चिन्मय आनन्दरूपी अमृतके भण्डारस्वरूप श्रीहरिनामकी जय हो, जो और कोई नहीं स्वयं परतत्त्व (भगवान श्रीकृष्ण) ही अपने भक्तोंपर कृपाकर अक्षरके आकारमें नामरूपमें अवतरित हुए हैं तथा जगतके सभी जीवोंपर अपार कृपा की है। हरि, कृष्ण आदि नामोंकी जय हो, जो जगतके जीवोंके आश्रयस्वरूप हैं अर्थात् जिनका आश्रय ग्रहण करनेपर जीवको संसारमें जन्म–मरण चक्करसे विश्राम प्राप्त हो जाता है तथा जो समस्त जीवोंको आनन्द प्रदान करते हैं। मुनिवृन्द भी निरन्तर इन नामोंका आदरपूर्वक पुलकित होकर गान करते हैं। हे कृष्णनाम! आप सर्वशक्तिमान हैं, जीवोंका कल्याण करनेके लिए ही आपका अवतार हुआ है, क्योंकि आपकी कृपाके बिना कोई भी इस भवसागरको पार नहीं कर सकता। यदि कोई एक बार अवहेलापूर्वक भी (अश्रद्धापूर्वक) आपको पुकारता है, तो आप उसके समस्त प्रकारके तापोंको नष्ट कर देते हैं। परन्तु यदि कोई व्यक्ति दीन–हीन एवं अकिञ्चन होकर आपको पुकारता है, तो फिर आप और किसी प्रकारकी अपेक्षा नहीं रखते हैं। हृदयमें आपकी स्फूर्ति होते ही उसके ताप–दुःख–कष्ट सब दूर हो जाते हैं तथा उसके स्थूल व सूक्ष्म दोनों ही मायिक शरीर दूर हो जाते हैं एवं वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी कहते हैं—हे हरिनाम! आपकी जय हो। मैं सर्वदा आपके श्रीचरणोंकी आश लगाए बैठा रहूँगा। नारद मुनि, बाजाय वीणा, राधिकारमण–नामे। नाम अमनि, उदित हय, भकत–गीत–सामे॥
अमिय–धारा, वरिषे घन, श्रवण–युगले गिया। भकतजन, सघने नाचे, भरिया आपन हिया॥
माधुरी–पुर, आसव पशि, माताय जगत–जने। केह वा काँदे, केह वा नाचे, केह माते मने मने॥
पञ्चबदन, नारदे धरि, प्रेमेर सघन रोल। कमलासन, नाचिया बले, ‘बोल बोल हरिबोल’॥
सहस्रानन, परमसुखे, ‘हरि हरि’ ‘बलि’ गाय। नाम–प्रभावे, मातिल विश्व, नाम–रस सबे पाय॥
श्रीकृष्णनाम, रसने स्फुरि, पूराल आमार आश। श्रीरूप–पदे, याचये इहा, भकतिविनोद दास॥
परम रसिक श्रीनारद मुनि अपनी वीणाकी मधुर झंकारपर श्रीराधिकारमणका नाम गान करते हैं। जिस प्रकार वैदिक यज्ञमें सामवेदकी ऋचाओंका गान करनेसे यज्ञपति स्वयं प्रकट होकर यज्ञका फल ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार नारद गोस्वामी जैसे रसिक एवं भावुक भक्तोंके नाम संकीर्तनरूप साम गानको श्रवणकर नामी प्रभु श्रीराधारमण स्वयं प्रकट होकर नृत्य करते हुए भक्तोंके भावोंका आस्वादन करते हैं तथा उनके जीवनको धन्यातिधन्य कर देते हैं। तथा वह नामरूप अमृतकी धारा जब भक्तोंके कर्णछिद्रोंमें भी प्रविष्ट होती है तो उनलोगोंका हृदय आनन्दसे भर जाता है, जिससे प्रेममें आविष्ट होकर वे भी नाचने लगते हैं। यह धारा—नामामृतरूपी मदिरा माधुरीपुर (चित्तमें) पहुँचकर सारे जगतको मत्त कर देती है, जिसके प्रभावसे कोई रोने लगता है, तो कोई नाचने लगता है तथा कोई मन–ही–मन प्रमत्त हो जाता है। शिवजी नारदजीको पकड़कर प्रेमपूर्वक जोर–जोरसे नाम गाते हैं तथा ब्रह्माजी भी नाचते–नाचते “हरि बोल, हरि बोल” बोलने लगते हैं, शेषनागजी बहुत आनन्दित होकर “हरि हरि” बोलने लगते हैं। इस प्रकार नामके प्रभावसे सारा विश्व ही प्रमत्त हो जाता है तथा सभी ऐसे अद्भुत नामरसको प्राप्त कर लेते हैं। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी, श्रीरूपगोस्वामीजीके श्रीचरणोंमें प्रार्थना कर रहे हैं कि यह श्रीकृष्णनाम मेरी जिह्वापर स्फुरित होकर मेरी अभिलाषा पूर्ण करें। प्रभु! तव पदयुगे मोर निवेदन। नाहिं मागि देह–सुख, विद्या, धन, जन॥
नाहिं मागि स्वर्ग, आर मोक्ष नाहि मागि। ना करि प्रार्थना कोन विभूतिर लागि॥
निज–कर्म गुण–दोषे जे जे–जन्म पाइ। जन्मे–जन्मे जेन तव नाम–गुण गाइ॥
एइ मात्र आशा मम तोमार चरणे। अहैतुकी भक्ति हृदे जागे अनुक्षणे॥
विषये जे प्रीति एबे आछये आमार। सेइ मत प्रीति हउक चरणे तोमार॥
विपदे संपदे ताहा थाकुक समभावे। दिने–दिने वृद्धि हउक नामेर प्रभावे॥
पशु–पक्षी हये थाकि स्वर्गे वा निरये। तव भक्ति रहु भक्तिविनोद हृदये॥
हे प्रभु! आपके श्रीचरणोंमें मेरा यह निवेदन है कि मुझे शारीरिक सुख, जड़विद्या, धन–सम्पत्ति तथा जन (पुत्र, पत्नी आदि बन्धु–बान्धव) नहीं चाहिए। और न स्वर्गसुख, मोक्ष (मुक्ति) तथा योग विभूति (आठ प्रकारकी सिद्धियाँ) ही चाहिए। हे प्रभु! अपने कर्मोंके गुण एवं दोषोंके अनुसार अर्थात् सत्कर्म या दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप मैं जिस किसी भी उत्तम या निष्कृष्ट योनिमें जाउँ, मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि आपकी कृपासे मैं उन–उन योनियोंमें भी आपका गुणगान करता रहूँ। आपके श्रीचरणोंमें मेरी यही एकमात्र आशा है कि मेरे हृदयमें आपकी अहैतुकी भक्ति उदित हो जाय। हे प्रभु! विषयोंमें मेरी जैसी आसक्ति है, वैसी ही आसक्ति आपके श्रीचरणकमलोंमें हो जाय, जो दुःख अथवा सुखमें भी एक समान रहे तथा नामके प्रभावसे दिन–प्रतिदिन बढ़ती ही रहे। पदकर्त्ता श्रील भक्तिविनोदठाकुर दीनतापूर्वक कह रहे हैं—हे प्रभु! मैं चाहे पशुपक्षी आदिका शरीर प्राप्तकर स्वर्गमें रहूँ अथवा नरकमें, आप मुझपर इतनी कृपा करना कि मेरे हृदयमें आपकी भक्ति नित्यकाल विद्यमान रहे। अनादि करम–फले, पडि़’ भवार्णव–जले, तरिवारे ना देखि उपाय। ए विषय–हलाहले, दिवा–निशि हिया ज्वले, मन कभु सुख नाहि पाय॥
आशा–पाश शतशत, क्लेश देय अविरत, प्रवृत्ति–उर्मिर ताहे खेला। काम–क्रोध आदि छय, बाटपाड़े देय भय, अवसान हैल आसि’ बेला॥
