हे राधे! हे कृष्णचन्द्र! भक्तप्राण।पामरे युगल–भक्ति कर’ दान॥
भक्तिहीन बलि’ ना कर’ उपेक्षा।मूर्खजने देह’ ज्ञान–सुशिक्षा॥
विषय–पिपासा–प्रपीडि़त दासे।देह’ अधिकार युगल–विलासे॥
चञ्चल–जीवन– स्रोत प्रवाहिया,कालेर सागरे धाय।गेल ये दिवस, ना आसिबे आर,एबे कृष्ण कि उपाय॥
तुमि पतितजनेर बन्धु।जानि हे तोमारे नाथ,तुमि त करुणा–जलसिन्धु॥
आमि भाग्यहीन, अति अर्वाचीन,ना जानि भकति–लेश।निज–गुणे नाथ, कर आत्मसात्,घुचाइया भव–क्लेश॥
सिद्ध देह दिया, वृन्दावन माझे,सेवामृत कर दान।पियाइया प्रेम, मत्त करि’ मोरे,सुन निज गुणगान॥
युगल सेवाय, श्रीरासमण्डले,नियुक्त कर आमाय।ललिता सखीर, अयोग्या किङ्करी,विनोद धरिछे पाय॥
श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंमें यह मन किस प्रकार ऐकान्तिकरूपसे शरणागत होगा। यह अधमदास बहुत समयसे उन श्रीचरणोंकी आश लगाये बैठा है। अतः भक्तोंके प्राणस्वरूप हे राधे! हे कृष्णचन्द्र! इस पामरको भी कृपाकर युगलभक्ति प्रदान कीजिए। भक्तिहीन जानकर आप मेरी उपेक्षा न करें; बल्कि कृपापूर्वक इस मूर्खको तत्त्वज्ञान और भजन शिक्षा प्रदान करें, जिससे कि यह आपकी सेवा कर सके। विषयोंकी तृष्णासे विशेषरूपसे पीडि़त इस दासको श्रीयुगलकी सेवाका अधिकार प्रदान कीजिए। यह चंचल जीवनधारा कालरूपी सागरकी ओर प्रवाहित हो रहा है। इस प्रकार मेरे जीवनका जो अमूल्य समय व्यर्थ ही चला गया वह तो लौटकर नहीं आयेगा। अतः हे कृष्ण! अब इस कालसे बचनेका क्या उपाय करूँ? हे नाथ! आप तो करुणाके सागर हैं तथा मेरे जैसे पतितोंके परम बन्धु हैं। परन्तु मैं अत्यन्त ही दुर्भागा हूँ, भक्तिके विषयमें मुझे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। हे नाथ! आप अपने गुणोंके द्वारा मुझे अपनी शरण प्रदानकर इस संसाररूपी क्लेशसे अर्थात् जन्म–मरणरूप क्लेशसे बचाइए। आप मुझे सिद्ध देह प्रदानकर वृन्दावनमें अपने श्रीचरणोंका सेवारूपी अमृत प्रदान कीजिए तथा मुझे अपना प्रेमामृत पान कराकर इस प्रकार मत्तकर दीजिए कि मैं सर्वदा आपका गुणगान करता रहूँ। पदकर्त्ता श्रीभक्तिविनोद ठाकुर ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं—हे कृष्ण! आप मुझे श्रीरासमण्डलमें युगलकी सेवामें नियुक्त कीजिए। ललिता सखीकी अयोग्या किंकरी मैं आपके चरणोंको पकड़ रहा हूँ।