Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीनगर–कीर्तन

Bhaktivinoda Ṭhākura5 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaHarinam
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बड़ सुखेर खबर गाई।सुरभि–कुञ्जेते नामेर हाट खुलेछे खोद–निताइ॥
बड़ मजार कथा ताय।श्रद्धा मूल्ये शुद्धनाम सेइ हाटेते बिकाय॥
यत भक्तवृन्द बसि।अधिकारी देखे’ नाम वेचछे दर कषि॥
यदि नाम किनबे भाई।तुमि किनबे कृष्णनाम।दस्तुरि लईब आमि, पूर्ण ह’बे काम॥
बड़ दयाल नित्यानन्द।श्रद्धामात्र लये देन परम आनन्द॥
एकबार देखले चक्षे जल।गौर बले निताइ देन सकल सम्बल॥
देन शुद्ध कृष्ण–शिक्षा।जाति, धन, विद्याबल ना करे अपेक्षा॥
अमनि छाड़े मायाजाल।गृहे थाके, वने थाके, ना थाके जञ्जाल॥
आर नाइको कलिर भय।आचण्ड़ाले देन नाम निताइ दयामय॥
भकतिविनोद डाकि’ कय।निताइचाँदेर चरण बिना आर नाहि आश्रय॥

श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी सभीको आह्वान करते हुए कह रहे हैं कि मैं बड़े सुखका समाचार सभीको सुना रहा हूँ कि स्वयं श्रीनित्यानन्द प्रभुने सुरभी कुंजमें नामका बाजार खोल दिया है। उससे भी अधिक आनन्दकी बात यह है कि वे केवल मात्र श्रद्धारूपी मूल्यको लेकर नामको बेच रहे हैं। जितने भी भक्तवृन्द आते हैं, उनमेंसे वे अधिकारी देखकर दाम बढ़ाते हुए नाम बेच रहे हैं। हे भाई! यदि नाम खरीदनेकी इच्छा है, तो मेरे साथ चलो, तुम्हें महाजनके पास ले जाऊँ। यदि तुम कृष्णनाम खरीदना चाहते हो, तो मैं उसमें दस्तुरी (Commission ) लूँगा, जिससे मेरी अभिलाषा भी पूर्ण हो जायेगी अर्थात् मेरा भी उद्धार हो जायेगा। श्रीनित्यानन्द प्रभु बड़े दयालु हैं, केवल श्रद्धा लेकर ही परम आनन्दमय प्रेमको प्रदान करते हैं। यदि वे किसीकी आँखोंसे एकबार भी अश्रु बहते हुए देख लेते हैं, तो गौर कहकर सम्पूर्ण प्रेम–धन उसे प्रदान कर देते हैं। वे जाति, धन, विद्याका बल, पौरुष इत्यादिकी अपेक्षा नहीं करके शुद्ध रूपसे कृष्ण–विषयक शिक्षा प्रदान करते हैं, जिससे मायारूपी जाल भी दूर चला जाता है। फिर कोई घरमें रहे अथवा वनमें रहे उसे किसी प्रकारकी कोई असुविधा नहीं होती, यहाँ तक कि कलिका भी कोई भय नहीं रहता। जो नित्यानन्द प्रभु आचण्डाल अर्थात् चण्डाल सहित सभीको नाम प्रदान करके उनका उद्धार करते हैं, ऐसे दयामय श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरण बिना मेरा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। गाय गोरा मधुर स्वरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