ज्ञान–कर्म–ठग दुइ, मोरे प्रतारिया लइ, अवशेषे फेले सिन्धु–जले। ए हेन समये बन्धु, तुमि कृष्ण कृपासिन्धु, कृपा करि’ तोल मोरे बले॥
पतित किङ्करे धरि’, पादपद्मधूलि करि’, देह भक्तिविनोद आश्रय। आमि तव नित्यदास, भुलिया मायार पाश, बद्ध ह’ये आछि दयामय॥
अहो! मैं अनादि कालसे अनन्त कर्मोंके फलसे इस संसाररूपी सागरके जलमें पड़ा हुआ हूँ तथा इससे पार होनेका कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ। इस संसारके विषयरूपी विषसे मेरा हृदय दिन रात जल रहा है, एक क्षणके लिए भी मेरे मनको चैन नहीं है। सैकड़ों प्रकारकी सांसारिक आशाओंका बंधन मुझे निरन्तर क्लेश प्रदान कर रहा है। उसपर भी प्रवृत्तिरूपी लहरें खेल रही हैं अर्थात् नाना प्रकारके विषयोंको भोगनेकी इच्छाएँ और भी कष्ट प्रदान कर रही हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि छः डकैत मुझे भयभीत कर रहे हैं तथा अब तो मेरा जीवन भी समाप्त होने वाला है। ज्ञान व कर्मरूपी दो ठगोंने मेरा सब कुछ (परमार्थ) लूट लिया तथा अन्तमें इस भवसागरके जलमें फेंक दिया। अतः हे कृष्ण! आप तो कृपाके सागर हैं, अब ऐसी स्थितिमें आप ही मेरे एकमात्र बंधु हैं। कृपा करके मुझे बलपूर्वक इस भवसागरसे ऊपर उठा लीजिए। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी कहते हैं—हे दयामय! अपने इस पतित किङ्करको अपनी चरणधूलि बनाकर आश्रय प्रदान कीजिए; क्योंकि मैं आपका नित्यदास हूँ। परन्तु मायाके फंदेमें फंसकर मैं आपको भूला हुआ हूँ। तुहुँ दया–सागर तारयिते प्राणी। नाम अनेक तुया शिखाओलि आनि॥
सकल शकति देइ नामे तोहारा। ग्रहणे राखिल नाहि काल–विचारा॥
श्रीनामचिन्तामणि तोहारि समाना। विश्वे बिलाओलि करुणा–निदाना॥
तुया दया ऐछन परम उदारा। अतिशय मन्द, नाथ! भाग हामारा॥
नाहि जनमल नामे अनुराग मोर। भकतिविनोद–चित्त दुःखे विभोर॥
हे प्रभो! आप तो दयाके सागर हैं, जगतके जीवोंपर कृपा करनेके लिए एवं उनका उद्धार करनेके लिए ही आपने अनेक नामोंको जगतमें प्रकाशितकर अपनी समस्त शक्ति उन नामोंमें भर दी है तथा उन नामोंके कीर्तनमें किसी प्रकारका स्थान एवं कालका विचार भी नहीं रखा है अर्थात् किसी भी समय किसी भी अवस्थामें और किसी भी स्थानपर नामसंकीर्तन किया जा सकता है। हे नाथ! श्रीनामचिन्तामणि आपके समान ही है, जिसको करुणापूर्वक आपने सारे विश्वमें वितरण कर दिया। आप तो परम उदार हैं, आपकी ऐसी अहैतुकी कृपा होनेपर भी, यह तो मेरा ही महादुर्भाग्य है, कि ऐसे नाममें मेरी रुचि नहीं हो रही है। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी दीनतापूर्वक कह रहे हैं—मेरा चित्त इसी दुःखसे विभोर है।