Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीगौर–महिमा

Locana Dāsa Ṭhākura4 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaHarinam
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के जाबि के जाबि भाई भवसिन्धु–पार। धन्य कलियुगेर चैतन्य–अवतार॥

आमार गौरांगेर घाटे अदान–खेया वय।जड़ अन्ध, आतुर अवधि पार हय॥
हरिनामेर नौकाखानि श्रीगुरु–काण्डारी।संकीर्त्त न केरोयाल दु’बाहु पसारि॥
सब जीव हैल पार प्रेमेर बातासे।पडि़या रहिल लोचन आपनार दोषे॥

अरे भाई! भवसागरसे पार कौन जाएगा? यह कलियुग धन्य है क्योंकि स्वयं भगवान श्रीचैतन्यमहाप्रभु अवतरित होकर हरिनामरूपी नाव लेकर अवतरित हुए। अतः जो इस भवसागरसे पार जाना चाहता है, वे सब मेरे गौरसुन्दरके घाटपर आ जाओ, जहाँपर नामरूपी नौका तैयार खड़ी है। स्वयं गुरुजी इसके नाविक हैं, जो हरिनाम संकीर्तनरूपी चप्पू (नाव चलाने वाला डण्डा) हाथ में लिए हुए हैं। इस घाटपर जड़, अन्धा तथा कातर जो कोई भी क्यों न हो, उसे निःशुल्क ही पार कराया जाता है। पदकर्त्ता श्रीलोचनदास ठाकुरजी कह रहे हैं कि सब जीव तो प्रेमकी हवाके स्पर्शसे ही पार हो गए, परन्तु मैं अपने कर्मोंके कारण यहीं पड़ा रह गया। अवतार–सार, गोरा–अवतार, केन ना भजिलि ताँरे। करि’ नीरे वास, गेल ना पियास, आपन करम फेरे॥

कन्टकेर तरु सदाइ सेविलि (मन), अमृत पाइवार आशे। प्रेम–कल्पतरु, श्रीगौराङ्ग आमार, ताँहारे भाविलि विषे॥

सौरभेर आशे, पलाश शँुकिलि (मन), नाशाते पशिल कीट। इक्षुदण्ड भावि, काठ चुषिलि (मन), केमने पाइबि मिठ॥

हार बलिया, गलाय परिलि (मन), शमन किङ्कर–साप। शीतल बलिया, आगुन पोहालि (मन), पाइलि बजर ताप॥

संसार भजिलि श्रीगौराङ्ग भूलिलि, ना सुनिलि साधुर कथा। इह परकाल, दुकाल खोयालि (मन), खाइलि आपन माथा॥

अरे मन! तूने समस्त अवतारोंके शिरोमणि श्रीगौरसुन्दरका भजन क्यों नहीं किया? जलमें निवास करते हुए भी तेरी प्यास दूर नहीं हुई, तो इसमें तेरे ही कर्मोंका दोष है क्योंकि तू तो सर्वदा अमृत सदृश सुमिष्ट फलकी प्राप्तिकी आशासे काँटेदार वृक्षकी सेवा करता रहा। परन्तु प्रेमके कल्पवृक्षस्वरूप हमारे श्रीगौरसुन्दरको विष सदृश जानकर उनका परित्याग कर दिया। अरे मन! सुगन्ध प्राप्तिकी आशासे तूने कीड़ोंसे भरे हुए पलास पुष्पको सँूघा जिसके फलस्वरूप वे सब कीड़े तेरी नाकमें घुस गए तथा ईख जानकर एक सूखीसी लकड़ीको चूसा। तू स्वयं विचारकर कि तूझे सुमिष्ट रस कैसे मिलेगा? यमदूत रूपी सर्पोंको (मृत्युको) सुन्दर हार समझकर अपने गलेमें लपेट लिया, दहकती हुई आगको शीतल जानकर तू उसमें प्रवेश कर गया और असह्यकष्टसे बिल–बिलाने लगा। अरे मन! तूने जीवनमें कभी साधुकी बात तो मानी नहीं तथा श्रीगौरसुन्दरको भूलकर संसारका भजन किया। इस प्रकार तूने अपना यह लोक और परलोक दोनोंको ही नष्ट कर दिया। गौरांगेर दू’टी पद, जार धन सम्पद, से जाने भकति रस सार। गौरांगेर मधुर लीला, जार कर्णे प्रवेशिला, हृदय निर्म्मल भेल तार। जे गौरांगेर नाम लय, तार हय प्रेमोदय, तारे मुइ जाइ बलिहारी। गौरांग गुणेते झुरे, नित्यलीला तारे स्फुरे, से जन भकति अधिकारी॥

