Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीगौर–गुण–वर्णन

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition4 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaHarinamJagannath
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एमन गौराङ्ग बिना नाहि आर।हेन अवतार, हबे कि हयेछे,हेन प्रेम–परचार।दुरमति अति, पतित पाषण्डी,प्राणे ना मारिल का’रे।हरिनाम दिया, हृदय शोधिल,याचि गिया घरे–घरे॥
भव–विरिञ्चिर, वाञ्छित ये प्रेम,जगते फेलिल ढालि’।काङ्गाले पाइया, खाइल नाचिया,बाजाइया करतालि।हासिया–काँदिया, प्रेमे गड़ागडि़,पुलके व्यापिल अङ्ग।चण्डाले–ब्राह्मणे, करे कोलाकुलि,कबे वा छिल ए रङ्ग।डाकिया–हाँकिया, खोल–करताले,गाइया–धाइया फिरे।देखिया शमन, तरास पाइया,कपाट हानिल द्वारे।ए तिन भुवन, आनन्दे भरिल,उठिल मङ्गल शोर।कहे प्रेमानन्द, एमन गौराङ्गे,रति ना जन्मिल मोर॥

अहो! चैतन्यमहाप्रभुके समान कोई अवतार आज तक न हुआ है, न भविष्यमें होगा तथा न ही ऐसे दुर्लभ प्रेमका प्रचार होगा। जिन्होंने दुर्मति परायण, पतितों एवं पाषण्डियोंका भी वध नहीं किया अपितु उनके घर–घर जाकर उन्हें हरिनाम प्रदानकर उनके हृदयको शुद्ध किया तथा शंकर एवं ब्रह्माके भी अभिलषित उस दुर्लभ प्रेमको जगतमें बिखेर दिया; जिसको काङ्गाल (दीन–हीन) लोग भी प्राप्तकर आनन्दपूर्वक दोनों हाथोंसे तालियाँ बजाते हुए नाचने लगे। कभी हँसने लगे तो कभी प्रेममें रोते–रोते जमीनपर लोट–पोट खाने लगे तथा उनके अंग पुलकित हो गए। ब्राह्मण भी अपने कुलका अभिमान त्यागकर एक चण्डालको आलिङ्गन करने लगे, कहो क्या कभी ऐसी अद्भुत बात हुई? लोग मृदङ्ग–करतालके साथ कीर्तन करते हुए नृत्य भी कर रहे हैं। यह तमाशा देखकर तो मृत्यु भी भयभीत हो गई तथा उसने अपने दरवाजे बन्द कर दिए। उस कीर्तनकी ध्वनिसे त्रिभुवन आनन्दसे भर गया। प्रेमानन्द कहता है—हाय–हाय! ऐसे गौरसुन्दरके श्रीचरणकमलोंमें मेरी रति नहीं हुई। (यदि) गौरांग नहित, तबे कि हइत, केमने धरित दे? राधार महिमा, प्रेमरस–सीमा, जगते जानात के? मधुर वृन्दा विपिन–माधुरी, प्रवेश चातुरी–सार। बरज–युवती, भावेर भकति, शकति हइत कार? गाओ पुनः–पुनः, गौराँगेर गुण, सरल हइया मन। ए भव सागरे, एमन दयाल, ना देखि ये एकजन॥

गौराङ्ग बलिया, ना गेनु गलिया, केमने धरिनु दे। नरहरि–हिया, पाषाण दिया, केमने गडि़याछे॥

