Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

उच्छ्वास–दैन्यमयी–प्रार्थना

Bhaktivinoda Ṭhākura10 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaNityanandaRasaBhakti
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भवार्णवे पड़े मोर आकुल पराण।किसे कूल पा’व, ता’र ना पाई सन्धान॥
ना आछे करम–बल, नाहि ज्ञान–बल।याग–योग तपोधर्म—ना आछे सम्बल॥
नितान्त दुर्बल आमि, ना जानि साँतार।ए विपदे के आमारे करिबे उद्धार??विषय–कुम्भीर ताहे भीषण–दर्शन।कामेर तरङ्ग सदा करे उत्तेजन॥
प्राक्तन वायुर वेग सहिते ना पारि।कान्दिया अस्थिर मन, ना देखि काण्डारी॥
ओगो श्रीजाह्नवा देवी! ए दासे करुणा।कर आजि निजगुणे, घुचाओ यन्त्रणा॥
तोमार चरण–तरी करिया आश्रय।भवार्णव पा’र हब क’रेछि निश्चय॥
तुमि नित्यानन्द–शक्ति कृष्णभक्ति–गुरु।ए दासे करह दान पदकल्पतरु॥
कत कत पामरेरे क’रेछ उद्धार।तोमार चरणे आज ए काङ्गाल छार॥

इस संसारसमुद्रमें पड़कर मेरे प्राण छटपटा रहे हैं, मुझे कैसे किनारा मिलेगा, इसका भी मुझे ज्ञान नहीं है। मुझमें कर्मका बल नहीं है और न ही ज्ञानका। याग, योग, तप आदिमेंसे भी कोई मेरा सम्बल नहीं है अर्थात् इनमेंसे कोई भी मेरे काम नहीं आ सकता। मैं अत्यधिक दुर्बल हूँ और तैरना भी नहीं जानता हूँ। इस अवस्थासे मेरा कौन उद्धार करेगा? इस समुद्रमें विषय–वासनारूप बड़े भयानक मगरमच्छ हैं और कामवासनारूपी लहरियाँ सर्वदा उत्तेजित करती हैं। पूर्व–पूर्व जन्मोंके कर्म तेज वायुके समान हैं, जिनको सहन करना अत्यधिक कठिन है। मैं किसी भी उद्धारकर्त्ताको न देखकर रो–रोकर बेहाल हो रहा हूँ। हे श्रीजाह्नवा देवी! इस दीन सेवकके प्रति अपने गुणोंसे इतनी करुणा करें कि जिससे मेरी सम्पूर्ण यन्त्रणा मिट जाए। मैंने ऐसा निश्चय किया है कि आपकी चरण–रूपी नौकाका आश्रयकर इस समुद्रको पार करुँ। आप श्रीनित्यानन्द प्रभुकी शक्ति हैं व कृष्ण–भक्तिकी गुरु हैं, अतः इस दीन दासको अपने चरण–कल्पवृक्षकी छाया प्रदान करें। आपने अनेक पामरोंका उद्धार किया है, आज आपके श्रीचरणोंमें यह कंगाल भी यही प्रार्थना करता है। आमार समान हीन नाहि ए संसारे। अस्थिर हयेछि पडि़ भव पारावारे॥

