकणी बजाई रे, राधा नाम की॥४॥
मेरेदाँये बांये राधा, मेरे आगे पीछे राधा।रोम–रोम रस छाई रे, राधा नाम की॥५॥
मेरे अंग–अंग राधा, मेरे संग–संग राधा।‘गोपाल’ बंशी बजाई रे, राधा नाम की॥६॥
राधे झूलन पधारो झुक आये बदरा।झुक आये बदरा घिर आये बदरा॥
ऐसो मान नहीं कीजे, हठ छोड़ो री अली।तुम तो परम सयानी वृषभानुकी लली॥
साजो सोलह शृंगार, डारो नैनन कजरा।पहरो पंचरंग साड़ी ओढ़ो श्याम चदरा॥
तेरो रसिक प्रीतम, मग जोहत खड़ो।राधे जहाँ पग धारो श्याम नैना धरो॥
डारी रेशम डोरी जापै झूले राधा गोरी।जाकी बैयाँ गोरी गोरी पहरे हाथन गजरा॥
झूला झूले राधादामोदर वृन्दावनमें।कैसी छाई हरियाली आली कुंजनमें॥
इत नन्दको दुलारो, उत भानुकी दुलारी।जोरी लागे अति प्यारी बसि नयननमें॥
जमुनाके कूल, पहिर सुरंग दुकूल।तैसे खिल रहे फूल इन कदमनमें॥
गौर श्याम रंग, घन दामिनीके संग।भई अखियाँ अपंग छवि भरी मनमें॥
राधा मुख और, नैन श्यामके चकोर।सखियन प्रेम डोर लगी चरणनमें॥

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