Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

मनःशिक्षा

Bhaktivinoda Ṭhākura8 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuHarinamBhakti
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भज भज हरि, मन दृढ़ करि’, मुखे बोलो ताँ’र नाम।ब्रजेन्द्रनन्दन गोपीप्राणधन, भुवनमोहन श्याम॥
कखन मरिबे, केमने तरिबे, विषम शमन डाके।जाँहार प्रतापे, भुवन काँपये, ना जानि मर विपाके॥
कुल धन पाइया, उन्मत्त हइया, आपनाके जान बड़।शमनेर दूते, धरि, पाये हाते, बाँधिया करिबे जड़॥
किवा जति सती, किवा नीच जाति, जेइ हरि नाहि भजे।तबे जनमिया, भ्रमिया भ्रमिया, रौरव–नरके मजे॥
ए दास लोचन, भावे अनुक्षण, मिछाइ जनम गेलो।हरि ना भजिनु, विषये मजिनु, हृदये रहल शेल॥

अरे मन! तू इस दृढ़ विश्वासके साथ हरिभजन कर कि हरिभजनके बिना तेरा उद्धार नहीं हो सकता। अतः तू अपने मुखसे ब्रजेन्द्रनन्दन, गोपीप्राणधन अर्थात् जो गोपियोंके प्राणधन हैं तथा सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्डको मोहित करनेवाले श्यामसुन्दर हैं, उनका नाम ले। कब तेरे जीवनका अन्त हो जाएगा, यह कोई निश्चित नहीं है तथा कैसे तेरा उद्धार होगा इसकी भी तुझे चिन्ता नहीं है। परन्तु अत्यन्त ही भयंकर यमदूत तेरे पास ही खड़े हैं। अरे! जिसके प्रतापसे यह त्रिभुवन काँपता है, उन भगवानको तू भूल गया है। अपने इसी दुर्दैवके कारण तू इस संसारमें नाना प्रकारके दुःखोंसे मर रहा है। उच्चकुलमें जन्म तथा धनके मदमें प्रमत्त होकर अपनेको श्रेष्ठ मान रहा है। परन्तु तू भूल गया है कि एक दिन यमदूत तेरे हाथ–पैरोंको बाँधकर तूझे ले जाएँगे। कोई संन्यासी हो अथवा किसी नीच जातिका व्यक्ति हो, यदि वह हरिभजन नहीं करता है तो संसारके जन्म–मरणके चक्करमें भ्रमण करते–करते रौरव नामक नरकमें गिर जाता है। श्रीलोचनदास ठाकुर कह रहे हैं—मैंने हरि भजन तो किया नहीं, सदा विषयोंमें ही मग्न रहा। इस प्रकार मेरा मनुष्यजीवन व्यर्थ ही चला गया, यही मेरे हृदयमें कंटक (दुःख) स्वरूप है। भजहुँ रे मन श्रीनन्दनन्दन, अभय चरणारविन्द रे। दुर्लभ मानव–जनम सत्संगे, तरह ए भव सिन्धु रे॥

शीत आतप, वात बरिषण, ए दिन यामिनी जागि’ रे। विफले सेबिनु कृपण दुरजन, चपल सुख–लव लागि’ रे॥

ए धन, यौवन, पुत्र परिजन, इथे कि आछे परतीति रे। कमलदल–जल, जीवन टलमल, भजहुँ हरिपद निति रे॥

श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वन्दन, पादसेवन, दास्य रे। पूजन, सखीजन, आत्मनिवेदन, गोविन्द दास अभिलाष रे॥

