हे प्रभो! मैं आपको भूलकर इस संसारमें आकर नाना प्रकारके दुःखोंसे जर्जरित हो रहा हूँ। इसीलिए आपको अपने कष्टोंको बतानेके लिए ही मैं आपके श्रीचरणकमलोंमें आया हूँ। प्रभो! जब मैं माताके गर्भमें अत्यन्त ही दुष्कर बंधनोंमें बंधा हुआ था, उस समय आप मुझे एकबार दर्शन देकर अन्तर्धान हो गए। तब मैंने विचार किया कि जन्म ग्रहणकर मैं आपका भजन करूँगा। परन्तु जन्म ग्रहण करते ही मैं मायाके जालमें फंस गया और अपनी प्रतिज्ञाको भूल गया। अपने माता–पिता एवं स्वजनोंका अत्यन्त ही प्यारा होकर उनकी गोदमें हँसते हुए समय बिताने लगा। माता–पिताके स्नेहमें सब कुछ भूलकर मुझे संसार अच्छा लगने लगा। तत्पश्चात् धीरे–धीरे मैं बाल्य अवस्थामें आकर बालकोंके साथ खेलने लगा, फिर कुछ दिन पश्चात् विद्या अध्ययनकर विद्याके अभिमानमें देश–विदेशमें भ्रमणकर धन उपार्जन करके निविष्ट चित्त होकर स्वजनोंका पालन करने लगा। इस प्रकार हे हरि! मैं आपको भूल गया। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी कातर स्वरसे रोते–रोते निवेदन कर रहे हैं—हे प्रभो! मैंने जीवनभर आपका भजन नहीं किया, मेरा सारा समय व्यर्थ ही चला गया। परन्तु अब तो वृद्ध अवस्था आ गई है, अब मेरी क्या गति होगी?