Bhajana Gīti
Kirtan

मानस, देह, गेह

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaBhakti
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मानस, देह, गेह यो किछु मोर।अर्पिलुं तुया पदे, नन्दकिशोर !॥ 1॥
सम्पदे - विपदे, जीवने - मरणे।दाय मम गेला, तुया ओ-पद वरणे ॥ 2॥
मारबि राखबि यो इच्छा तोहारा।नित्यदास प्रति तुया अधिकारा॥ 3॥
जन्माओबि मोए इच्छा यदि तोर।भक्तगृहे जनि जन्म हउ मोर॥ 4॥
कीटजन्म हउ यथा तुया दास।बहिर्मुख ब्रह्मजन्मे नाहि आश॥ 5॥
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा विहीन ये-भक्त।लभइते ताँक संग अनुरक्त॥ 6॥
जनक, जननी दयित, तनय।प्रभु , गुरु, पति - तुहुं सर्वमय॥ 7॥
भक्तिविनोद कहे , शुन कान !राधानाथ ! तुँहुं हामार पराण॥ 8॥

हे नन्दकिशोर! मानस देह-गेह जो कुछ भी मेरा था, मैंने सब कुछ आपके चरणों में समर्पित कर दिया है। (1) सम्पद-विपद अथवा जीवन- मरण में मेरा जो कुछ भी दायित्त्व था वह सब आपके चरणों का आश्रय ले लेने से समाप्त हो गया। (2) अब चाहे आप मुझे मारो अथवा रखो, अपने इस नित्य-दास के प्रति आपका पूरा अधिकार है। (3) मुझे जन्म देने की यदि आपकी इच्छा हो तो आप इतनी कृपा करना कि भक्तों के घर में ही मेरा जन्म हो। (4) मेरा कीड़े का भी यदि जन्म हो तो वहाँ भी मुझे आपका दासत्त्व मिले। आपसे विमुख रहकर ब्रह्मा जी की पदवी की भी मुझे इच्छा नहीं है। भोग व मोक्ष की स्पृहा से रहित जो भक्त हैं — ऐसे भक्तों का संग प्राप्त करने की ही मेरी इच्छा है। (5-6) पिता-माता, प्रिय, पुत्र, प्रभु, गुरु, पति आदि आप ही मेरे सर्वस्व हो। (7) भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि हे कृष्ण! हे राधानाथ! तुम ही हमारे प्राण हो। इसलिए मेरी विनती की ओर ध्यान दीजिए। (8)

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