राधाकृष्ण युगल किशोर ही मेरे प्राणस्वरूप हैं। इस जीवनमें उनके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई गति (आश्रय) नहीं है। कब मैं कालिन्दीके किनारेपर स्थित कदम्बवृक्षोंके वनमें रत्नजडि़त सिंहासनपर दोनोंको बैठाकर उनके श्रीअंगोंमें चन्दन प्रदान करूँगा तथा चामर ढुलाते हुए उनके श्रीमुखकमलका दर्शन करूँगा? मैं कब मालती फूलोंकी माला गूँथकर दोनोंके गलेमें पहनाऊँगा, उनके अधरोंपर कर्पूरयुक्त सुगन्धित ताम्बूल अर्पण करूँगा तथा ललिता, विशाखा आदि जितनी भी सखियाँ हैं, उनकी आज्ञानुसार दोनोंके श्रीचरणकमलोंकी सेवा करूँगा। श्रीनरोत्तमदास ठाकुरजी श्रीमन्महाप्रभुके दासोंके अनुदासोंकी सेवाकी अभिलाषा करते हैं। कबे कृष्णधन पाब, हियार माझारे थोब, जुड़ाइब तापित पराण। साजाइया दिव हिया, वसाइव प्राणप्रिया, निरखिब से चन्द्रवयान॥
हे सजनि! कबे मोर हइबे सुदिन। से प्राणनाथेर सङ्गे, कबे वा फिरिब रङ्गे, सुखमय यमुनापुलिन॥
ललिता विशाखा लइया, ताँहारे भेटिब गिया, साजाइया नाना उपहार। सदय हइया विधि, मिलाइबे गुणनिधि, हेन भाग्य हइबे आमार॥
दारुण विधिर नाट, भाङ्गिल प्रेमेर हाट, तिलमात्र ना रखिल तार। कहे नरोत्तमदास, कि मोर जीवने आश, छाडि़ गेल ब्रजेन्द्रकुमार॥
देखिते देखिते, भुलिब वा कबे, निज स्थूल परिचय। नयने हेरिबो, व्रजपुर शोभा, नित्य चिदानन्दमय॥१॥
वृषभानुपुरे, जनम लईबो, जावटे विवाह ह’बे। व्रजगोपी–भाव, हइबे स्वभाव, आन भाव ना रहिबे॥२॥
निज सिद्धदेह, निज सिद्धनाम, निजरूप, स्ववसन। राधाकृपा–बले, लभिब वा कबे, कृष्णप्रेम – प्रकरण॥३॥
यामुन सलिल, आहरणे गिया, बुझिबो युगल–रस। प्रेममुग्ध हये, पागलिनी प्राय, गाइबो राधार यश॥४॥
हेरिब=देखूँगा, आन=दूसरा, लभिब=प्राप्ति करूँगा, प्रकरण=प्रसंग, सलिल=जल, आहरने=लाने, बुझिब=समझूँगा। हेन काले कबे, विलास मञ्जरी, अनंग मञ्जरी आर। आमारे हेरिया, अति कृपा करि, बलिवे वचन सार॥१॥
एस, एस, सखि! श्रीललिता–गणे, जानिब तोमारे आज। गृहकथा छाडि़, राधाकृष्ण भज, त्यजिया धरम लाज॥२॥
से मधुर वाणी, सुनिया एजन, से दुँहार श्रीचरणे। आश्रय लइबे, दुँहे कृपा करि, लइबे ललिता–स्थाने॥३॥
ललिता सुन्दरी, सदय हइया, करिबे आमारे दासी। स्वकुञ्ज कुटीरे, दिवेन वसति, जानि सेवा अभिलाषी॥४॥