गृहे थाको वने थाको, सदा हरि बले डाको, सुखे दुःखे भुल नाको। बदने हरिनाम कर रे॥

मायाजाले बद्ध ह’ये, आछ मिछे काज ल’ये, एखनओ चेतन पे’ये। राधा–माधव नाम बल रे॥

जीवन हइल शेष, ना भजिले हृषीकेश, भक्तिविनोद–(एइ) उपदेश, एक बार नामरसे मात रे॥

अहो! स्वयं भगवान श्रीगौरसुन्दर अत्यन्त ही सुमधुर स्वरसे ‘हरे कृष्ण’ महामंत्रका कीर्तन कर रहे हैं। अतः हे भाइयो! आप लोग भी घरमें रहें या वनमें अर्थात् गृहस्थाश्रममें रहें या त्यागी आश्रममें अथवा सुखमें रहें या दुःखमें सदैव भगवानका कीर्तन करें। आप लोग माया जालमें आबद्ध होनेके कारण व्यर्थ ही सांसारिक कामोंमें व्यस्त हैं। अब तो होशमें आओ तथा राधामाधवका नाम लो। अरे! व्यर्थके कार्योंमें तुम्हारा तो सारा जीवन ही बीत गया, परन्तु तुमने कभी हृषीकेश (कृष्ण) का भजन नहीं किया। श्रीभक्ति विनोदठाकुर यही उपदेश प्रदान कर रहे हैं—अरे भाइयो! एक बार तो नामरसमें निमग्न हो जाओ। राधाकृष्ण बल् बल् बल रे सबाइ। (एइ) शिक्षा दिया, सब नदीया, फिर्छे नेचे’ गौर–निताइ। (मिछे) मायारवशे’, जाच्छ भेसे, खाच्छ हाबुडुबु, भाइ॥१॥

(जीव) कृष्णदास, ए विश्वास, कर्’ले त’ आर दुःख नाइ। (कृष्ण) बल्बे जबे, पुलक ह’बे, झ’र्बे आँखि, बलि ताइ॥२॥

(राधा) कृष्ण बल, सङ्गे चल, एइमात्र भिक्षा चाइ। (जाय) सकल विपद, भक्तिविनोद, बलेन, जखन ओ–नाम गाइ॥३॥

श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुजी नवद्वीपमें नृत्य करते हुए भ्रमण कर रहे हैं तथा जीवोंको शिक्षा दे रहे हैं—अरे भाइयो! सभी लोग मिलकर “राधाकृष्ण” का नाम लो। तुम लोग व्यर्थ ही मायाके वशीभूत होकर संसारके स्रोतमें (जन्ममरणके स्रोतमें) बहते हुए कभी पानीमें डूब रहे हो तो कभी एक क्षणके लिए ऊपर आ रहे हो अर्थात् कभी तो अत्यन्त दुःख भोग रहे हो तो कभी एक क्षणके लिए सुख आ जानेपर आनन्दित हो जाते हो। इस प्रकार अनादि कालसे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है। परन्तु यदि मात्र एकबार भी तुम्हें यह ज्ञान हो जाए कि “मैं कृष्णका दास हूँ” तो फिर तुम्हें ये दुःख–कष्ट नहीं मिलेंगे तथा जब “कृष्ण” नाम उच्चारण करोगे तो तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाएगा तथा आँखोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगेगी। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—अरे भाई! मैं आप लोगोंसे यही भिक्षा माँगता हूँ कि तुम कृष्ण बोलो, क्योंकि जब कोई व्यक्ति कृष्णनामका गान करता है तो उसी क्षण समस्त प्रकारकी विपदाएँ दूर हो जाती है। गाय गोराचांद जीवेर तरे। हरे कृष्ण हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे कृष्ण हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे॥

एकबार बल रसना उच्चैःस्वरे, (बल) नन्देर नन्दन, यशोदा–जीवन, श्रीराधारमण, प्रेम–भरे॥

(बल) श्रीमधुसूदन, गोपी–प्राणधन, मुरलीवदन, नृत्य करे। (बल) अघ–निसूदन, पूतना–घातन, ब्रह्म–विमोहन, ऊद्ध्र्व–करे॥

अहो! स्वयं भगवान श्रीगौरसुन्दर जीवोंका उद्धार करनेके लिए ‘हरे कृष्ण’ महामंत्रका कीर्तन कर रहे हैं। अतः श्रीभक्तिविनोदठाकुर कह रहे हैं—हे मेरी जिह्वा! तू एकबार तो उच्चस्वरसे प्रेमपूर्वक श्रीनन्दनन्दन, श्रीयशोदाजीवन, श्रीराधा रमण, इत्यादिका नामोंका कीर्तन कर। जो मधुसूदन हैं अर्थात् मधु नामक दैत्यके हन्तारक हैं अथवा जो गोपियोंके मधुरूपी प्रेमरसका आस्वादन करनेवाले हैं जो गोपियोंके प्राणधन हैं, जिनके अधरोंपर मुरली विद्यमान रहती है तथा जो सुन्दर नृत्य करते हैं, और जो अघासुर तथा पूतना आदि राक्षसोंका संहार करनेवाले हैं एवं ब्रह्माजीको भी मोहित करनेवाले हैं, उनका नाम ले।

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