Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीवैष्णव वन्दना

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition2 min read
KrishnaMahaprabhuJagannathRasaBhakti
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वृन्दावनवासी जत वैष्णवेर गण।प्रथमे वन्दना करि सबार चरण॥
नीलाचलवासी जत महाप्रभुर गण।भूमिते पडि़या वन्दों सबार चरण॥
नवद्वीपवासी जत महाप्रभुर भक्त।सबार चरण वन्दों हइया अनुरक्त॥
महाप्रभुर भक्त जत गौड़देशे स्थिति।सबार चरण वन्दों करिया प्रणति॥
जे देशे जे देशे बैसे गौरांगेर गण।ऊर्ध्द्व बाहु करि बन्दों सबार चरण॥
हैयाछेन हइबेन प्रभुर जत दास।सबार चरण बन्दों दन्ते करि’ घास॥
ब्रह्माण्ड तारिते शक्ति धरे जने जने।ए वेद पुराणे गुण गाय जेवा सुने॥
महाप्रभुर गण सब पतित पावन।ताइ लोभे मुइ पापी लइनु शरण॥
वन्दना करिते मुइ कत शक्ति धरि।तमो–बुद्धि–दोषे मुइ दम्भ मात्र करि॥
तथापि मूकेर भाग्य मनेर उल्लास।दोष क्षमि’ मो—अधमे कर निज दास॥
सर्ववांछा सिद्धि हय यमबन्ध छुटे।जगते दुर्लभ हइञा प्रेमधन लुटे॥
मनेर वासना पूर्ण अचिराते हय।देवकीनन्दन दास एइ लोभे कय॥

सर्वप्रथम मैं वृन्दावनवासी समस्त वैष्णवोंकी चरणवन्दना करता हूँ। तत्पश्चात् नीलाचलमें वास करनेवाले महाप्रभुके भक्तोंकी साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम पूर्वक वन्दना करता हूँ। इसके अतिरिक्त नवद्वीपमें जितने भक्त निवास करते हैं, मैं अनुरक्त होकर उन सबके श्रीचरणोंकी भी वन्दना करता हूँ। महाप्रभुके गौड़ (बंगाल) देशमें रहने वाले भक्तोंकी प्रेमपूर्वक चरणवन्दना करता हूँ। इसके अतिरिक्त जिस किसी भी देशमें गौरचन्द्रके गण (भक्त) रहते हैं, मैं दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर दीनतापूर्वक सबकी चरण वन्दना करता हूँ। महाप्रभुके जितने भी भक्त हो चुके हैं, अभी वर्त्तमान हैं या भविष्यमें होंगे, मैं दाँतोंमें तृण धारणकर अत्यन्त दीनतापूर्वक सबकी चरणवन्दना करता हूँ। महाप्रभुके एक–एक भक्त एक–एक ब्रह्माण्डका उद्धार करनेमें समर्थ हैं, वेद एवं पुराणोंमें वैष्णवोंकी ऐसी महिमाका गुणगान किया गया है। अतः जो व्यक्ति वैष्णवोंका गुणगान करता है या सुनता है तो उसका भी उद्धार हो जाता है। महाप्रभुके सभी भक्त पतितपावन हैं। इसी लोभसे मुझ जैसे पापीने भी उनके श्रीचरणोंमें शरण ग्रहण की है। मेरे जैसे तामसी बुद्धिवाले व्यक्तिके लिए उनकी अलौकिक महिमाका वर्णन भी सम्भव नहीं है, फिर भी मैं जो कुछ वर्णन कर रहा हूँ, उससे केवल मेरा दम्भ ही प्रकाशित होता है। तथापि मेरे जैसे मूक व्यक्तिका सौभाग्य ही है कि उनका गुणगान करनेसे मेरे मनमें उल्लास होता है। अतः हे प्रभु! आप मेरे दोषोंको क्षमाकर मुझ अधमको अपना दास बना लीजिए। क्योंकि यदि कोई वैष्णवोंकी शरणमें चला जाता है, तो उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, यमके बंधनसे (जन्म–मरणके चक्करसे) उसे छुटकारा मिल जाता है एवं जगतके लिए सुदुर्लभ होनेपर भी वह कृष्णप्रेमको प्राप्त कर लेता है। देवकीनन्दन दास इस आशासे यह सब वर्णन कर रहा है कि अतिशीघ्र ही उसके मनकी वासना भी पूर्ण हो जाएगी।

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