श्रील प्रभुपादकी आरती
योगपीठ मायापुरकी नित्य सेवा प्रदान करनेवाली श्रील श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपादकी आरति जययुक्त हो! जययुक्त हो!॥१॥
धूपकी मनोहर सुगन्धकी भाँति, उनका प्रचार सर्वत्र फैल रहा है, जो समस्त भक्तों, बद्ध एवं मुक्त, स्थावर और जंगम सभी जीवोंको मुग्ध कर रहा है अर्थात् उस प्रचाररूप धूपकी वाणीरूप सुगन्ध सर्वत्र ही सबको मुग्ध कर रही है॥२॥
उन्होंने (प्रभुपादने) जगतमें भक्तिसिद्धान्तरूपी दीपक प्रज्ज्वलित किया, जिसमें पाँच शिखाएँ पाँच रसों द्वारा (शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य एवं मधुर) भगवानकी सेवाका प्रतीक है॥३॥
ये पाँचों शिखाएँ ही पाँच महाज्योति सदृश पाँच रसोंकी प्रतीक है, जो तीनों लोकोंके अज्ञानरूप अन्धकारको नाश करती हैं॥४॥
श्रील भक्तिविनोद धारा (श्रीरूपानुग विचारधारा) ही वह शंख– जलकी धारा है, जो आजतक इस जगतमें अविच्छिन्न गतिसे प्रवाहित हो रही है॥५॥
करताल, घण्टा एवं अन्य वाद्य यन्त्रोंसे कृष्ण–कीर्तन निरन्तर हो रहा है, मुद्रण यन्त्र ही बृहत्–मृदंगके रूपमें (बजकर) शास्त्रवाणीको सर्वत्र पहुँचाकर परम रसका वितरण कर रहा है॥६॥
उनके विशाल ललाटमें तिलक सुशोभित हो रहा है तथा गलेमें तुलसीमाला झलमल–झलमल कर रही है॥७॥
उनकी आजानुलम्बित भुजाएँ, दीर्घ कलेवर तथा तपे हुए सोनेकी भाँति अंगकान्ति अत्यन्त ही सुन्दर है॥८॥
उनके लावण्ययुक्त श्रीमुखपर स्नेहभरी मधुर मुस्कान तथा अंगकान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रही है॥९॥
उन्होंने संन्यासधर्म ग्रहणकर अरुण (गेरुए) वस्त्र धारण कर ‘गौड़ीय वैष्णव जगतको’ नाना प्रकारके अपसिद्धान्तरूपी मेघोंसे मुक्त किया अर्थात् नाना प्रकारके अपसिद्धान्तोंका खण्डनकर शुद्ध भक्तिकी स्थापना की॥१०॥
इन्होंने अनेकों कुञ्जरूपी मन्दिर स्थापित किए जिनमें एक–एक भक्त भक्ति–पुष्पसदृश हैं, जिनके असाधारण गुणोंसे सारा विश्व ही मोहित हो गया॥११॥
पदकर्ता कह रहे हैं—सेवाके आदर्शस्वरूप नरहरि प्रभु श्रील प्रभुपादको चामर ढुला रहे हैं तथा मैं (केशव) आनन्दपूर्वक उनकी आरति गा रहा हूँ॥१२॥
मंगलारति मंगल श्रीगुरु–गौर मंगल मूरति। मंगल श्रीराधाकृष्ण–युगल–पीरिति॥१॥
मंगल निशान्त लीला मंगल उदये। मंगल आरति जागे भकत हृदये॥२॥
तोमार निद्राय जीव निद्रित धराय। तव जागरणे विश्व जागरित हय॥३॥
शुभ दृष्टि कर प्रभु जगतेर प्रति। जागुक हृदये मोर सुमंगला रति॥४॥
मयूर–शुकादि सारि कत पिकराज। मंगल जागर–हेतु करिछे विराज॥५॥
सुमधुर ध्वनि करे जत शाखीगण। मंगल श्रवणे बाजे मधुर कूजन॥६॥
कुसुमित सरोवरे कमल–हिल्लोल। मंगल सौरभ बहे पवन कल्लोल॥७॥
झाँझर काँसर घण्टा शङ्ख करताल। मंगल मृदङ्ग बाजे परम रसाल॥८॥
मंगल आरति करे भकतेर गण। अभागा केशव करे नाम–संकीर्त्तन॥९॥
“श्रीकृष्णचैतन्य प्रभुनित्यानन्द। श्रीअद्वैतगदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”
श्रीगुरुदेव एवं श्रीगौरसुन्दरके मंगलमय विग्रह जययुक्त हों, श्रीराधाकृष्ण युगलकी मंगलमय प्रीति जययुक्त हो॥१॥
मंगलमय निशान्त लीला जययुक्त हो जो कि रात्रिके अन्त एवं श्रीराधाकृष्ण युगलके मंगलमय जागरणकी उद्घोषक है एवं जो सबका मंगल करती है। भक्तोंके हृदयमें स्फूर्त होनेवाली वह मंगल आरति जययुक्त हो॥२॥
हे प्रभो! जब तक आप उपेक्षा करेंगे तब तक इस जगतके जीव अज्ञानरूपी अन्धकारमें सोते रहेंगे परन्तु आपकी कृपा होते ही जगतके समस्त जीव अपने नित्य धर्मके प्रति जागरूक हो जायेंगे॥३॥
अतः आप जगतके प्रति शुभदृष्टि कीजिए जिससे कि मेरे हृदयमें भी आपके चरणोंके प्रति सुमंगल रति जागे॥४॥
मयूर, शुक, सारि तथा कोयल आदि नाना प्रकारके पक्षी गान द्वारा आपके मंगलमय जागरण हेतु ही विराजमान हैं॥५॥
वृक्षोंकी शाखाओंपर स्थित समस्त पक्षीगण प्रभात बेलाके उपयुक्त सुमधुर ध्वनि कर रहे हैं, जो कि पूरे वनमें कूजित हो रही हैं। ये मधुर, मंगलमय ध्वनि सर्वत्र सबका कल्याण कर रही है॥६॥
नाना प्रकारके फूलोंवाले सरोवरके बीच खिले हुए कमलके फूल हिल रहे हैं। मन्द गतिसे प्रवाहित होनेवाली पवन उन खिले हुए कमलपुष्पोंकी मंगलमय सुगन्धको धारणकर सर्वत्र वितरण कर रही है तथा सभीको आनन्दित एवं प्रफुल्लित कर रही है॥७॥
झाँझर, काँसर, घण्टा, शंख, करताल एवं मंगलमय मृदंग आदि वाद्ययन्त्र तालमें अत्यन्त ही सुन्दर ढंगसे बजकर परम रसका वर्धन कर रहे हैं॥८॥
पदकर्त्ता श्रील भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज दीनतापूर्वक कह रहे हैं—सभी भक्त आरती कर रहे हैं और मैं अभागा हरिनाम संकीर्तन कर रहा हूँ॥९॥