Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीराधा–तत्त्व

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaRasaBhakti
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राधिकाचरण–पद्म, सकल श्रेयेर सद्म,यतने जे नाहि आराधिल।राधा–पदाङ्कित–धाम, वृन्दावन जाँर नाम,ताहा जे ना आश्रय करिल॥
राधिकाभाव–गंभीर, चित्त जेवा महाधीर,गण–सङ्ग ना कैल जीवने।केमने से श्यामानन्द, रससिन्धु–स्नानानन्द,लभिबे बुझह एकमने॥
राधिका उज्ज्वल–रसेर आचार्य।राधामाधव–शुद्धप्रेम विचार्य॥
ये धरिल राधापद परम यतने।से पाइल कृष्णपद अमूल्यरतने॥
राधापद बिना कभु कृष्ण नाहि मिले।राधार दासीर कृष्ण, सर्ववेदे बले॥
छोड़त धन–जन, कलत्र–सुत–मित,छोड़त करम–गेयान।राधा–पदपङ्कज, मधुरत–सेवन,भकतिविनोद परमाण॥

श्रीमती राधिकाजीके चरणकमलोंसे अंकित श्रीवृन्दावनधामका आश्रय लेकर जिसने समस्त प्रकारके श्रेयोंके आधार स्वरूप श्रीमती राधिकाजीके चरणोंकी आराधना नहीं की तथा राधाजीके गम्भीर भावोंको हृदयमें धारण करनेवाले उनके निज गणोंका कभी भी सङ्ग नहीं किया, तो विचार कीजिए कि वह किस प्रकार श्रीश्यामसुन्दरके आनन्द–रसके समुद्रमें स्नान करनेका आनन्द प्राप्त कर सकेगा? क्योंकि श्रीमती राधिकाजी तो मधुर रसकी आचार्या हैं। श्रीराधामाधवका शुद्ध प्रेम विचारणीय है। जिसने यत्नपूर्वक राधाजीके चरणकमलोंका आश्रय लिया है, एकमात्र उसीने अमूल्य रत्नस्वरूप श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंको प्राप्त किया है। राधाजीके चरणोंका आश्रय ग्रहण किए बिना कृष्णकी प्राप्ति कदापि संभव नहीं है। परन्तु समस्त वेदशास्त्र इस बातके प्रमाण हैं कि जिसके हृदयमें राधाजीकी दासीका भाव आ जाता है, उसे सहज ही कृष्णकी प्राप्ति हो जाती है। अतः धन–जन, पत्नी, पुत्र, मित्र, कर्म एवं ज्ञान—सबका परित्यागकर केवलमात्र राधाजीके श्रीचरणकमलोंकी सेवासे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति संभव है, श्रीभक्तिविनोद ठाकुर इसके प्रमाण स्वरूप हैं।

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