कुलदेवी योगमाया मोरे कृपा करि। आवरण सम्वरिबे कबे विश्वोदरी॥

शुनेछि आगमे–वेदे महिमा तोमार। श्रीकृष्ण–विमुखे बाँधि कराओ संसार॥

श्रीकृष्ण–साम्मुख्य जाँर भाग्यक्रमे हय। तारे मुक्ति दिया कर अशोक अभय॥

ए दासे जननि! करि अकैतव दया। वृन्दावने देह स्थान तुमि योगमाया॥

तोमाके लंघिया कोथा जीवे कृष्ण पाय। कृष्ण रास प्रकटिल तोमार कृपाय॥

तुमि कृष्ण–अनुचरी जगत–जननी। तुमि देखाइले मोरे कृष्ण–चिन्तामणि॥

निष्कपट हये माता चाओ मोर पाने। वैष्णवे विश्वास बृद्धि ह’क प्रतिक्षणे॥

वैष्णव–चरण बिना भव–पारावार। भकतिविनोद नारे हइवारे पार॥

मेरे समान दीन–हीन इस संसारमें कोई नहीं है। इस भवसागरमें पड़कर मैं अस्थिर (विचलित) हो गया हूँ। कब विश्वोदरी कुलदेवी योगमाया मुझपर कृपाकर अपने आवरणको दूर करेंगी। मैंने आगममें तथा वेदोंमें आपकी महिमा सुनी है कि जो श्रीकृष्णसे विमुख होते हैं आप उनको बाँधकर संसारमें डाल देती हैं और जो भाग्यक्रमसे श्रीकृष्णके सम्मुख होते हैं, उन्हें मुक्ति देकर अशोक, अभय बना देती हैं। हे जननी! आप योगमाया हैं! अतः इस दासके प्रति भी निष्कपट दया करके वृन्दावनमें स्थान प्रदान करें। आपको लाँघकर क्या कभी जीव श्रीकृष्णसे मिल सकता है? श्रीकृष्णने आपकी कृपासे ही रास रचाया। आप श्रीकृष्णकी अनुचरी और जगतकी जननी हैं, आपने ही मुझे कृष्णरूपी चिन्तामणिका दर्शन कराया है। हे माता! आप निष्कपट होकर मेरी ओर देखें, जिससे वैष्णवोंके प्रति निरन्तर मेरा विश्वास बढ़ते रहे। वैष्णव चरणोंके बिना संसाररूपी समुद्रको भक्तिविनोद पार नहीं कर सकता। दैन्य–अपराधात्मक आमार जीवन, सदा पापे रत, नाहिक पुण्येर लेश। परेरे उद्वेग, दियाछि जे कत, दियाछि जीवेरे क्लेश॥

निज सुख लागि’, पापे नाहि डरि, दयाहीन स्वार्थपर। पर–सुखे दुःखी, सदा मिथ्याभाषी, परदुःख सुखकर॥

अशेष कामना, हृदि माझे मोर, क्रोधी दम्भपरायण। मदमत्त सदा, विषये मोहित, हिंसा–गर्व विभूषण॥

निद्रालस्य–हत, सुकार्ये विरत, अकार्ये उद्योगी आमि। प्रतिष्ठा लागिया, शाठ्य आचरण, लोभहत सदा कामी॥

ए हेन दुर्जन, सज्जन–वर्जित, अपराधी निरन्तर। शुभकार्य शून्य, सदानर्थमना, नाना दुःखे जर जर॥

वार्द्धक्ये एखन, उपायविहीन, ता’ते दीन अकिञ्चन। भकतिविनोद, प्रभुर चरणे, करे दुःख निवेदन॥

अहो! मैं सारा जीवन पापकर्मोंमें ही लगा रहा, मैंने लेशमात्र भी पुण्य नहीं किया, परन्तु कितने ही दूसरे जीवोंको उद्वेग दिया। मैं ऐसा दयाहीन और स्वार्थी हूँ तथा मिथ्याभाषी हूँ कि अपने सुखके लिए पापसे भी नहीं डरता हूँ। दूसरेको सुखी देखकर मुझे ईर्ष्या होने लगती है एवं दूसरेको दुःखी देखकर मेरा हृदय आनन्दसे भर जाता है। मैं बड़ा ही क्रोधी एवं दाम्भिक हूँ, अनन्त प्रकारकी सांसारिक कामनाओंसे मेरा हृदय भरा हुआ है। मैं विषयोंके मदमें प्रमत्त हूँ तथा हिंसा और गर्व मेरे आभूषणस्वरूप हैं। निद्रा एवं आलस्यग्रस्त होनेके कारण सत् कार्योंमें मेरी लेशमात्र भी रुचि नहीं होती, परन्तु दुष्कर्मोंमें मेरा मन स्वतः ही रम जाता है। मैं परम कामी हूँ। दूसरोंसे प्रतिष्ठा प्राप्त करनेके लिए मैं कपटतापूर्ण व्यवहार करता हूँ। हे प्रभो! मैं ऐसा दुर्जन हूँ कि वैष्णवोंका सङ्ग तो मैंने कभी किया ही नहीं, अपितु निरन्तर मैं उनके चरणोंमें अपराध करता रहता हूँ। मेरा अनर्थग्रस्त मन शुभ कर्मोंको त्यागकर पाप कर्मोंमें ही लगा रहता है, जिसके फलस्वरूप नाना प्रकारके दुःखोंसे जर्जरित हो रहा है। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर भगवानके श्रीचरणोंमें अपना दुःख निवेदन कर रहे हैं—प्रभो! अब तो वृद्धकाल उपस्थित हो गया है, इससे बचनेका कोई उपाय भी नहीं है और मैं तो अकिंचन हूँ। आत्मनिवेदन–ममतास्पद देहसमर्पण (वाचिक) सर्वस्व तोमार, चरणे सँपिया, पड़ेछि तोमार घरे। तुमि त’ ठाकुर, तोमार कुकुर, बलिया जानह मोरे॥

