श्रीगौरनित्यानन्द–विज्ञप्ति
अहो! श्रीगौरचन्द्र एवं श्रीनित्यानन्द प्रभु दोनों ही परम करुण हैं। ये समस्त अवतारोंके भी शिरोमणि एवं आनन्दके भण्डार हैं। अरे भाई! दृढ़ विश्वासके साथ तुम श्रीचैतन्य महाप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुका भजन करो तथा विषयोंको त्यागकर इन दोनोंके प्रेमरसमें डूबकर सर्वदा हरि हरि बोलते रहो। देखो भाई! इन तीनों लोकोंमें ऐसा दयालु और दूसरा नहीं है, जिनका गुणगान सुनकर पशु–पक्षियोंका हृदय भी द्रवित हो जाता है। श्रीलोचनदासजी कहते हैं—मैं तो सांसारिक विषयोंमें ही रमा रहा ऐसे दयालु श्रीगौरनित्यानन्दके चरणकमलोंमें मेरी प्रीति नहीं हुई। अतः मेरे दुष्कर्मोंके कारण ही यमके दूत मुझे दुःख भोग करा रहे हैं। कबे हबे बल से–दिन आमार। (आमार) अपराध घुचि, शुद्धनामे रुचि, कृपाबले हबे हृदये सञ्चार॥
तृणाधिक हीन, कबे निज मानि, सहिष्णुता–गुण हृदयेते आनि। सकले मानद, आपनि अमानी, ह’ये आस्वादिव नाम–रस–सार॥
धन जन आर, कविता सुन्दरी, बलिब ना चाहि देह सुखकरी। जन्मे जन्मे दाओ, ओहे गौरहरि, अहैतुकी भक्ति चरणे तोमार॥
(कबे) करिते श्रीकृष्ण– नाम उच्चारण, पुलकित देह गद्गद वचन। वैवर्ण्य–वेपथु, ह’बे संघटन निरन्तर नेत्रे ब’वे अश्रुधार॥
कबे नवद्वीपे, सुरधुनि–तटे गौर–नित्यानन्द बलि निष्कपटे। नाचिया गाहिया, बेड़ाइब छुटे, बातुलेर प्राय छाडि़या विचार॥
कबे नित्यानन्द, मोरे करि दया, छाड़ाइबे मोर विषयेर माया। दिया मोरे निज चरणेर छाया नामेर हाटेते दिबे अधिकार॥
किनिबो, लुटिबो, हरिनाम–रस, नाम रसे माति हइबो विवश। रसेर रसिक– चरण परश, करिया मजिबो रसे अनिवार॥
कबे जीवे दया, हइबे उदय, निजसुख भुलि सुदीन हृदय। भकतिविनोद, करिया विनय, श्रीआज्ञा–टहल करिबे प्रचार॥
अहो! कब मेरा ऐसा शुभ दिन आएगा जब श्रीगौरसुन्दरकी कृपासे मेरे समस्त प्रकारके अपराध नष्ट हो जाएँगे। जिसके फलस्वरूप शुद्ध नाममें मेरी रुचि हो जाएगी तथा हृदयमें स्फूर्ति होगी। कब मैं अपने हृदयमें सहिष्णुताको धारणकर स्वयंको तृणसे भी अधिक दीन–हीन मानूंगा तथा स्वयं अमानी होकर (अपना सम्मान न चाहकर) दूसरोंको सम्मान प्रदान करूँगा तथा इस प्रकार निरन्तर नामरसका आस्वादन करूँगा। हे गौरसुन्दर! मैं धन, जन, विद्या, सुन्दरी तथा अन्य प्रकारके देहसुखकर वस्तुओंको नहीं चाहता हूँ। मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि जन्मजन्मान्तरमें आपके श्रीचरणोंमें ही मेरी अहैतुकी भक्ति रहे। अहो! कब श्रीकृष्ण नामका उच्चारण करते समय मेरा शरीर पुलकित तथा वाणी गद्गद हो जाएगी। सारा शरीर पसीनेसे लतपथ हो जाएगा तथा नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित होती रहेगी। कब मैं नवद्वीपमें गंगाके किनारे निष्कपट (प्रेमपूर्वक) हा गौर! हा निताई! बोलते हए, नाचते–गाते हुए एक पागल व्यक्ति भी भाँति लोक–लज्जाका परित्यागकर इधर–उधर भागता रहूँगा। अहो! कब नित्यानंदप्रभु कृपा करके मेरे विषयोंके प्रति आनासक्तिको छुड़ाकर अपने श्रीचरणोंकी छाया अर्थात् आश्रय प्रदानकर नामके बाजारमें मुझे अधिकार प्रदान करेंगे। जिससे मैं उस नामके बाजारसे हरिनामरूपी रसको खरीदकर अथवा लूटकर भी पानकर लूंगा तथा नामरससे मेरी मति विवश हो जाएगी और रसिक वैष्णवोंके श्रीचरणोंको स्पर्शकर नामरसमें निमग्न हो जाऊँगा। श्रीभक्तिविनोदठाकुर विनयपूर्वक (दीनतापूर्वक) कह रहे हैं—कब मेरे हृदयमें जीवोंके प्रति दया होगी और मैं अपना सुख भूलकर भी श्रीगौरसुन्दरकी आज्ञा (नाम) पालन कर प्रचार करूँगा।