अरे भाई! एकाग्रचित्त होकर सुनो—वैष्णवोंके श्रीचरणकमल ही इस जगतकी एकमात्र सम्पदा है। जो उनका आश्रय लेकर कृष्णका भजन करता है, कृष्ण उसे कभी भी नहीं त्यागते हैं। परन्तु वैष्णवोंके श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किए बिना ही जो भजन करता है, वह व्यर्थ ही मारा जाता है अर्थात् उसका भजन–साधन सब व्यर्थ हो जाता है। प्रेमाभक्ति प्रदान करनेमें वैष्णवोंके चरणजलके (चरणामृत) समान और कोई दूसरा उपाय शक्तिशाली नहीं है। वैष्णवोंके चरणरजरूपी भूषणके अतिरिक्त और किसी भी प्रकारके जड़ आभूषणोंसे मस्तककी वास्तविक शोभा नहीं होती। शास्त्रोंमें तीर्थोंके जलको पवित्र बताया गया है, परन्तु भक्तिके लिए यह सब प्रवञ्चनामात्र है, क्योंकि वैष्णवोंके चरणामृतसे तीर्थजलकी कोई तुलना ही नहीं है। वैष्णवोंका चरणामृत पान करनेसे समस्त प्रकारकी वाञ्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। वैष्णवोंके संगमें सदैव कृष्णकथाकी चर्चा होती है, जिससे मन सर्वदा आनन्दित रहता है। हाय! ये स्थितियाँ इस दीन नरोत्तमको क्यों प्राप्त नहीं हुई? मेरी धैर्यकी सीमा टूट चुकी है—रोते–रोते नरोत्तम ठाकुर ऐसा कह रहे हैं।