बाँधिया निकटे, आमारे पालिबे, रहिबो तोमार द्वारे। प्रतीप–जनेरे, आसिते ना दिबो, राखिबो गड़ेर पारे॥

तव निजजन, प्रसाद सेविया, उच्छिष्ट राखिबे जाहा। आमार भोजन, परम–आनन्दे, प्रतिदिन ह’बे ताहा॥

बसिया शुइया, तोमार चरण, चिन्तिब सतत आमि। नाचिते नाचिते, निकटे जाइबो, जखन डाकिबे तुमि॥

निजेर पोषण, कभु ना भाविबो, रहिबो भावेर भरे। भकतिविनोद, तोमारे पालक, बलिया वरण करे॥

हे प्रभु! मैं अपना सर्वस्व आपके श्रीचरणोंमें समर्पितकर आपके घरमें (शरण) पड़ा हुआ हूँ। कृपया आप मुझे अपना कुत्ते (दास) के रूपमें स्वीकार करें। आप मुझे अपने निकट बांधकर पालेंगे, मैं आपके घरके दरवाजेपर रहकर प्रतिकूल लोगोंको अन्दर नहीं आने दूँगा तथा उन्हें आपके घरसे बहुत दूर भगा दूँगा। आपके निजजन प्रसाद सेवाकर जो उच्छिष्ट रख देंगे, प्रतिदिन मैं आनन्दपूर्वक उसीको ग्रहण करूँगा। मैं सोते–बैठते हुए निरन्तर आपके श्रीचरणोंका स्मरण करता रहूँगा तथा जब आप मुझे बुलाएँगे तो मैं आनन्दसे नाचते–नाचते आपके निकट जाऊँगा। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी कहते हैं—हे प्रभु! मैं अपने जीवन निर्वाहकी चिन्ता न कर सदा भाव विभोर रहूँगा। क्योंकि मैंने आपको ही पालकके रूपमें वरण किया है। आत्मनिवेदन–ममतास्पद देहसमर्पण (कायिक) आमार बलिते प्रभु! आर केह नाइ। तुमिइ आमार मात्र पिता–बन्धु–भाइ॥

बन्धु, दारा, सुत–सुता—तव दासी–दास। सेइ त सम्बन्धे सबे आमार प्रयास॥

धन, जन, गृह, दार ‘तोमार’ बलिया। रक्षा करि आमि मात्र सेवक हइया॥

तोमार कार्येर तरे उपार्जिबो धन। तोमार संसार–व्यय करिबो वहन॥

भालमन्द नाहि जानि सेवामात्र करि। तोमार संसारे आमि विषय–प्रहरी॥

तोमार इच्छाय मोर इन्द्रिय–चालना। श्रवण, दर्शन, घ्राण, भोजन–वासना॥

निजसुख लागि, किछु नाहि करि आर। भकतिविनोद बले, तव सुख–सार॥

हे प्रभो! मेरे लिए इस जगतमें आपके अतिरिक्त अपना कहलाने वाला कोई नहीं है। आप ही एकमात्र मेरे पिता, बन्धु एवं भाई हैं। ये बन्धु, स्त्री, पुत्र तथा पुत्री सब आपके दास दासियाँ हैं, मैं केवल अपना कर्तव्य पालन कर रहा हूँ। यह धन, जन, गृह सब कुछ आपका ही है, ऐसा जानकर मैं तो सेवकमात्र होकर सब वस्तुओंकी रक्षा कर रहा हूँ। आपकी सेवाके लिए मैं धन इकट्ठा करूँगा तथा उसके द्वारा आपके संसारका निर्वाह करूँगा। हे प्रभो! अच्छे–बुरेका ज्ञान मुझे नहीं है, मैं तो आपके संसारमें आपके विषयोंका पहरेदार होकर सेवामात्र कर रहा हूँ। आपके इच्छानुसार ही मेरी इन्द्रियाँ श्रवण, दर्शन, घ्राण, भोजन इत्यादि कार्य कर रही हैं। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर कह रहे हैं—हे प्रभो! मैं अपने लिए कुछ भी नहीं करता, मेरा उद्देश्य तो केवल आपको सुखी रखना है। आत्मनिवेदन–अहंतास्पद देहीसमर्पण (वाचिक) मानस, देह, गेह, जो किछु मोर। अर्पिलुँ तुया पदे नन्दकिशोर!! संपदे–विपदे, जीवने–मरणे। दाय मम गेला, तुया ओ–पद वरणे॥