हे मेरे मन! तुम यह दुर्लभ मानव जन्म प्राप्तकर सत्संगमें ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके अभय अर्थात् समस्त प्रकारके भयोंका विनाश करनेवाले श्रीचरणकमलोंका भजन करो तथा इस अथाह भवसागरको पार कर लो। अरे मन! तू सर्दी–गर्मी, आँधी–तूफान, बरसातमें तथा दिन–रात जागकर इन संसारी दुर्जनोंकी सेवा जिस सुख प्राप्तिकी आशासे कर रहा है वह क्षणभरका सुख तो चंचल अर्थात् अनित्य है। अरे! इस धन, यौवन, पुत्र तथा परिजनोंकी तो बात ही क्या, स्वयं तेरा जीवन ही तो कमलके पत्तेपर स्थित पानीकी बूँदकी भाँति टलमल–टलमल कर रहा है अर्थात् तेरा जीवन भी कब समाप्त हो जाएगा, यह भी निश्चित नहीं है। अतः तुम भगवानके श्रीचरणमकलोंका भजन करो। गोविन्ददास श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वन्दन, पादसेवन, दास्य, पूजन, सख्य और आत्मनिवेदनरूप नवधा भक्तिकी अभिलाषा करता है। सुखेर लागिया, ए घर बाँधिनु, आगुने पुडि़या गेल। अमिया–सागरे, सिनान करिते, सकलि गरल भेल॥

सखि! कि मोर कपाले लेखि। शीतल बलिया, चाँद सेविनु, भानुर किरण देखि॥

उचल बलिया, अचले चडि़नु, पडि़नु अगाध जले। लछमी चाहिते, दारिद्र बेढ़ल, माणिक हारानु हेले॥

नगर बसालाम, सागर बाँधिलाम, माणिक पावार आशे। सागर शुकाल, माणिक लुकाल, अभागी – करम – दोषे॥

पियास लागिया, जलद सेविनु, बजर पडि़या गेल। कहे चण्डीदास, श्यामेर पिरीति, मरमे रहल शेल॥

अहो! सुख प्राप्तिकी आशासे मैंने परिश्रम करके यह घर बनाया, परन्तु वह आगमें जल गया। अमृतके सागरमें स्नानके लिए गया तो वह अमृत भी विष सदृश हो गया। हे सखि! मेरा कैसा दुर्भाग्य है। चन्द्रमाकी किरणोंको सुशीतल जानकर अपने तपते हुए शरीरको शीतल करनेके लिए उनकी शरणमें गया परन्तु वे किरणें भी सूर्यकी किरणें हो गईं। ऊँचा जानकर मैं एक पर्वतपर चढ़ गया, तो वहाँसे अगाध समुद्रमें गिर गया। मैंने धनकी इच्छा की तो दरिद्रता ही बढ़ गई तथा मैंने अवहेलापूर्वक मणियोंको खो दिया। उन मणियोंकी प्राप्ति की आशासे मैंने समुद्रको बाँध दिया, परन्तु मुझ अभागेके कर्मोंके दोषके कारण सागर भी सूख गया तथा साथ ही मणियाँ भी अदृश्य हो गईं; जब मुझे प्यास लगी तो मैं मेघोंकी शरणमें गया, परन्तु वर्षा तो नहीं हुई, बल्कि बज्रपात हो गया। पदकर्त्ता श्रीचण्डीदासजी कहते हैं—श्यामसुन्दरके चरणोंमें मेरी प्रीति नहीं हुई, मेरे हृदयमें यही एक दुःख है। दुर्लभ मानव–जन्म लभिया संसारे। कृष्ण ना भजिनु–दुःख कहिब काहारे? ‘संसार’ ‘संसार’ क’रे मिछे गेल काल। लाभ ना हइल किछु, घटिल जञ्जाल॥

किसेर संसार एइ, छायाबाजी–प्राय। इहाते ममता करि’ वृथा दिन जाय॥

ए देह पतन ह’ले कि र’बे आमार? केह सुख नाहि दिबे पुत्र–परिवार॥

गर्द्दभेर मत आमि करि परिश्रम। का’र लागि’ एत करि ना घुचिल भ्रम॥

दिन जाय मिछा काजे, निशा निद्रा–वशे। नाहि भावि—मरण निकटे आछे ब’से। भाल मन्द खाइ, हेरि परि चिन्ताहीन। नाहि भावि, ए देह छाडि़ब कोन दिन॥

देह–गेह–कलत्रादि चिन्ता अविरत। जागिछे हृदये मोर बुद्धि करि’ हत॥

हाय, हाय! नाहि भावि, अनित्य ए सब। जीवन विगते कोथा रहिबे वैभव?? श्मशाने शरीर मम पडि़या रहिबे। विहङ्ग–पतङ्ग ताय विहार करिबे॥

