Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

अरुणोदय–कीर्तन

Bhaktivinoda Ṭhākura3 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuHarinamBhakti
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उदिल अरुण पूरब भागे,द्विजमणि गोरा अमनि जागे,भकतसमूह लइया साथे,गेला नगर–ब्राजे।‘ताथइ ताथइ’ बाजल खोल,घन घन ताहे झाँ’जेर रोल,प्रेमे ढल ढल सोनार अङ्ग,चरणे नूपुर बाजे॥
मुकुन्द माधव यादव हरि,बलरे बलरे बदने भरि’,मिछे निद–वशे गेलोरे रातिदिवस शरीर साजे।एमन दुर्लभ मानव देह,पाइया कि कर, भावना केह,एबे ना भजिले यशोदा–सुत,चरमे पडि़बे लाजे॥
उदित तपन हइले अस्त,दिन गेल बलि’ हइबे व्यस्त,तबे केन एबे अलस हइ’,ना भज हृदयराजे।जीवन अनित्य जानह सार,ताहे नानाविध विपद भार,नामाश्रय करि’ यतने तुमिथाकह आपन काजे॥
कृष्णनाम सुधा करिया पान,जुड़ाओ ‘भकतिविनोद’–प्राण,नाम बिना किछु नाहिक आर,चौद्द भुवन माझे।जीवेर कल्याणसाधन–काम,जगते आसि ए मधुर नाम,अविद्या–तिमिर–तपनरूपे,हृदगगने विराजे॥

जैसे ही पूर्वदिशामें अरुणोदय हो गया, उसी क्षण द्विजमणि गौरसुन्दर जाग गये तथा भक्तोंके समूहको साथ लेकर नगरभ्रमणके लिए चल पड़े। “ताथइ–ताथइ” की मधुर ध्वनिसे मृदंग एवं उसीके तालसे ताल मिलाकर झाँझर इत्यादि वाद्य बजने लगे, जिससे प्रेममें आविष्ट होकर श्रीगौरसुन्दरका तपे हुए सोनेके रंग जैसा श्रीअंग ढल ढल करने लगा अर्थात् वे नृत्य करने लगे तथा नृत्य करते हुए उनके श्रीचरणोंके नूपुर बजने लगे। अरे भाइयो! तुम लोगोंने रात तो सोते–सोते एवं दिनको शरीरके शृंगारमें व्यतीत कर दिया, परन्तु भगवानका भजन नहीं किया; अतः मुकुन्द, माधव, यादव, हरि इत्यादि भगवन्नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करो। तुम स्वयं विचार करो कि ऐसा दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त करके भी तुम लोग क्या कर रहे हो? ऐसा दुर्लभ मानव शरीरके प्राप्त होनेपर भी यदि यशोदानन्दन श्रीकृष्णका भजन नहीं किया, तो तुम्हारे लिए यह बहुत लज्जाकी बात है। सूर्यके अस्त होनेपर सन्ध्या जानकर तू व्यस्त होगा अर्थात् वृद्धावस्थामें तुम भजन प्रारम्भ करोगे, तो फिर अभी क्यों आलस्य कर रहे हो। हृदयराज श्रीकृष्णका भजन अभीसे क्यों नहीं आरम्भ कर देते? इतना जान लो एक तो यह जीवन अनित्य है तथा उसपर भी इस जीवनमें नाना प्रकारकी विपदाएँ हैं। अतः तुम सावधानीपूर्वक अर्थात् आग्रहपूर्वक नामका आश्रय ग्रहण करो तथा केवल जीवन निर्वाहके उपयोगी सांसारिक व्यवहार करो। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—आप लोग कृष्णनामरूपी अमृतका पान करें जिससे मुझे सान्त्वना प्राप्त होगी। इन चौदह भुवनोंमें श्रीहरि नामके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। जीवोंका कल्याण करनेके लिए ही यह सुमधुर नाम जगतमें प्रकटित हुए, जो अज्ञानरूपी अंधकारसे परिपूर्ण हृदयरूपी आकाशमें सूर्यकी भाँति उदित होकर सारे अज्ञानको दूर कर प्रेमाभक्तिको प्रकाशित कर देते हैं। जीव जागो, जीव जागो, गोराचाँद बले। कत निद्रा जाओ माया–पिशाचीर कोले॥

भजिबो बलिया एसे संसार भीतरे। भुलिया रहिले तुमि अविद्यार भरे॥

तोमारे लइते आमि हइनु अवतार। आमि बिना बन्धु आर के आछे तोमार॥

एनेछि औषधि माया नाशिवार लागि। हरिनाम महामन्त्र लओ तुमि मागि॥

भकतिविनोद प्रभु–चरणे पडि़या। सेइ हरिनाम–मन्त्र लइल मागिया॥

श्रीगौरसुन्दर कह रहे हैं—अरे जीव! जागो, जागो, और कितनी देर तक मायारूपी पिशाचीकी गोदमें सोयेगा। तू इस जगतमें “मैं भजन करूँगा”, ऐसी प्रतीज्ञा करके आया था। परन्तु जगतमें आकर अविद्या (माया) में फंसकर तू सब भूल गया है। अतः तुझे लेनेके लिए मैं स्वयं ही इस जगतमें अवतरित हुआ हूँ। अब तू स्वयं विचार कर कि मेरे अतिरिक्त तेरा बन्धु और कौन है? मैं मायाका विनाश करनेवाली औषधि “हरिनाम महामंत्र” लेकर आया हूँ। अतः तुम मुझसे वह महामंत्र मांग लो। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजीने भी श्रीमन्महाप्रभुके श्रीचरणोंमें गिरकर वह हरिनाम मंत्र माँग लिया है।

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