मारबि राखबि जो इच्छा तोहारा। नित्यदास–प्रति तुया अधिकारा॥

जन्माओबि मोए इच्छा यदि तोर। भक्तगृहे जनि जन्म हउ मोर॥

कीट जन्म हउ यथा तुया दास। बहिर्मुख ब्रह्मजन्मे नाहि आश॥

भुक्ति–मुक्तिस्पृहा–विहीन ये–भक्त। लभइते ताँ’क सङ्ग अनुरक्त॥

जनक, जननी, दयित, तनय। प्रभु, गुरु, पति–तुहुँ सर्वमय॥

भकतिविनोद कहे सुन कान!। राधानाथ! तुहुँ हामार पराण॥

हे नन्दकिशोर! मैंने अपना मन, शरीर तथा घर जो कुछ भी है, सब आपके श्रीचरणकमलोंमें अर्पण कर दिया। अब मेरा सुख–दुःख एवं जन्म–मरणका दायित्व समाप्त हो गया क्योंकि मैंने आपके चरणकमलोंका वरण कर लिया है। हे प्रभो! अब तो इस दासपर आपका पूरा अधिकार है। आप चाहें तो अपने इस दासको मार डालिए या जीवित रखिए, जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही कीजिए। यदि आप मेरा इस जगतमें जन्म भी करायें तो ऐसी कृपा करना कि आपके भक्तके घरमें ही मेरा जन्म हो। बहिर्मुख होकर ब्रह्मा जैसा जन्म लेनेकी इच्छा नहीं है। परन्तु जहाँ आपके प्रिय भक्त हों, वहाँ कीटजन्म भी मुझे स्वीकार है। प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिए कि भुक्ति एवं मुक्तिरूपी कपटतासे रहित शुद्ध भक्तोंके श्रीचरणोंमें मेरा मन अनुरक्त रहे। मेरे तो पिता–माता, प्रिय, पुत्र, प्रभु, गुरु तथा पति सब कुछ आप ही हैं। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—हे राधानाथ! आप मेरे प्राणस्वरूप हैं। आत्मनिवेदन–फलस्वरूप देहसमर्पण (मानसिक) आत्मनिवेदन, तुया पदे करि’, हइनु परम सुखी। दुःख दूरे गेल, चिन्ता ना रहिल, चौदिके आनन्द देखी॥१॥

अशोक अभय, अमृत–आधार, तोमार चरणद्वय। ताहाते एखन, विश्राम लभिया, छाडि़नु भवेर भय॥२॥

तोमार संसारे, करिब सेवन, नहिब फलेर भागी। तव सुख जाहे, करिब यतन, ह’ये पदे अनुरागी॥३॥

तोमार सेवाय, दुःख हय जत, सेओ त’ परम सुख। सेवा–सुख–दुःख, परम सम्पद, नाशये अविद्या–दुःख॥४॥

पूर्व इतिहास, भुलिनु सकल, सेवा–सुख पे’ये मने। आमि तो’ तोमार, तुमि तो’ आमार, कि काज अपर धने॥५॥

भकतिविनोद, आनन्दे डुबिया, तोमार सेवार तरे। सब चेष्टा करे, तव इच्छा–मत, थाकिया तोमार घरे॥६॥

