अहो! उसीका जन्म सार्थक है, सौभाग्यवश जिसको कृष्णका दर्शन हो गया है। क्योंकि अन्तर्दृष्टिसे (भक्तिनेत्रोंसे) कृष्णका दर्शन करनेपर जीवके चित्तका समस्त विकार (काम, क्रोध आदि अनर्थ) दूर हो जाते हैं। वे वनमाली वृन्दावनकेलिमें चतुर हैं, उनका वंशी धारण किए हुआ त्रिभंगरूप अत्यन्त ही रसमय है एवं वे गुणोंके भण्डार स्वरूप हैं। उनके श्रीअंगका वर्ण नवीन मेघके समान है, सिरपर मयूरपंख एवं ललाटपर तिलक एवं अलकावलि सुशोभित हो रही है। उन्होंने पीले वस्त्र धारण किए हैं, तथा श्रीमुख कमलपर मन्द–मन्द मधुर मुस्कान है। उनका ऐसा रूप सारे जगतको प्रमत्त करता है। अहो! कदम्ब वृक्षकी जड़में (नीचे) इन्द्रनीलमणिकी सुन्दरताको भी पराभूत करने वाले कृष्णके रूपका दर्शनकर मेरा मन तो उचट गया है, चरण भी नहीं चलते इस प्रकार मैं तो संसारको ही भूल गया। हे सखि! उनकी रूपमाधुरी अमृतमय है। जो उसका दर्शनकर लेता है, वह अचेतन हो जाता है तथा उसके नेत्रोंसे प्रेमाश्रु प्रवाहित होने लगते हैं। उनके सिरपर मुकुट, हाथोंमें वंशी एवं त्रिभंगरूप तथा उनके श्रीचरणकमलोंमें अमृत छलक रहा है जिनमें नूपुर बंधे हुए हैं। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर कह रहे हैं—मैं सदैव यही आशा करता हूँ कि भृंग (भौंरा) रूप धारणकर श्रीचरणकमलोंमें अनायास ही स्थान प्राप्तकर निरन्तर कृष्णका गुणगान करता रहूँ। इसके अतिरिक्त और किसीका भजन नहीं करूँगा। बन्धुसंगे यदि तव रङ्ग परिहास, थाके अभिलाष, तबे मोर कथा राख, जेयो नाको जेयो नाको, मथुराय केशीतीर्थ–घाटेर सकाश॥
गोविन्द विग्रह धरि, तथाय आछेन हरि, नयने बङ्किम दृष्टि, मुखे मन्दहास। किवा त्रिभंगम ठाम, वर्ण समुज्ज्वल श्याम, नवकिशलय शोभा श्रीअङ्गे प्रकाश॥
अधरे वंशीटी तार, अनर्थेर मूलाधार, शिखिचूड़ाकेओ भाई करो ना विश्वास॥
से मूर्ति नयने हेरे, केह नाहि घरे फिरे, संसारी गृहीर जे गो हय सर्वनाश। घटिबे विपद भारी, जेयो नाको हे संसारि, मथुराय केशीतीर्थ–घाटेर सकाश॥
हे भाई! बन्धु–बान्धवोंके साथ यदि तेरी हास–परिहास करनेकी अभिलाषा हो तो मेरी एक बात मानो, मथुरा (वृन्दावन) में केशी घाटके निकट भूलकर भी मत जाना। वहाँ श्रीहरि गोविन्दजीके रूपमें विराजमान हैं जिनकी बंकिम दृष्टि एवं श्रीमुखकमलपर मन्द–मन्द मुस्कान है। तथा उनका क्या ही सुन्दर त्रिभंगस्वरूप है, उनका वर्ण उज्ज्वल श्यामवर्ण है। उनके अधरोंपर वंशी विराजमान रहती है, जो समस्त अनर्थोंकी मूल आधार है। तथा शिरपर धारण किए हुए मयूरपुच्छका भी विश्वास मत करना। इस स्वरूपको जो अपने नेत्रोंसे एकबार भी दर्शन करता है, वह फिर वापिस घर नहीं लौटता। इस प्रकार संसारी व्यक्तिका सर्वनाश ही हो जाता है। इसीलिए मेरे मनमें भय बैठा है। अतः हे संसारी व्यक्ति! मथुरामें केशीघाटके निकट कभी मत जाना, नहीं तो भयंकर विपदमें फंस जाओगे।