श्रीगुरुदेवकी आरती
श्रीगुरुदेवकी जय हो! जिनका नाम श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी है। उनका रूप सबको मोहित करनेवाला है एवं वे सबके दुःख–कष्टोंको दूर करनेवाले हैं अर्थात् जीवोंकी भगवद् बहिर्मुखता ही उनके समस्त प्रकारके कष्टोंका मूल कारण है, उनके इसी बहिर्मुखताको दूरकर वे उन्हें भगवानकी ओर मोड़ देते हैं। वे साक्षात् वेदान्तके मूर्तिमान स्वरूप हैं। इसलिए उन्होंने घोषणा की कि “वेदान्त” भक्तिग्रन्थ है अर्थात् वेदान्तका प्रतिपाद्य विषय भक्ति ही है। उन्होंने इस जगतमें “वेदान्त समिति” रूपी दीपक प्रज्ज्वलित किया। शास्त्र सिद्धान्त ही उस दीपककी ज्योति है, ऐसे “भक्तिवेदान्त समिति” रूपी दीपकद्वारा सारे विश्वमें सदैव उनकी आरति हो रही है, जो श्रीभक्तिविनोदधारा रूपी तेलसे भरा हुआ है अर्थात् वेदान्त समितिरूपी दीपक श्रीभक्तिविनोद ठाकुरकी विचारधारारूपी तेलसे युक्त है। जिस प्रकार दीपकका आश्रय तेल होता है, उसी प्रकार “वेदान्त समिति” रूपी दीपक भी श्रीभक्तिविनोद ठाकुरकी विचारधारापर आश्रित है। उन्होंने श्रीरूपगोस्वामीके विचारोंको प्रचारकर दसों दिशाओंको धन्यकर दिया। वे समस्त शास्त्रोंमें पारंगत, करुणामय एवं उनका हृदय मक्खनके समान कोमल है। उनका श्रीअंग कमलके समान अत्यन्त ही सुन्दर है। उनके श्रीअंगकी कान्ति सोनेकी उज्ज्वलताको भी पराभूत करने वाली है। उन्होंने जगतवासियोंके कल्याणके लिए संन्यास वेष धारण किया। उनके प्रिय सज्जन सेवक (श्रीभक्तिवेदान्त वामन महाराज) नाना प्रकारके भावोंसे चामर डुला रहे हैं तथा गौरनारायण (श्रीभक्तिवेदान्त नारायण महाराज) अत्यन्त ही सुमधुर उच्चकंठसे उनकी महिमाका गान कर रहे हैं। पदकर्त्ता श्रीभक्तिवेदान्त त्रिविक्रम महाराजजी दीनतापूर्वक कह रहे हैं—सभी भक्तलोग उनकी आरति कर रहे हैं, परन्तु मैं दुर्मति दूरसे ही उनकी श्रीआरति दर्शन कर रहा हूँ।