अहो! यदि गौरसुन्दर इस जगतमें नहीं आते तो क्या होता, किस प्रकार मैं प्राण धारण करता तथा इस जगतमें प्रेमरसकी पराकाष्ठा स्वरूप श्रीमती राधिकाजीकी महिमाको कौन जान पाता? यदि राधाभाव व कांतिके द्वारा देदीप्यमान श्रीकृष्णस्वरूप शचीनन्दन गौरहरि जगतमें आविर्भूत न होते तो श्रीधाम वृन्दावनकी माधुरीमें किसका प्रवेश होता? जो समस्त प्रकारकी माधुरियोंका खान है, उसमें प्रवेश करना ही बुद्धिमताकी चरमसीमा है। ऐसी व्रजमाधुरीमें कौन प्रवेश कर सकता था। विशेषतः ब्रजरमणियोंकी ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके प्रति पारकीय मधुरभावरूप उन्नत उज्ज्वलरसमें प्रवेश करनेकी किसकी शक्ति थी। अर्थात् यह किसीके लिए भी संभव नहीं था। केवल महावदान्य श्रीशचीनन्दन गौरहरिकी अहैतुकी कृपासे ही यह सम्भव हुआ। हे भाइयो! सरल निष्कपट मनसे श्रीगौरसुन्दरके गुणोंका पुनः पुनः गान करो क्योंकि इस भवसागरमें ऐसा दयालु और कोई नहीं है। पदकर्ता श्रीनरहरि ठाकुर कह रहे हैं—हाय! मेरा हृदय किस पाषाणका बना है जो कि “गौरांग” नामका उच्चारण करनेपर भी द्रवित नहीं हुआ तथा मैं अभी तक किस प्रकार प्राण धारण किये हूँ। एमन शचीर नन्दन बिने। ‘प्रेम’ बलि नाम, अति अद्भुत, श्रुत हइत का’र काने? श्रीकृष्ण नामेर, स्वगुण महिमा, केवा जानाइत आर? वृन्दा विपिनेर महा मधुरिमा, प्रवेश हइत का’र? केवा जानाइत, राधार माधुर्य्य, रस–यश चमत्कार? ता’र अनुभव, सात्त्विक विकार, गोचर छिल वा का’र? व्रजे जे विलास, रास महारास, प्रेम परकीय तत्त्व। गोपीर महिमा, व्यभिचारी सीमा, का’र अवगति छिल एत? धन्य कलि धन्य, निताई–चैतन्य, परम करुणा करि। विधि–अगोचर, जे प्रेम–विकार, प्रकाशे जगत्–भरि॥

उत्तम अधम, किछु ना बाछिल, याचिया दिलेक कोल। कहे प्रेमानन्दे, एमन–गौरांगे, अन्तरे धरिया दोल॥

अहो! ऐसे श्रीशचीनन्दन गौरसुन्दरकी कृपाके बिना अत्यन्त ही अद्भुत “प्रेम” नाम कौन सुन पाता? श्रीकृष्ण नामकी अद्भुत महिमा कौन हमें बतलाता? यदि राधाभाव सुवलित श्रीकृष्णस्वरूप शचीनन्दन गौरहरि इस जगतमें प्रकट होकर श्रीवृन्दावनकी महामधुरिमाका प्रकाश नहीं करते, पात्र एवं अपात्रका विचार किये बिना कलियुगी जीवोंके उपर अहैतुकी कृपाकी वर्षाकर उन्हें उस ब्रजकी माधुरीमें प्रवेशका सौभाग्य प्रदान नहीं करते तो कौन इस महामधुरिमामें प्रवेश कर सकता था? श्रीमती राधिका उन्नत उज्ज्वल मधुररसकी सीमा है। उनके चमत्कारपूर्ण महाभावके अधिरूढ़, मोदन, मादन आदि अलौकिक भावोंको इस धरा धाममें रसिकशेखर श्रीशचीनन्दन गौरहरिके बिना कौन प्रकाशित करता? जगन्नाथ पुरीके काशीमिश्रभवनमें स्थित श्रीगम्भीरामें विप्रलम्भभावमें डुबी श्रीमती राधिकाके भावोंका आस्वादन करते समय उनके अप्राकृत शरीरमें जो प्रदीप्त सात्विक विकारसमूह उदित होते थे, उन्हें इस जगतमें किसके लिए देखना सम्भव था? मधुर वृन्दावनमेंअखिलरसामृत मूर्ति श्रीकृष्ण तथा महाभावकी मूर्तिमान विग्रह श्रीमती राधिका और उनकी कायव्यूहस्वरूपा गोपियोंके साथ जो महारास एवं प्रेमका विलास सम्पन्न हुआ था, उन गोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो पारकीय भावमय उन्नत उज्ज्वल प्रेमतत्त्व, गोपियोंके प्रेमकी महिमा, प्रेममयी गोपियोंके अप्राकृत शरीरमें भाव, विभाव, अनुभाव, सात्विक, व्यभिचारी आदि विकारों या भावोंकी अन्तिम सीमातक अभिव्यक्ति हुई थी, वह इस जगतमें किसके लिए संभव था? यह तो केवल श्रीचैतन्य महाप्रभु गौरहरिकी कृपासे ही संभव हुआ। अहो यह कलियुग धन्य है। जिसमें कृपाकरके श्रीनित्यानन्द प्रभु एवं श्रीमन्महाप्रभुने जगतमें अवतरित होकर ब्रह्माजीके भी अगोचर (दुर्लभ) प्रेमको जगतमें प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने उत्तम अथवा अधम किसी भी प्रकारका विचार नहीं रखा तथा सभीको हृदयसे लगा लिया। प्रेमानन्दजी कहते हैं—अरे भाइयो! ऐसे श्रीगौरसुन्दरको अपने हृदयमें धारणकर करो।

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