Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीगौरनित्यानन्द–निष्ठा

Locana Dāsa Ṭhākura3 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuNityanandaHarinamBhakti
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निताइ–गौर–नाम, आनन्देर धाम, जेइ जन नाहि लय।तारे यमराय, धरे लये जाय, नरके डुबाय ताय॥
तुलसीर हार, ना परे जे छार, यमालये वास ताँर।तिलक धारण, ना करे जे जन, वृथाय जनम ताँर॥
ना लय हरिनाम, विधि तारे वाम, पामर पाषण्डमति।वैष्णव–सेवन, ना करे जे जन, कि हबे ताहार गति॥
गुरुमन्त्र सार, कर एइबार, ब्रजेते हइबे वास।तमोगुण जा’बे, सत्त्वगुण पाबे, हइबे कृष्णेर दास॥
ए दास लोचन, बले अनुक्षण, (निताइ)–गौर–गुण गाओ सुखे।एइ रसे जा’र, रति ना हइल, चूण–कालि ता’र मुखे॥

आनन्दके भण्डारस्वरूप श्रीनित्यानन्द एवं श्रीगौरसुन्दर नाम जो लोग नहीं लेते, उन्हें यमराज पकड़कर ले जाते हैं तथा नरककुण्डमें डुबा देते हैं। जो लोग तुलसीकी माला अपने गलेमें धारण नहीं करते एवं ललाट पर तिलक धारण नहीं करते, उनका जन्म तो मानो व्यर्थ ही चला गया। जो हरिनाम ग्रहण नहीं करते, ऐसे पतित एवं पाषण्डियोंका भाग्य ही उनके विपरीत हो जाता है। जो लोग वैष्णवोंकी सेवा नहीं करते हैं, उनकी सद्गति कैसे हो सकती है? अतः आपलोग गुरु–मन्त्र ग्रहण करके उसे अपने जीवनका सार बनाइये, जिससे आपका ब्रजमें वास होगा। उस समय आपका तमोगुण दूर हो जायेगा एवं सत्त्वगुणकी प्राप्ति होगी, जिसके फलस्वरूप आप श्रीकृष्णके दास बन जायेंगे। यह लोचनदास सदासर्वदा कहता है—हे भाइयो! आपलोग आनन्दपूर्वक श्रीगौर–नित्यानन्दका गुणगान कीजिये। इस रसस्वरूप नामके प्रति जिसकी रति नहीं हुई, उसके मुखपर तो मैं चून–कालिख पोतता हूँ अर्थात् मैं उनका मुख भी दर्शन नहीं करना चाहता हूँ। जय जय नित्यानन्दाद्वैत गौराङ्ग। निताइ गौराङ्ग जय, जय निताइ गौराङ्ग॥१॥

(जय) यशोदानन्दन शचीसुत गौरचन्द्र। (जय) रोहिणीनन्दन बलराम नित्यानन्द॥२॥

(जय) महाविष्णुर अवतार श्रीअद्वैतचन्द्र। (जय) गदाधर, श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द॥३॥

(जय) स्वरूप, रूप, सनातन, राय रामानन्द। (जय) खण्डवासी, नरहरि, मुरारि, मुकुन्द॥४॥

(जय) पंचपुत्र संगे नाचे राय भवानन्द। (जय) तिन पुत्र संगे नाचे सेन–शिवानन्द॥५॥

(जय) द्वादश गोपाल आर चौषट्टि महान्त। (तोमरा) कृपा करि’ देह गौरचरणारविन्द॥६॥

श्रीगौरसुन्दर की जय हो! श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं श्रीअद्वैताचार्यजीकी जय हो। यशोदानन्दन जो कि कलियुगमें शचीमाताके पुत्र होकर श्रीगौरचन्द्रके नामसे अवतरित हुए तथा रोहिणीनन्दन जो कि नित्यानन्द प्रभुके रूपमें अवतरित हुए, उनकी जय हो। महाविष्णुके अवतार श्रीअद्वैताचार्य, गदाधर पण्डित एवं श्रीवास आदि महाप्रभुके असंख्य भक्तोंकी जय हो। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूपगोस्वामी, श्रीसनातनगोस्वामी, रायरामानन्द, खण्डवासी नरहरि, मुरारी एवं मुकुन्दकी जय हो। महाप्रभुजीके कीर्तनमें अपने पाँचों पुत्रोंके साथ नृत्य करनेवाले भवानन्दराय तथा अपने तीन पुत्रोंको साथमें लेकर नृत्य करनेवाले शिवानन्द सेनकी जय हो। इनके अतिरिक्त द्वादश गोपाल एवं चौसठ महन्तोंकी जय हो। आप सभी कृपा करके मुझे श्रीगौरसुन्दरके चरणकमलोंको प्रदान कीजिए। एलो गौर–रस–नदी कादम्बिनी ह’ये। भासाइल गौड़देश प्रेमवृष्टि दिये॥

नित्यानन्द–राय ताहे मारुत सहाय। जाँहा नाहि प्रेमवृष्टि ताँहा लये जाय। हुड्हुड् शब्दे आइल श्रीअद्वैतचन्द्र। जल–रसधारा ताहे राय–रामानन्द॥

चौषट्टि महान्त आइल मेघे शोभा करि’। श्रीरूप–सनातन ताहे हइल बिजुरि॥

कृष्णदास कविराज रसेर भाण्डारी। यतने राखिल प्रेम हेमकुण्ड भरि॥

एवे सेइ प्रेम ल’ये जगज्जने दिल। ए–दास लोचन–भाग्ये बिन्दु ना मिलिल॥

रसकी नदी श्रीगौरसुन्दर बादल बनकर गौड़–देशमें आये तथा उन्होंने प्रेमरूपी वर्षा द्वारा गौड़ देशको प्लावित कर दिया। उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु पवनदेवके रूपमें सहायक सिद्ध हुए, जहाँ प्रेमकी वर्षा नहीं हुई, उन्होंने वहाँ पर भी पहुँचा दी। बादलोंके गर्जनके रूपमें श्रीअद्वैतचन्द्र उपस्थित हुए और श्रीरामानन्द रायने जल–रसकी धारा प्रवाहित की। चौंसठ महन्त बादलोंकी शोभा बनकर उपस्थित हुए, उसमें श्रीरूप और सनातन गोस्वामी बिजली बनकर आये। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी रसके भण्डारी हुए, जिन्होंने यत्नपूर्वक स्वर्ण कलशमें उस प्रेमरसको भरकर रख लिया था। अब उसी प्रेमको लाकर जगत् वासियोंमें वितरण किया, परन्तु इस लोचन दासके भाग्यमें एक बूँद भी नहीं आयी।

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