Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीश्रीकेशवाचार्याष्टकम्

Śrīla Bhakti Vedānta Trivikrama Mahārāja1 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuBhakti
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नमो ऊँविष्णुपादाय आचार्य–सिंह–रूपिणे।श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान–केशव इति नामिने॥१॥
श्रीसरस्वत्यभीष्सितं सर्वथा सुष्ठु–पालिने।श्रीसरस्वत्यभिन्नाय पतितोद्धार–कारिणे॥२॥
वज्रादपि कठोराय चापसिद्धान्त नाशिने।सत्यस्यार्थे निर्भीकाय कुसंग–परिहारिणे॥३॥
अतिमर्त्य–चरित्राय स्वाश्रितानाञ्च पालिने।जीव–दुःखे सदार्त्ताय श्रीनाम–प्रेम–दायिने॥४॥
विष्णुपाद–प्रकाशाय कृष्ण–कामैक–चारिणे।गौर–चिन्ता–निमग्नाय श्रीगुरुं हृदि धारिणे॥५॥

ॐ विष्णुपाद श्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव नामक आचार्य–केशरीको मैं नमस्कार करता हूँ॥१॥

जो (जगद्गुरु) आचार्य श्रील सरस्वती प्रभुपादके अभीप्सित अथवा मनोभीष्टका सर्वतोभावेन भलीभाँति पालन करने वाले हैं एवं जो पतित–उद्धारके कार्यमें उन्हीं सरस्वती ठाकुरसे अभिन्न हैं, उन्हें नमस्कार है॥२॥

जो अपसिद्धान्तको ध्वंस करने, दुःसंग दूर करने तथा सत्यका स्थापन करनेमें निर्भीक और वज्रकी अपेक्षा भी कठोर हैं, उन्हें नमस्कार है॥३॥

जो अतिमर्त्य (अप्राकृत) चरित्रविशिष्ट हैं, जो अपने आश्रितजनोंके पालनकर्ता हैं, जो जीवोंके दुःखसे दुःखी है तथा जो नाम–प्रेम प्रदान करनेवाले हैं, उनको नमस्कार है॥४॥

जो साज्ञात् श्रीविष्णुपादपद्मके प्रकाशस्वरूप हैं, जो केवल कृष्ण–कामनाकी पूर्तिमें ही लगे रहते हैं, जो चैतन्य महाप्रभुकी चिन्तामें निमग्न हैं तथा जिन्होंने अपने श्रीगुरुदेवको सर्वदा हृदयमें धारण कर रखा है, उन्हें नमस्कार है॥५॥

विश्वं विष्णुमयमिति स्निग्ध–दर्शन–शालिने।नमस्ते गुरु–देवाय कृष्ण–वैभव–रूपिणे॥६॥
श्रीश्रीगौड़ीय–वेदान्त–समितेः स्थापकाय च।श्रीश्रीमायापुर–धाम्नः सेवा–समृद्धि–कारिणे॥७॥
नवद्वीप–परिक्रमा येनैव रक्षिता सदा।दीनं प्रति दयालवे तस्मै श्रीगुरवे नमः॥८॥
देहि मे तव शक्तिस्तु दीनेनेयं सुयाचिता।तव पाद–सरोजेभ्यो मतिरस्तु प्रधाविता॥९॥

जो विश्वका विष्णुमय दर्शन करते हैं। ऐसे स्निग्ध दर्शनसे युक्त, कृष्ण–वैभवरुपी श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥६॥

जो श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति के संस्थापक हैं, एवं (श्रीगौर–जन्मस्थान) श्रीश्रीमायापुर धामकी सेवाको समृद्ध करने वाले हैं, उनको नमस्कार है॥७॥

जिनके द्वारा श्रीधाम नवद्वीप–परिक्रमा सदा रक्षित है एवं जो दीनजनोंके प्रति दयालु हैं, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥८॥

हे गुरुदेव! यह दीन व्यक्ति सब प्रकारसे आपके शक्तिकी (कृपाकी) कामना करता है, उसे मुझे दान करें। आपके पाद–पद्मोंमें मेरी मति लगी रहे॥९॥

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