स्वाभीष्ट–लालसात्मक–प्रार्थना
अनुकूल हबे विधि, से पदे हइबे सिद्धि, निरखिब ए—दुइ नयने। से रूप माधुरी राशि, प्राण कुवलय–शशी, प्रफुल्लित ह’बे निशि दिने॥
अहो! श्रीरूपमञ्जरीके श्रीचरणकमल ही मेरे एकमात्र सम्पद (सम्पत्ति) हैं। उनकी सेवा ही मेरा भजन पूजन है। वे ही मेरे प्राणधनस्वरूप, आभूषणस्वरूप तथा मेरे जीवनके भी जीवनस्वरूप हैं। वे ही मेरे रसनिधि हैं, उनकी सेवा ही मेरे लिए वाञ्छित है तथा वे ही मेरे लिए वेदोंका धर्मस्वरूप हैं। उनकी सेवा ही मेरा व्रत, तप, जप तथा समस्त प्रकारके धर्मकर्म स्वरूप हैं। जब भाग्य मेरे अनुकूल होगा तब (अर्थात् सौभाग्य उदित होनेपर) उन श्रीचरणकमलोंमें मेरी सिद्धि होगी तथा मैं अपने दोनों नेत्रोंसे उनका दर्शन करूँगा। उनकी रूपमाधुरीका दर्शन कर जिस प्रकार चन्द्रमाके उदित होते ही नीलकमल प्रफुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार मैं भी दिनरात प्रफुल्लित अर्थात् आनन्दित होता रहूँगा। श्रीनरोत्तमदास ठाकुर कह रहे हैं—हे श्रीरूपगोस्वामी! आपके अदर्शन (विरह) रूपी सर्पके तीव्र विषसे मेरा शरीर जर्जरित हो रहा है जिससे मेरे प्राण चिरकालसे छटपटा (व्याकुल) रहे हैं। अतः आप कृपाकर मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी छाया प्रदान कीजिए अर्थात् अपने श्रीचरणकमलोंमें स्थान प्रदान कीजिए, मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हरि हरि, कबे मोर हइबे सुदिन। भजिब श्रीराधाकृष्ण हइया प्रेमाधीन॥
सुयन्त्रे मिशाइया गा’बो सुमधुर तान। आनन्दे करिबो दुँहार रूप–गुण–गान॥
‘राधिका–गोविन्द’ बलि’ काँदिबो उच्चःस्वरे। भिजिबे सकल अङ्ग नयनेर नीरे॥
एइबार करुणा कर रूप–सनातन। रघुनाथदास मोर श्रीजीव जीवन॥
एइबार करुणा करो, ललिता विशाखा। सख्यभावे श्रीदाम सुबल–आदि सखा॥
सबे मिलि’ कर दया पुरुक मोर आश। प्रार्थना करये सदा नरोत्तमदास॥
हे हरि! मेरा ऐसा दिन कब आएगा, जब मैं कृष्णप्रेमके वशीभूत होकर राधाकृष्ण श्रीयुगलका भजन करूँगा। मृदंग, करताल आदि वाद्ययन्त्रोंकी सहायतासे सुमधुर ताल स्वर मिलाते हुए दोनोंके रूप एवं गुणोंका गान करूँगा। ‘हे राधे! हे गोविन्द!’ कहते हुए जोर–जोरसे रोऊँगा तथा आसुओंसे मेरा सारा शरीर भीग जाएगा। हे रूप गोस्वामी! हे सनातन गोस्वामी! हे रघुनाथदास गोस्वामी! हे जीव गोस्वामी! आप एकबार मुझपर करुणा कीजिए। हे ललिताजी! हे विशाखाजी! सख्यभावयुक्त श्रीदाम, सुबल आदि सखा, आप सब लोग मिलकर मुझपर दया कीजिए जिससे कि मेरी आशा पूर्ण हो जाए। सगण श्रीगौर–कृष्णके प्रति दैन्यबोधिका प्रार्थना हरि हरि! विफले जनम गोंवाइनु। मनुष्य जनम पाइया, राधाकृष्ण ना भजिया, जानिया सुनिया विष खाइनु॥
गोलोकेर प्रेमधन, हरिनाम संकीर्तन। रति ना जन्मिल केने ताय। संसार विषानले, दिवानिशि हिया ज्वले, जुड़ाइते ना कैनु उपाय॥
ब्रजेन्द्रनन्दन जेइ, शचीसुत हैल सेइ, बलराम हइल निताइ। दीन हीन जत छिल, हरिनामे उद्धारिल, ता’र साक्षी जगाइ–माधाइ॥
हा हा प्रभु नन्दसुत, वृषभानु–सुतायुत, करुणा करह एइबार। नरोत्तमदास कय, ना ठेलिओ राङ्गापाय, तोमा बिना के आछे आमार॥
हे हरि! मैंने दुर्लभ मनुष्यजन्म पाकर भी श्रीराधाकृष्णका भजन न कर उसे व्यर्थ ही गँवा दिया इस प्रकार मैंने तो जान–बूझ कर विष खा लिया। गोलोकका प्रेमधन—हरिनाम संकीर्तनके प्रति मेरी रति क्यों नहीं हुई? संसारके विषयोंकी ज्वालासे मेरा हृदय दिन–रात जल रहा है, परन्तु मैंने कभी इस ज्वालाको शान्त करनेका उपाय ही नहीं किया। श्रीब्रजेन्द्रनन्दनने ही शचीपुत्रके रूपमें तथा श्रीबलरामने ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें अवतरित होकर जितने भी दीन–हीन जीव थे, उन सबका हरिनामके द्वारा उद्धार कर दिया। जगाई और माधाई इसके प्रमाण हैं। पदकर्ता श्रीनरोत्तमदास ठाकुरजी निवेदन करते हुए कह रहे हैं—हे प्रभो नन्दनन्दन! हे वृषभानुसुता श्रीराधिके! आप एक बार मुझपर करुणा कीजिए। मुझे अपने श्रीचरणोंसे दूर मत हटाइए। क्योंकि आपके अतिरिक्त मेरा इस जगतमें और कौन है?