हे प्रेमके ठाकुर श्रीगौरसुन्दर! हे नाथ! मैं अपने दुःख और कष्टोंकी बात क्या कहूँ। मैं तो अपने वास्तविक स्वरूपको ही भूल गया हूँ। हे नाथ! जिस कामके लिए आपने मुझे जगतमें जन्म दिया आज इतने दिनोंके बाद जब त्रितापोंसे जर्जरित हुआ तो उसका ज्ञान हुआ। हे प्रभो! मैं ऐसा दुर्मति हूँ—आपके भजनमें तो मेरी रति नहीं हुई परन्तु जड़ मोहमें सदा–सर्वदा प्रमत्त रहा। विषयी लोगोंके साथ रहते–रहते मैं तो घोर विषयी हो गया हूँ। मैं कौन हूँ, इस जगतमें क्यों आया हूँ, इन बातोंपर मैंने कभी विचार ही नहीं किया। मेरी क्या गति होगी इसका मैंने कभी विचार ही नहीं किया। मैं कभी भी भगवद्भक्तोंके पास नहीं जाता हूँ। तथा भगवत विमुख व्यक्तिके जितने कुलक्षण होते हैं, वे सब मुझमें विद्यमान हैं। हे प्रभो! अब श्रीगुरुदेवकी कृपासे मेरी आँखें खुल गईं अर्थात् अज्ञान दूर हो गया है, अब मैं समझ गया हूँ कि आप ही एकमात्र मेरे हैं तथा आपके निजजन (भक्त) ही परमबन्धु हैं तथा यह संसार तो कारागार है। अब तो मैं भक्तोंके चरणोंकी सेवाके अतिरिक्त अन्य किसीकी सेवा नहीं करूँगा। हे नाथ! अब मैंने आपके अरुणवर्णवाले श्रीचरणकमलोंकी शरण ग्रहण की है। अतः आप मेरे केश पकड़कर मायाजालसे मेरा उद्धार कीजिए। क्या आप पतितोंपर कृपा नहीं करते हैं? तो फिर जगाइ–मधाइ तो पतित ही थे तथा आपने उनपर कृपा की। इसीसे मैं जान गया हूँ कि आप प्रेमके ठाकुर हैं तथा पतितोंका उद्धार करते हैं। हे प्रभो! मैं भी भक्तिहीन दीन एवं अकिञ्चन हूँ। मैं आपके श्रीचरणकमलोंकी नित्यकालके लिए शरण ग्रहण करता हूँ। आप इस अपराधीके सिरपर अपने चरणयुगल रखें। गौराङ्ग तुमि मोरे दया ना छाडि़ह। आपन करिया राङ्गा चरणे राखिह॥
तोमार चरण लागि सब तेयागिलुँ। शीतल चरण पाइया शरण लइलुँ॥
ए कुले ओ कुले मुञि दिलुँ तिलाञ्जलि। राखिह चरणे मोरे आपनार बलि॥
वासुदेव घोष बले चरणे धरिया। कृपा करि राख मोरे पदछाया दिया॥
हे गौराङ्ग महाप्रभु! आप मेरे प्रति अपनी दया नहीं छोड़ना, मुझे अपना बनाकर रक्तवर्णविशिष्ट अपने श्रीचरणोंमें रखना। आपके श्रीचरणोंकी प्राप्ति हेतु मैंने सबकुछ त्याग कर दिया है, शीतल चरणोंको प्राप्तकर मैंने शरण ली है। मैंने इस कुल और उस कुलको त्याग दिया है, आप मुझे अपना कहकर अपने चरणोंमें रखना। वासुदेव घोष आपके चरणोंको धारण करके आपसे प्रार्थना करता है कि कृपा करके मुझे अपने चरणोंकी छायामें रखिये। कबे श्रीचैतन्य मोरे करिबेन दया। कबे आमि पाइबो वैष्णव पद–छाया॥१॥
कबे आमि छाडि़बो ए विषयाभिमान। कबे विष्णुजने आमि करिबो सम्मान॥२॥
गलवस्त्र कृताञ्जलि वैष्णव–निकटे। दन्ते तृण करि’ दाँड़ाइबो निष्कपटे॥३॥
काँदिया–काँदिया जानाइबो दुःखग्राम। संसार–अनल हैते मागिबो विश्राम॥४॥
शुनिया आमार दुःख वैष्णव ठाकुर। आमा लागि’ कृष्णे आवेदिबेन प्रचुर॥५॥
वैष्णवेर आवेदने कृष्ण दयामय। ए हेन पामर प्रति ह’बेन सदय॥६॥
विनोदेर निवेदन वैष्णव–चरणे। कृपा करि सङ्गे लह एइ अकिञ्चने॥७॥
अहो! कब श्रीचैतन्य महाप्रभु मुझपर ऐसी कृपा करेंगे कि मैं वैष्णवोंके श्रीचरणकमलोंमें आश्रय प्राप्त कर सकूँ। कब मैं विषयोंके अभिमानको त्यागकर वैष्णवोंका सम्मान करूँगा। गलेमें वस्त्र डालकर, दोनों हाथोंको जोड़कर तथा दाँतोंमें तृण धारणकर दीन–हीन भावसे उनके श्रीचरणोंके निकट खड़े होकर रोते–रोते अपने दुःखोंके विषयमें निवेदन करूँगा तथा संसाररूप दावानलसे मुक्ति माँगूँगा। तब वैष्णववृन्द मेरे दुःखोंको सुनकर द्रवितचित्त होकर मेरे लिए श्रीकृष्णके चरणोंमें आवेदन करेंगे तथा वैष्णवोंके निवेदनपर दयामय कृष्ण मेरे जैसे पतितके ऊपर कृपा करेंगे। भक्तिविनोद वैष्णवोंके श्रीचरणोंमें निवेदन कर रहे हैं कि हे वैष्णव ठाकुर! कृपापूर्वक इस अकिञ्चनको भी अपने चरणोंमें आश्रय प्रदान कीजिए।