श्रीमती राधिकाजीकी चरणधूलिको शरीरपर धारण करनेसे अनायास ही गिरिधारीकी प्राप्ति हो जाती है। जिसने राधाजीके श्रीचरणोंमें आश्रय ग्रहण किया है, वही महाशय धन्य है। मैं उसपर बलिहारी जाता हूँ। अहो! वृन्दावन जिनका धाम है तथा जो सर्वदा कृष्णको आनन्दित करती हैं, उन श्रीमती राधिकाजीकी जय हो। हाय! मेरे दुर्भाग्यने मुझे राधाजीका ऐसा गुणगान सुननेसे वञ्चित कर दिया। जो उनके भक्तोंके श्रीमुखसे सर्वदा रसपूर्ण कथाओंको श्रवण करता है, वह श्रीघनश्यामको सहज ही प्राप्त कर लेता है तथा जो इन कथाओंसे विमुख रहता है उसको कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् उसे कृष्णप्रेम प्राप्त नहीं हो सकता। मैं ऐसे लोगोंका नाम भी सुनना नहीं चाहता। अरे भाई! श्रीकृष्णनामका कीर्तन करनेपर श्रीमती राधिकाजीके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है तथा श्रीमती राधिकाजीके नामका कीर्तन करनेसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति हो जाती है। पदकर्ता कह रहे हैं—अरे भाइयो! यह मैंने संक्षेपमें बता दिया है कि किस प्रकार राधाकृष्ण युगलकी सेवा प्राप्त की जा सकती है। अतः सांसारिक दुःखमय बातोंको छोड़कर भजन करो तथा अपने उद्विग्न मनका कष्ट दूर करो। कोथाय गो प्रेममयी राधे राधे। राधे राधे गो, जय राधे राधे॥
देखा दिये प्राण राख राधे राधे। तोमार काङ्गाल तोमाय डाके राधे राधे॥
राधे वृन्दावन–विलासिनी राधे राधे। राधे कानुमनमोहिनी राधे राधे॥
राधे अष्टसखीर शिरोमणि राधे राधे। राधे वृषभानुनन्दिनी राधे राधे॥
(गोसाञी) नियम क’रे सदाइ डाके, राधे राधे। (गोसाञी) एकबार डाके केशीघाटे। आबार डाके वंशीवटे, राधे राधे॥
(गोसाञी) एकबार डाके निधुवने। आबार डाके कुञ्जवने, राधे राधे॥
(गोसाञी) एकबार डाके राधाकुण्डे। आबार डाके श्यामकुण्डे, राधे राधे॥
(गोसाञी) एकबार डाके कुसुमवने। आबार डाके गोवर्धने, राधे राधे॥
(गोसाञी) एकबार डाके तालवने। आबार डाके तमालवने, राधे राधे॥
(गोसाञी) मलिन वसन दिये गाय। व्रजेर धूलाय गड़ागड़ी जाय, राधे राधे॥
(गोसाञी) मुखे राधा राधा बले। भासे नयनेर जले, राधे राधे॥
(गोसाञी) वृन्दावने कुलि कुलि केंदे बेड़ाय। राधा बलि’, राधे राधे॥
(गोसाञी) छापान्न दण्ड रात्रि दिने। जाने ना राधा–गोविन्द बिने, राधे राधे॥
तार पर चारि दण्ड शुति थाके। स्वपने राधा–गोविन्द देखे, राधे राधे॥
हे प्रेममयी राधे! आप कहाँ हैं? आपका यह कङ्गाल (दास) आपको पुकार रहा है। एक बार दर्शन प्रदानकर मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिए। हे वृन्दावन विलासिनी श्रीराधे! हे श्रीश्यामसुन्दरके मनको भी हरण करनेवाली श्रीराधे! हे ललिता, विशाखा आदि अष्ट सखियोंकी शिरोमणि, वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे! इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी सदा नियमपूर्वक श्रीमती राधिकाजीको पुकारते हैं। कभी केशीघाटमें पुकारते हैं, तो कभी वंशीवटमें, कभी निधुवनमें तो कभी कुञ्जवनमें, कभी राधाकुण्डमें, तो कभी श्याम कुण्डमें, कभी कुसुम सरोवरमें, तो कभी गोवर्धनमें, कभी तालवनमें, तो कभी तमालवनमें। शरीरपर मलिन वस्त्र धारणकर ब्रजकी धूलमें लोटपोट हो रहे हैं तथा मुखसे हे राधे! हे राधे! पुकारते हुए उनकी आँखोंसे आसुओंकी धारा बह रही है। वे वृन्दावनकी गलियोंमें रोते–रोते राधे–राधे कहते हुए घूमते हैं। वे रात–दिन छप्पन दण्ड राधा–गोविन्दकी सेवामें ही निमग्न रहते हैं तथा मात्र चार दण्ड शयन करते हैं। परन्तु सोते हुए स्वप्नमें भी राधागोविन्दके दर्शन करते हैं। रमणी–शिरोमणि, वृषभानु नन्दिनी, नीलवसन–परिधाना। छिन्न–पुरट जिनि, वर्ण–विकाशिनी, बद्धकवरी हरिप्राणा॥
आभरण–मण्डिता, हरिरस पण्डिता, तिलक–सुशोभित भाला। कञ्चुलिकाच्छादिता, स्तनमणि मण्डिता, कज्ज्वल नयनी रसाला॥
सकल त्यजिया से राधा–चरणे। दासी ह’ये भज परम–यतने॥
सौन्दर्य–किरण देखिया जाँहार। रति–गौरी–लीला–गर्व–परिहार ॥
शची–लक्ष्मी–सत्या सौभाग्य–वलने। पराजित हय जाँहार चरणे॥
कृष्ण–वशीकारे चन्द्रावली–आदि। पराजय माने हइया विवादी॥
हरिदयित–राधा–चरणप्रयासी । भकतिविनोद श्रीगोद्रुमवासी॥