शुद्ध भक्तोंकी चरणरज ही भजनके अनुकूल है। भक्तोंकी सेवा ही परमसिद्धि है तथा प्रेमरूपी लताका मूल (जड़) है। माधव तिथि (एकादशी) भक्तिको भी जन्म देने वाली है तथा इसमें कृष्णका निवास है, ऐसा जानकर परम आदरपूर्वक इसको वरणकर यत्नपूर्वक पालन करता हूँ। मेरे गौरसुन्दरने जिन–जिन स्थानोंमें आनन्दपूर्वक भ्रमण किया; मैं भी प्रेमी भक्तोंके साथ उन सब स्थानोंका दर्शन करूँगा। मृदङ्गकी मधुर ध्वनिको सुननेके लिए मेरा मन सर्वदा लालायित रहता है तथा श्रीगौरसुन्दरसे सम्बन्धित कीर्तनोंको सुनकर आनन्दसे भरकर मेरा हृदय नाचने लगता है। युगल मूर्त्तिका दर्शनकर मुझे परम आनन्द प्राप्त होता है। महाप्रसादका सेवन करनेसे मायाको भी जय किया जा सकता है। जिस दिन घरमें भजन–कीर्तन होता है, उस दिन घर साक्षात् गोलोक हो जाता है। श्रीभगवानका चरणामृत और श्रीगंगाजीका दर्शनकर तो सुखकी सीमा ही नहीं रहती तथा माधवप्रिया तुलसीजीका दर्शनकर त्रितापोंसे दग्ध हुआ हृदय सुशीतल हो जाता है। गौरसुन्दरके प्रिय सागका आस्वादन करनेमें ही मैं जीवनकी सार्थकता मानता हूँ। कृष्णभजनके अनुकूल जीवननिर्वाहके लिए जो कुछ पाता है, यह भक्तिविनोद प्रतिदिन उसे सुखपूर्वक ग्रहण करता है। सिद्ध देहमें—कृष्णभजनका उद्दीपन राधाकुण्डतट – कुञ्जकुटीर। गोवर्धन–पर्वत, यामुनतीर॥
कुसुमसरोवर, मानसगंगा। कलिन्द–नन्दिनी, विपुल तरंगा॥
वंशीवट, गोकुल, धीरसमीर। वृन्दावन – तरुलतिका – वानीर॥
खगमृगकुल, मलय–बातास। मयूर, भ्रमर, मुरली विलास॥
वेणु, शृंग, पदचिह्न, मेघमाला। बसन्त, शशांक, शंख, करताला॥
युगल विलासे अनुकूल जानि। लीला–विलास–उद्दीपक मानि॥
ए सब छोड़त कँहि नाहि जाँउ। ए सब छोड़त पराण हाराँउ॥
भकतिविनोद कहे, सुन कान। तुया उद्दीपक हामार पराण॥
इस पदावलीमें श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंकी उद्दीपनाकी वस्तुओंका वर्णन करते हुए कह रहे हैं—अहो! राधाकुण्डका परम रमणीक तट जिसके किनारे अनेक कुञ्ज जो कि छोटे–छोटे वृक्षोंसे आवृत होकर कुटीसदृश प्रतीत होते हैं, जिनमें राधाकृष्णकी अत्यन्त ही रहस्यमय लीलाएँ होती हैं, पास ही गिरिराजजी जो कि कृष्णकी गौचारण भूमि है, जिनकी गुफाओंमें अनेकों लीलाएँ होती हैं, मानसीगंगा जिसमें कृष्ण एवं गोपियाँ नौका विहार करती हैं, यमुनाकी ऊँची–ऊँची तरंगें, वंशीवट, गोकुल जहाँ कृष्णकी बाल्य लीलायें हुईं, धीरसमीर जहाँपर राधाकृष्णकी रासलीलाको दर्शनकर वायु भी धीरे–धीरे चलने लगी, नाना प्रकारके वृक्ष एवं लताओंसे सुसज्जित वृन्दावन तथा उसमें विचरण करनेवाले हिरण, पक्षी, दक्षिणमें मलयज पर्वतसे आने वाली वायु, मोर, भ्रमर, मुरली, वेणु, शृंग, चरणचिह्न, आकाशमें श्यामवर्णके मेघोंकी कतार, वसन्तऋतु, चन्द्रमा, शंख, करताल, ये सभी वस्तुएँ श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंकी सहायक होनेके कारण इन वस्तुओंका दर्शनकर भक्तोंको उन लीलाओंकी उद्दीपना होती है। इन सब स्थलोंको छोड़कर मैं कहीं नहीं जाऊँगा, बेशक मेरे प्राण ही निकल जाएँ। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर कह रहे हैं—हे कृष्ण! ये सब स्थान आपकी लीलाओंके उद्दीपक होनेके कारण मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। आर केन मायाजाले पडि़तेछ, जीव–मीन। नाहि जान बद्ध ह’ये रबे तुमि चिरदिन॥
