Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीकृष्ण–भजन–निष्ठा

Narottama Dāsa Ṭhākura4 min read
KrishnaRadhaJagannathRasaBhakti
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ब्रजेन्द्रनन्दन, भजे जेइ जन,सफल जीवन ता’र।ताहार उपमा, वेदे नाहि सीमा,त्रिभुवने नाहि आर॥
एमन माधव, ना भजे मानव,कखन मरिया जाबे।सेइ से अधम, प्रहारिया यम,रौरवे कृमिते खाबे॥
तार पर आर, पापी नाहि छार,संसार जगत–माझे।कौनकाले तार, गति नाहि आर,मिछाइ भ्रमिछे काजे॥
श्रीलोचनदास, भकतिर आश,हरिगुण कहि लिखि।हेन रस–सार, मति नाहि जारता’र मुख नाहि देखि॥

अहो! जो ब्रजेन्द्रनन्दनका भजन करता है उसीका जन्म सफल है। त्रिभुवनमें उसके समान कोई नहीं है। उसकी महिमाका वर्णन तो वेद भी सम्पूर्ण रूपसे नहीं कर सकते। ऐसे श्रीमाधवका जो भजन नहीं करता; मरनेके बाद उसे यमराज दण्ड प्रदान करते हैं तथा रौरव नामक नरकमें उसे कीड़े खाते हैं। क्योंकि उसके समान इस संसारमें और कोई पापी नहीं है। सांसारिक अनित्य व क्लेशदायक कार्योंको करते हुए किसी कालमें उसका उद्धार नहीं हो सकता। श्रीलोचनदास ठाकुरजी कह रहे हैं—मैं भक्ति प्राप्तिकी आशासे ही भगवानके गुणोंका वर्णन कर रहा हूँ। ऐसे रसके सार स्वरूप भगवान ब्रजेन्द्रनन्दनके श्रीचरणकमलोंमें जिसकी मति नहीं हुई, मैं उसका मुख भी नहीं देखना चाहता। हरि हरि! कबे हबो वृन्दावनवासी। निरखिब नयने युगल–रूपराशि॥

त्यजिया शयन सुख विचित्र पालङ्क। कबे ब्रजेर धूलाय धूसर ह’बे अङ्ग॥

षड्रस भोजन दूर परिहरि। कबे ब्रजे मागिया खाइबो माधुकरी॥

परिक्रमा करिया बेड़ाबो बने–बने। विश्राम करिबो जाइ यमुना पुलिने॥

ताप दूर करिबो शीतल वंशीवटे। (कबे) कुञ्जे–बैठबो हाम वैष्णव–निकटे॥

नरोत्तम दास कहे करि’ परिहार। कबे वा एमन दशा हइबे आमार॥

हे हरि! मैं कब वृन्दावनवासी होकर अपनी आँखोंसे श्रीराधाकृष्ण युगलके अपूर्व रूप–सौन्दर्यका दर्शन करूँगा? विचित्र पलङ्कपर शयनसुखका परित्यागकर कब ब्रजकी धूलिमें लोटनेसे मेरा शरीर धूलसे भर जाएगा तथा कब छः प्रकारके स्वादपूर्ण भोजनका परित्यागकर ब्रजमें माधुकरी माँगकर खाऊँगा? परिक्रमा करते–करते थक जानेपर एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते हुए यमुनाके किनारे जाकर विश्राम करूँगा? कब वंशीवटकी सुशीतल छायामें बैठकर ताप दूर करूँगा तथा कब कुञ्जोंमें वैष्णवोंके निकट बैठूँगा। श्रीनरोत्तमदास ठाकुर कह रहे हैं—अहो! मेरी ऐसी दशा कब होगी? आत्म–निवेदन हरि हे दयाल मोर जय राधानाथ। बारबार एइबार लह निज साथ॥१॥

बहु योनि भ्रमि’ नाथ, लइनु शरण। निजगुणे कृपा कर अधमतारण॥२॥

जगत–कारण तुमि जगत–जीवन। तोमा छाड़ा का’र नहि हे राधारमण॥३॥

भुवनमङ्गल तुमि भुवनेर पति। तुमि उपेक्षिले नाथ, कि हइबे गति॥४॥

भाविया देखिनु एइ जगत–माझारे। तोमा बिना केह नाहि ए दासे उद्धारे॥५॥

हे हरि! हे मेरे राधानाथ! आपकी जय हो। मैं पुनः पुनः आपके श्रीचरणकमलोंमें निवेदन करता हूँ कि एक बार आप मुझे अपनी शरणमें ले लो। हे नाथ! मैं बहुत योनियोंमें भ्रमण करनेके बाद आपकी शरणमें आया हूँ। अतः आप अपने गुणोंके द्वारा इस अधमका भी उद्धार करें। हे राधारमण! आप तो जगतके कारण एवं जीवनस्वरूप हैं। आपके अतिरिक्त मेरा और कोई सहारा नहीं है। हे नाथ! आप त्रिभुवनके लिए मंगलस्वरूप तथा जगतके नाथ हैं, अतः यदि आप मेरी उपेक्षा कर देंगे, तो मेरी क्या गति होगी? हे प्रभो! मैंने विचारकर देखा कि इस संसारमें आपके अतिरिक्त कोई दूसरा मेरा उद्धार नहीं कर सकता। माधव, बहुत मिनति करि तोय। देइ तुलसी तिल, देह समर्पिनु, दया जानि ना छाड़बि मोय॥

गणइते दोष, गुणलेश ना पाओबि, जब तुर्हुं करबि विचार। तुहुँ जगन्नाथ, जगते कहाओसि, जग–बाहिर नहि मुञि छार॥

किये मानुष पशु–पाखी ये जनमिये, अथवा कीट–पतङ्गे। करम–विपाके, गतागति पुनः पुनः, मति रहु तुया परसङ्गे॥

भनये विद्यापति, अतिशय कातर, तरइते इह भवसिन्धु। तुया पदपल्लव, करि अवलम्बन, तिल एक देह दीनबन्धु॥

हे माधव! मैं आपके श्रीपादपद्मोंमें बहुत विनति करता हूँ। मैं आपके चरणोंमें तिल व तुलसी देकर अपनी इस देहको समर्पित करता हूँ, परन्तु मैं आपकी दया तभी समझँूगा जब आप मुझे नहीं छोडं़ेगे अर्थात् स्वीकार कर लेंगे। मेरे दोषोंकी गिनती करते हुए जब आप मेरे प्रति विचार करेंगे, तब तो आपको मुझमें गुणोंका लेशमात्र भी नहीं मिलेगा। परन्तु हे भगवान! आप तो जगत्में जगन्नाथके नामसे परिचित हैं, और मैं अधम भी तो इस जगतसे बाहर नहीं हूँ, अर्थात् आप मेरे भी नाथ हैं। अतः मुझे मेरे कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट–पतंग इत्यादि किसी भी योनिमें पुनः पुनः आना जाना क्यों न पड़े, परन्तु मेरी केवल यही प्रार्थना है कि मेरा चित्त आपकी कथाओंमें लगा रहे। अत्यधिक कातर होकर यह विद्यापति भवसिन्धुसे पार होनेके लिए आपके श्रीचरणकमलोंको अवलम्बन करके आपसे प्रार्थना करता है कि हे दीनबन्धो! आप अपनी कृपाका कमसे कम तिलमात्र ही मुझे प्रदान करें।

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