गौरांगेर संगी गणे, नित्यसिद्ध करि माने, से जाय ब्रजेन्द्रसुत पाश। श्रीगौड़मण्डल–भूमि, जेवा जाने चिन्तामणि, तार हय व्रजभूमे वास॥

गौर प्रेम रसार्णवे, से तरङ्गे जेवा डूबे, से राधामाधव–अन्तरंग। गृहे वा बनेते थाके, ‘हा गौरांग’ बोले डाके, नरोत्तम मांगे तार सङ्ग॥

श्रीगौरसुन्दरके श्रीयुगलचरण ही जिनके लिए एकमात्र आश्रयस्वरूप हैं, वे ही व्यक्ति भक्तिरसका अनुभव कर सकते हैं। श्रीगौरसुन्दरकी मधुर लीलाएँ जिनके कानोंमें प्रवेश करती हैं, उनका हृदय निर्मल हो जाता है। जो श्रीगौरसुन्दरका नाम लेते हैं, उनके हृदयमें प्रेम उदित हो जाता है। अतः मैं ऐसे श्रीगौरसुन्दरकी बलिहारी जाऊँ। श्रीगौरसुन्दरके गुणोंमें विभावित होनेसे जिनके हृदयमें भगवानकी लीलाएँ नित्यकाल स्फुरित होती रहती हैं, वे ही भक्तिके अधिकारी हैं। श्रीगौरचन्द्रके परिकरोंको जो नित्यसिद्ध मानते हैं तथा गौड़मण्डलकी भूमिको चिन्तामणि सदृश (अप्राकृत) मानते हैं, उन्हें ब्रजमें श्रीब्रजेन्द्रनन्दनकी सेवा प्राप्त होती है। जो गौरसुन्दरके प्रेमरसके सागरकी तरंगोंमें (लहरोंमें) डूब जाते हैं वे ही राधामाधवके अन्तरंग हो सकते हैं। अतः गृहस्थ आश्रमी हो अथवा त्यागी जो कोई भी गौरसुन्दरके प्रेमरसके सागरमें डूबकर हा गौराङ्ग! हा गौराङ्ग! पुकारते हैं, नरोत्तमदास उनके संगकी कामना करता है। देवादिदेव गौरचन्द्र गौरीदास–मन्दिरे। नित्यानन्द–संगे गौर अम्बिकाते विहरे॥

चारु–अरुण–गुञ्जाहार हृतकमले ये धरे। विरिञ्चि–सेव्य पादपद्म लक्ष्मी–सेव्य सादरे॥

तप्तहेम–अङ्गकान्ति प्रातः–अरुण–अम्बरे। राधिकानुराग प्रेम भक्ति वाञ्छा ये करे॥

शचीसुत गौरचन्द्र आनन्दित अन्तरे। पाषण्ड–खण्ड नित्यानन्द सङ्गे रङ्गे विहरे॥

नित्यानन्द गौरचन्द्र गौरीदास–मन्दिरे। गौरीदास करत आश सर्वजीव उद्धारे॥

देवोंमें परमदेव श्रीगौरसुन्दर श्रीनित्यानन्दप्रभुके साथ अम्बिकाकालनामें गौरीदास पण्डितजीके घरमें विहार कर रहे हैं। उनके हृदयकमल पर अपूर्व सुन्दर अरुण–वर्ण वाले गुञ्जाके हार सुशोभित हो रहे हैं। ब्रह्मा एवं लक्ष्मीजी भी जिनके श्रीचरणकमलोंकी सेवा बहुत आदरपूर्वक करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति तप्त–काञ्चन वर्णकी है अर्थात् तपे हुए सोने जैसी है और उन्होंने प्रातःकालके अरुणवर्णवाले वस्त्र धारण किये हैं। वे श्रीराधाजीकी अनुरागमयी प्रेमभक्तिकी वाञ्छा करते हैं। ऐसे श्रीशचीनन्दन गौरहरि अत्याधिक आनन्दित होकर पाषण्ड–दलनकारी श्रीनित्यानन्द प्रभुके संग अतिशय हास–परिहासपूर्वक गौरीदासजीके मन्दिरमें विहार कर रहे हैं। श्रीगौरीदास पण्डित समस्त जीवोंके उद्धार हेतु उन्हींके श्रीचरणोंमें आस लगाए बैठे हैं।

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