अति तुच्छ भोग–आशे, बन्दी हये माया–पाशे। रहिले विकृतभावे दण्ड्य यथा पराधीन॥
एखन भकतिबले, कृष्णप्रेमसिन्धु–जले। क्रीड़ा करि अनायासे थाक तुमि कृष्णाधीन॥
अरे जीव! तू अभी तक मायाके जालमें क्यों पड़ा हुआ है? क्या तू इस प्रकार बद्ध होकर चिरदिनके लिए मायाके जालमें ही पड़ा रहेगा। अति तुच्छ सांसारिक भोगोंकी आशासे मायाका दास होकर तथा अपने नित्यस्वरूपको भूलकर पराधीनोंकी भाँति मायाका दण्ड भोग रहा है। अतः अब भक्तिके बलसे अर्थात् भक्तिका आश्रय ग्रहणकर कृष्णके प्रेमरूपी सागरके जलमें क्रीड़ा करते हुए अनायास ही कृष्णके दास बन जाओ॥९२॥
श्रीरूपगोस्वामी–शोचक यङ् कलि रूप शरीर न धरत। तङ् ब्रजप्रेम, महानिधि–कुठरिक, कौन् कपाट उघाड़त॥
नीर–क्षीर–हंसन, पान–विधायन, कौन पृथक् करि पायत। को सब त्यजि, भजि’ वृन्दावन, को सब ग्रन्थ विरचित॥
जव पितु वनफुल, फलत नानाविध, मनोराजि अरविन्द। सो मधुकर बिनु, पान कोन् जानत, विद्यमान करि बन्ध॥
को जानत, मथुरा–वृन्दावन को जानत व्रज–नीत। को जानत, राधामाधव–रति, को जानत सोइ प्रीत॥
जाकर चरण–, प्रसादे सकल जन, गाइ गवाइ सुख पावत। चरण–कमले, शरणागत माधो, तव महिमा उर लागत॥
यदि श्रील रूपगोस्वामी इस कलियुगमें आविर्भूत नहीं होते, तो ब्रजप्रेमरूप महानिधिकी कोठरीका दरवाजा कौन खोलता। हंसकी भाँति जल मिश्रित दूधमेंसे दूधको पान करनेके समान कौन शास्त्रोंसे सार वस्तुको ग्रहण कर सकता था। तथा कौन सबकुछ परित्यागकर वृन्दावनमें भजन करते हुए ग्रन्थोंकी रचना करता। कमल आदि पुष्पोंको विकसित करनेवाले सूर्यके उदित होनेपर जब वनमें नाना प्रकारके पुष्प विशेषतः मनको प्रमत्त करनेवाले नाना प्रकारके कमलके पुष्प खिल उठते हैं तथा मकरन्दसे भर जाते हैं तथा उनकी सुगन्धसे सारा वातावरण सुगन्धमय हो जाता है। उस समय मधुकर (भ्रमर) के बिना उन पुष्पोंके मकरन्दको कौन अनुभव करता है, मधुकरके बिना और कोई पान या अनुभव नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जो भ्रमर कठोर लकड़ीमें भी छेदकर बाहर निकल जाता है, वही भ्रमर संध्याके पश्चात् भी कमलका मकरन्द पान करते–करते इतना विभोर हो जाता है कि उसे कमलकी पखुडि़योंके बंद होनेका ज्ञान नहीं रहता तथा वह प्रेममें विवश होकर कमलके कोमल पखुडि़योंको छेदकर बाहर नहीं निकल पाता। उसी प्रकार श्रीधामवृन्दावनमें युगल विलासरूप कमलके पारकीय उन्नतउज्ज्वलरसरूप मकरन्दकी महिमाका अनुभवकर इस जगतमें श्रीरूपगोस्वामीके अतिरिक्त कौन प्रचार कर पाता। वे वृन्दावन रूपी कमलके मकरन्दका आस्वादन करनेवाले भ्रमर स्वरूप हैं। उनकी कृपाके बिना कौन मथुरा–वृन्दावनको तथा ब्रजदेवियोंको जान पाता। तथा कौन राधामाधवके भावको तथा उस प्रीतिको जान पाता। जिनके श्रीचरणकमलोंकी कृपासे सभी लोग श्रीराधामाधवका गुणगान करके तथा दूसरोंसे भी करवाकर सुखी होते हैं, उन्हीं (श्रील रूपगोस्वामी) के चरणकमलोंमें शरणागत यह माधो भी आपकी महिमाका गान कर रहा है॥९३॥