कुक्कुर शृगाल सब आनिन्दत ह’ये। महोत्सव करिबे आमार देह ल’ये॥

जे देहेर एइ गति, ता’र अनुगत। संसार–वैभव आर बन्धुजन यत॥

अतएव मायामोह छाडि़’ बुद्धिमान। नित्यतत्त्व कृष्णभक्ति करुन सन्धान॥

इस संसारमें दुर्लभ मानव जन्मको प्राप्त करके भी मैंने कृष्णका भजन नहीं किया, मैं अपना यह दुःख किसको बताऊँ? संसार–संसार कहते हुए व्यर्थ ही समय चला गया, परन्तु कुछ लाभ होनेकी अपेक्षा मैं जञ्जालमें फँस गया। यह संसार केवल परछाईके समान है तथा केवल खेल–तमाशा है, इसमें मोह–ममता करनेसे व्यर्थ ही दिन बीतते हैं। इस देहका पतन होनेपर मेरा क्या रह जायेगा? पुत्र–परिवार आदि कोई भी उस समय मुझे सुख नहीं देगा। मैं गधे जैसा परिश्रम करता हूँ, परन्तु किसके लिए करता हूँ, अभी तक मेरा यह भ्रम ही दूर नहीं हुआ। मेरा दिन व्यर्थके कार्योंमें चला जाता है और रात्रि सोते हुए। फिर भी मुझे कभी चिन्ता ही नहीं होती कि मेरी मृत्यु निकट आ चुकी है। अच्छा–बुरा जो मिलता है, उसीको खाता–पीता और पहनता हूँ। यह तो चिन्ता ही नहीं करता हूँ कि यह देह भी मुझे छोड़नी होगी। शरीर, घर, स्त्री–पुत्र आदि की चिन्तामें दिन–रात डूबे रहनेसे मेरी बुद्धि भी खराब हो गई है। हाय–हाय! मैंने यह कभी भी नहीं सोचा कि यह सब अनित्य है और इस देहसे प्राण निकलने पर यह वैभव कहाँ जायेगा। श्मशानमें मेरा यह शरीर पड़ा रहेगा तथा कीड़े–मकोड़े, पक्षी इत्यादि इस पर विहार करेंगे। कुत्ते, सियार इत्यादि आनन्दित होकर मेरी देहको लेकर महोत्सव करेंगे। हाय! हाय! जिस शरीरकी ऐसी गति है, मैं उसी शरीरसे सम्बन्धित संसारके वैभव और बन्धु–बान्धवोंमें ही फँसा रहा। अतएव हे बुद्धिमान पुरुषो! आप इस माया–मोहको छोड़कर नित्यतत्त्व कृष्णभक्तिकी खोज करें। ए मन! ‘हरिनाम’ कर सार। ए भव–सागर, हबे बालि–चर, हाँटिया हइबि पार॥

धरम करम, ए जप, ए तप, ज्ञान–योग–याग–ध्यान। नहि नहि नहि, कलिते केवल, उपाय ‘गोविन्द’–नाम॥

भुकति मुकति, जे–गति से–गति, ताहे ना करिह रति। मेघेर छायाय, जुड़ान जेमन, कह ना से कौन् गति॥

बदन भरिया, ‘हरि हरि’ बले, एमन सुलभ कबे। भारत–भूमेते, मानुष–जनम, आर कि एमन हबे॥

जतेक पुराण– प्रमाण देख ना, नामेर समान नाइ। नामे रति हैले, प्रेमेर उदय, प्रेमेते हरिके पाइ॥

श्रवण, कीर्तन, कर अनुक्षण, असत पचाल छाडिँ़। कहे प्रेमानन्द, मानुष–जनम, सफल कर ना भाडि़॥