हे प्रभो! आपके श्रीचरणोंमें अपनेको समर्पितकरके मैं बहुत ही सुखी हो गया हूँ। मेरे समस्त प्रकारके दुःख दूर हो गए तथा अब किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं रही। अब तो मुझे चारों ओर आनन्द–ही–आनन्द दीखता है। आपके श्रीचरणकमल तो अशोक अर्थात् समस्त प्रकारके शोकोंको नष्ट करनेवाले, अभय अर्थात् संसार भयका नाश करनेवाले हैं तथा अमृतके आधारस्वरूप हैं। आपके ऐसे श्रीचरणोंमें आश्रय ग्रहणकर मैंने संसार भयको त्याग दिया। हे प्रभो! यह सारा जगत तो आपका है, आप ही इसके एकमात्र भोक्ता हैं। मैं अपने भोक्ता अभिमानको त्यागकर आपके चरणोंमें अनुरक्त होकर आप जैसे प्रसन्न रहेंगे वैसे ही आपकी सेवा करनेका प्रयत्न करूँगा। आपकी सेवा करते हुए यदि दुःख भी होता है, तो वास्तवमें वही मेरे लिए परम सुख है। आपकी सेवा करते हुए जो दुःख अथवा सुख प्राप्त होता है, वही तो एकमात्र सम्पत्ति है, जो कि अविद्यारूपी दुःखको नाश कर देती है। हे प्रभो! आपकी सेवासे मुझे ऐसा अपूर्व सुख प्राप्त हुआ कि मैं अपने समस्त सांसारिक सम्बन्धोंको भूल गया। अब तो बस आप ही मेरे प्रभु हैं तथा मैं आपका दास हूँ। इसके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी सांसारिक सम्पत्तिसे क्या मतलब? हे प्रभो! यह भक्तिविनोद आनन्दमें भरकर आपकी इच्छानुसार आपकी सेवाके लिए ही आपके घरमें रह रहा है। गोप्तृत्वे–वरण–अवश्य रक्षिबे कृष्ण (वाचिक) तुमि सर्वेश्वरेश्वर, ब्रजेन्द्रकुमार। तोमार इच्छाय विश्वे सृजन संहार॥

तव इच्छामत ब्रह्मा करेन सृजन। तव इच्छामत विष्णु करेन पालन॥

तव इच्छामते शिव करेन संहार। गोप्तृत्वे–वरण–अवश्य रक्षिबे कृष्ण (वाचिक) तव इच्छामते माया सृजे कारागार॥

तव इच्छामते जीवेर जनम–मरण। समृद्धि–निपात–दुःख–सुख–संघटन॥

मिछे मायाबद्ध–जीव आशापाशे फिरे। तव इच्छा बिना किछु करिते ना पारे॥

तुमि त’ रक्षक आर पालक आमार। तोमार चरण बिना आशा नाहि आर॥

निज बल चेष्टा–प्रति भरसा छाडि़या। तोमार इच्छाय आछि निर्भर करिया॥

भकतिविनोद अति दीन अकिञ्चन। तोमार इच्छाय ता’र जीवन–मरण॥

हे श्रीब्रजेन्द्रनन्दन! आप तो ईश्वरोंके भी ईश्वर स्वयं भगवान हैं। आपकी इच्छामात्रसे ही विश्वकी सृष्टि एवं प्रलय होता है। आपकी इच्छानुसार ही ब्रह्मा सृष्टि करते हैं तथा विष्णु पालन करते हैं। आपकी इच्छासे ही शिवजी संहार करते हैं तथा माया संसाररूपी कारागारकी सृष्टि करती है, आपकी इच्छासे ही जीवोंका जन्म–मरण, सुख–दुःख तथा समृद्धि निपात, धन–ऐश्वर्यका नाश होना संघटित होता है। मायाबद्धजीव व्यर्थ ही सांसारिक आशारूपी रज्जुमें बँधा हुआ है अर्थात् सांसारिक आशाओंकी पूर्तिके लिए प्रयास करता है, परन्तु आपकी इच्छाके बिना कुछ नहीं कर सकता। अतः हे प्रभो! आप ही मेरे रक्षक और पालक हैं, आपके श्रीचरणोंकी प्राप्तिके अतिरिक्त मेरी और कोई आशा नहीं है। मैंने तो अपने बल, बुद्धिका भी भरोसा छोड़ दिया है तथा अब मैं सम्पूर्णरूपसे आपकी इच्छापर निर्भर हूँ। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी कह रहे हैं—हे प्रभो! मैं तो अत्यन्त ही दीन व अकिञ्चन हूँ। मेरा जन्म–मरण तो एकमात्र आपकी इच्छापर ही निर्भर है। अनुकूल ग्रहण–वाचिक और मानसिक

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