हेन=उसी, हेरिया=देखकर, एस=आवो, दुँहार=दोनोंके, वसति=वास, स्थान। पाल्यदासी करि, ललिता सुन्दरी, आमारे लइया कबे। श्रीराधिका–पदे, काले मिलाइबे, आज्ञा सेवा समर्पिबे॥१॥
श्रीरूप मञ्जरी, संगे जाब कबे, रस–सेवा–शिक्षा–तरे। तदनुगा ह’ये, राधाकुण्ड–तटे, रहिब हर्षितान्तरे॥२॥
श्रीविशाखा–पदे, सङ्गीत शिखिव, कृष्णलीला–रसमय। श्रीरति मञ्जरी, श्रीरस मञ्जरी, हइबे सबे सदय॥३॥
परम आनन्दे, सकले मिलिया, राधिका चरणे रब। एइ पराकाष्ठा, सिद्धि कबे हबे, पाव राधा–पदासव॥४॥
पदासव=चरणामृत। चिन्तामणिमय, राधाकुण्ड–तट, ताहे कुञ्ज शत शत। प्रवाल–विद्रुम– मय तरुलता, मुक्ताफले अवनत॥१॥
स्वानन्द सुखद, कुञ्ज मनोहर, ताहाते कुटिर शोभे। वसिया तथाय, गाब कृष्ण नाम, कबे कृष्णदास्य लोभे॥२॥
एमन समय, मुरलीर गान, पशिवे ए दासी–काने। आनन्दे मातिब सकल भुलिब, श्रीकृष्ण–वंशीर गाने॥३॥
राधे राधे बलि’ मुरली डाकिबे, मदीय ईश्वरी नाम। सुनिया चमकि’ उठिबे ए दासी, केमन करिवे प्राण॥४॥
प्रबाल=मूँगा, विद्रुम=मुक्ता–वृक्ष, अवनत=झुका हुआ, ताहाते=उसमें, तथाय=वहाँ, एमन=ऐसे, पशिवे=प्रवेश करेगा, डाकिबे=पुकारेगी, केमन=कैसा। निर्ज्जन कुटिरे, श्रीराधा–चरण, स्मरणे थाकिब रत। श्रीरूप मञ्जरी, धीरे धीरे आसि, कहिबे आमाय कत॥१॥
बलिबे ओ सखि, कि कर बसिया, देखह बाहिरे आसि। युगल मिलन, शोभा निरूपम, हइबे चरण दासी॥२॥
स्वारसिकी सिद्धि, ब्रजगोपी धन, परमचञ्चला सती। योगीर धेयान, निर्विशेष ज्ञान, ना पाय एखाने स्थिति॥३॥
साक्षात् दर्शन, मध्याह्न लीलाय, राधापद सेवार्थिनी। यखन ये सेवा, करह यतने, श्रीराधा चरणे धनि॥४॥
आमाय=मुझे, कत=कितना, कि कर=क्या कर रही हो, वसि=बैठकर, आसि=आकर, सेवार्थिनी=सेवाभिलाषिणी, यखन=जब, ये=जो, यतने=यत्नपूर्वक, धनि=सखी। श्रीरूप मञ्जरी कबे मधुर वचने। राधाकुण्ड–महिमा वर्णिबे सङ्गोपने॥१॥
ए चौद्द भुवनोपरि वैकुण्ठ निलय। तदपेक्षा मथुरा परम श्रेष्ठ हय॥२॥
माथुरमण्डले रासलीला स्थान यथा। वृन्दावन श्रेष्ठ अति सुन मम कथा॥३॥
कृष्णलीला–स्थल गोवर्धन श्रेष्ठतर। राधाकुण्ड श्रेष्ठतम सर्वशक्तिधर॥४॥
राधाकुण्ड–महिमा त’ करिया श्रवण। लालायित हये आमि पडि़ब तखन॥५॥
सखीर चरण कबे करिब आकुति। सखी कृपा करि दिबे स्वारसिकी स्थिति॥६॥
संगोपने=निर्जनमें, निलय=भवन, तखन=उसी समय, आकुति=प्रार्थना। वरणे तडि़त्, वास तारावली, कमल मञ्जरी नाम। साड़े बार वरष, वयस सतत, स्वानन्दसुखदधाम ॥१॥