अरे मन! इस कलियुगमें आत्मकल्याणका एकमात्र सारस्वरूप “श्रीहरिनाम” का आश्रय ग्रहण कर, जिससे कि यह अथाह भवसागर सूख जाएगा, बीचमें मार्ग बन जाएगा और तू आसानीसे चलकर ही उसे पार कर लेगा। इस कलियुगमें “गोविन्द” नामके अतिरिक्त धर्म–कर्म, जप, तप, ज्ञान, योग, पूजा, ध्यान आदि सभी उपाय निष्फल हैं। अरे मन! भुक्ति व मुक्ति आदिकी कामना मत कर क्योंकि जिस प्रकार बादलोंकी छाया शीतलता प्रदान करती है, परन्तु कुछ क्षणोंके लिए, नित्यकालके लिए नहीं; उसी प्रकार भुक्ति व मुक्तिसे भी क्षणिक ही सुख प्राप्त होता है। परन्तु उनका परिणाम भी बहुत ही कष्टदायक होता है। अतः जब इस भारतभूमिमें तुम्हें मनुष्य जन्म मिला है तो आनन्दपूर्वक “हरि हरि” बोलो, क्योंकि इतनी सुविधा फिर किसी जन्ममें मिलेगी या नहीं—यह भी कोई निश्चित नहीं है। तुम जितने भी पुराण आदि शास्त्रोंके प्रमाणोंको देखो, वे सभी यही प्रतिपादन करते हैं कि इस कलियुगमें नामके समान शक्तिशाली और कोई दूसरा उपाय नहीं है। नाममें रति होनेपर हृदयमें प्रेम उदित हो जाता है तथा उस प्रेमके द्वारा भगवानको पाया जा सकता है। श्रीप्रेमानन्दजी कहते हैं—असत्वार्ताओंको (ग्रम्यवार्ता) त्यागकर निरन्तर भगवानके नामका श्रवण–कीर्तन करते हुए अपने दुर्लभ मनुष्य जन्मको सार्थक करो॥८१॥

षडङ्ग शरणागति श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु जीवे दया करि’। स्वपार्षद स्वीय धाम सह अवतरि’॥

अत्यन्त दुर्लभ प्रेम करिवारे दान। सिखाय शरणागति भकतेर प्राण॥

दैन्य, आत्मनिवेदन, गोप्तृत्वे वरण। ‘अवश्य रक्षिबे कृष्ण’—विश्वास पालन॥

भक्ति–अनुकूलमात्र कार्येर स्वीकार। भक्ति–प्रतिकूल–भाव वर्जनाङ्गीकार॥

षड़ङ्ग शरणागति हइबे जाँहार। ताँहार प्रार्थना सुने श्रीनन्दकुमार॥

रूप–सनातन–पदे दन्ते तृण करि। भकतिविनोद पड़े दुहुँ पद धरि॥

काँदिया काँदिया बले,—“आमि त’ अधम। शिखाये शरणागति कर हे उत्तम॥”

अहो! जीवोंपर दया करके स्वयं श्रीचैतन्यमहाप्रभु अपने धाम एवं पार्षदोंको साथ लेकर इस जगतमें अवतरित हुए तथा अत्यन्त दुर्लभ कृष्णप्रेमको प्रदान करनेके लिए सर्वप्रथम शरणागतिकी शिक्षा दे रहे हैं जो कि भक्तोंके प्राणस्वरूप हैं। दैन्य, आत्मनिवेदन, कृष्ण ही पालक हैं, वे अवश्य ही हमारी रक्षा करेंगे—ऐसा सुदृढ़ विश्वास, भक्तिके अनुकूल विषयोंको ग्रहण तथा प्रतिकूल विषयोंका त्याग—जिसकी ये छः प्रकारकी शरणागति होगी, श्रीनन्दनन्दन श्रीकृष्ण एकमात्र उसीकी प्रार्थना सुनते हैं। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर दाँतोंमें तृण धारणकर दीनतापूर्वक श्रीरूपगोस्वामी व सनातन गोस्वामीजीके श्रीचरणोंको पकड़कर रोते–रोते कहते है कि मैं तो अत्यन्त ही अधम हूँ, आप कृपा करके शरणागति सिखाकर मुझे उत्तम बना दीजिए।

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