हे गोपीनाथ! कृपा करके आप मेरा एक निवेदन सुनिये। मैं अत्यन्त ही विषयी, दुर्जन तथा कामके वशीभूत हूँ, मेरे अन्दर किसी प्रकारका कोई गुण भी नहीं है। मैं तो आपका दास हूँ, आपके श्रीचरणोंमें मैंने शरण ग्रहण की है। क्योंकि एकमात्र आपपर ही मुझे पूरा भरोसा है। हे गोपीनाथ! आप मुझे किस प्रकार सुधारेंगे, क्योंकि मैं भक्तिके विषयमें कुछ भी नहीं जानता तथा मेरी जड़मति कर्मोंमें लगी हुई है, जिसके फलस्वरूप मैं इस घोर संसारमें पड़ा हुआ हूँ। हे गोपीनाथ! यह सब तो आपकी ही माया है। मेरा बल व ज्ञान नहीं है कि मैं उससे पार हो जाऊँ और न ही मेरा शरीर स्वतन्त्र है अर्थात् मेरा शरीर पूर्व–पूर्व जन्मोंके कर्मोंके अधीन है। अतः हे गोपीनाथ! यह पामर व्यक्ति रोते–रोते आपसे यही माँग रहा है कि आप कृपापूर्वक मुझे अपने श्रीचरणोंमें स्थान दीजिए। क्योंकि आप सब कुछ कर सकते हैं। आप तो दुर्जनोंको भी तार सकते हैं। अतः मुझ पापीका भी उद्धार कीजिए क्योंकि आपके अतिरिक्त इस पापीका और कौन है? हे गोपीनाथ! आपकी कृपा तो असीम है, जीवोंपर कृपापूर्वक उनका उद्धार करनेके लिए ही आप इस जगतमें आकर सुन्दर मनोहारिणी लीलाएँ करते हैं। श्रीभक्तिविनोद ठाकुरजी कहते हैं—हे गोपीनाथ! समस्त असुरोंने भी आपके श्रीचरणोंको प्राप्त कर लिया है। परन्तु मैंने ऐसा कौनसा दोष किया है कि अभी तक मुझपर आपकी कृपा नहीं हुई। हरि हरि! कृपा करि’ राख निज पदे। काम–क्रोध छय जने, लइया फिरे नानास्थाने, विषयभुञ्जाय नानामते॥
हइया मायार दास, करि नाना अभिलाष, तोमार स्मरण गेल दूरे। अर्थलाभ एइ आशे, कपट वैष्णव–वेशे, भ्रमिया बुलये घरे घरे॥
अनेक दुःखेर परे, लयेछिल ब्रजपुरे, कृपाडोर गलाय बाँधिया। दैवमाया बलात्कारे, खसाइया सेइ डोरे, भवकूपे दिलेक डारिया॥
पुनः यदि कृपा करि, ए जनार केशे धरि, टानिया तुलह ब्रजधामे। तबे से देखिये भाल, नतुवा पराण गेल, कहे दीन दास नरोत्तमे॥
हे हरि! आप कृपा करके मुझे अपने चरणोंमें रखिए। काम, क्रोध आदि छः शत्रु मुझे इधर–उधर ले जाकर अनेक प्रकारसे विषयोंका भोग कराते हैं। अब मैं मायाका दास बनकर अनेक प्रकारकी अभिलाषाएँ करता हूँ, जिससे आपका स्मरण दूर हो गया है। अर्थ प्राप्तिकी आशासे कपट वैष्णव–साधुका वेष धारण करके घर–घरमें घूमता रहता हूँ। आपने मुझे बड़े दुःखोंके पश्चात् कृपारूपी रस्सीको गलेमें बाँधकर ब्रजपुरमें लिया था, परन्तु दैवी मायाने बलपूर्वक उस डोरको खोलकर संसार कूपमें डाल दिया। आप यदि पुनः कृपा करके इस दीनको केशाकर्षण कर ब्रजधाममें खींच लेंगे, तब तो अच्छा है, नहीं तो इस दीन नरोत्तम दासके प्राण तो ऐसे ही निकल जायेंगे।