श्रीकर्पूर सेवा, ललितार गण, राधा यूथेश्वरी हन। ममेश्वरी–नाथ, श्रीनन्दनन्दन, आमार पराण धन॥२॥
श्रीरूप मञ्जरी, प्रभृतिर सम, युगल सेवाय आश। अवश्य सेरूप, सेवा पाब आमि, पराकाष्ठा सुविश्वास॥३॥
कबे वा ए दासी, संसिद्धि लभिबे, राधाकुण्डे वास करि। राधाकृष्ण–सेवा, सतत करिबे, पूर्व स्मृति परिहरि॥४॥
वृषभानुसुता, चरण सेवने, हइव ये पाल्यदासी। श्रीराधार सुख, सतत साधने, रहिब आमि प्रयासी॥१॥
श्रीराधार सुखे, कृष्णेर ये सुख, जानिब मनेते आमि। राधापद छाडि़, श्रीकृष्णसङ्गमे, कभु ना हइब कामी॥२॥
सखीगण मम, परम सुहृत्, युगल प्रेमेर गुरु। तदनुग हये, सेविब राधार, चरण कलपतरु॥३॥
राधापक्ष छाडि़, जे जन से जन, जे भावे से भावे थाके। आमि त राधिका, पक्षपाती सदा, कभु नाहि हेरि ताके॥४॥
जे जन=जो सखी, थाके=रहे, हेरि=देखूं, ताके=उसे। श्रीकृष्ण–विरहे, राधिकार दशा, आमि त’ सहिते नारि। युगल मिलन, सुखेर कारण, जीवन छाडि़ते पारि॥१॥
राधिकाचरण, त्यजिया आमार, क्षणेके प्रलय हय। राधिकार तरे, शतवार मरि, से दुःख आमार सय॥२॥
ए हेन राधार, चरणयुगले, परिचर्य्या पाब कबे। हाहा ब्रजजन, मोरे दया करि, कबे ब्रजवने लबे॥३॥
विलास मञ्जरी, अनङ्ग मञ्जरी, श्रीरूप मञ्जरी आर। आमाके तुलिया, लह निजपदे, देह मोर सिद्धि सार॥४॥
विरहे=विरहमें, क्षणेके=क्षण भरमें, तरे=लिए, सय=सहन कर लूँगी, लबे=ले जावोगे, तुलिया=उठाकर, लह=ले लो। राधे, राधे, राधे, राधे। वृन्दावन विलासिनी, राधे राधे॥
वृषभानुनन्दिनी, राधे राधे। गोविन्दानन्दिनी, राधे राधे॥
कानुमनमोहिनी, राधे राधे। अष्टसखीर शिरोमणि, राधे राधे॥
परम करुणामयी, राधे राधे। प्रेम भक्ति प्रदायिनी, राधे राधे॥
ऐ बार मोरे दया करो, राधे राधे। अपराध क्षमा करो, राधे राधे॥
सेवा अधिकार दियो, राधे राधे। तोमार काङ्गाल तोमाय डाके, राधे राधे॥
हे वृन्दावनमें विलास करने वाली श्रीराधे! हे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे! हे गोविन्दको आनन्द प्रदान करने वाली श्रीराधे! कन्हैयाके मनको भी मोहित करने वाली श्रीराधे! हे अष्ट सखियोंकी शिरोमणि श्रीराधे! हे परम करुणामयी श्रीराधे! हे प्रेमाभक्ति प्रदान करने वाली श्रीराधे! आपका यह काङ्गाल आपको पुकार रहा है—आप मात्र एकबार मुझपर कृपाकर मेरे अपराधोंको क्षमा करें तथा मुझे सेवाधिकार प्रदान करें।