से सब संगीर संगे जे कैला विलास। से संग ना पाइया काँदे नरोत्तम दास॥
अहो! जो जगतके जीवोंपर प्रचुर करुणापूर्वक दुर्लभ प्रेमधनको लेकर आए, वे आचार्य ठाकुर (अद्वैताचार्य) कहाँ चले गए? मेरे स्वरूप दामोदर, श्रीरूप–सनातन तथा पतितोंको भी पावन करनेवाले रघुनाथ दास गोस्वामी कहाँ गए। मेरे गोपाल भट्ट गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, कृष्णदास कविराज गोस्वामी तथा स्वयं श्रीचैतन्यमहाप्रभु—ये सब एक साथ कहाँ गए? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इन सबका वियोगमें कैसे सहूँ। अपना सिर पत्थरसे पटक दूँ या आगमें प्रवेश कर जाऊँ, गुणोंके भण्डार श्रीगौरसुन्दरको कहाँ पाऊँ। इन सब परिकरोंके साथ जिन्होंने सुन्दर–सुन्दर लीलाएँ कीं, उनका संग नहीं पाकर यह नरोत्तमदास विलाप कर रहा है।