श्रीगुरुकरुणासिन्धु, अधमजनारबन्धुलोकनाथ लोकेर-जीवन।हा हा प्रभु! कर दया, देह मोरे पदछाया,नरोत्तम लइल शरण॥
हरि! हरि!! क्या मेरा भी वह दिन होगा जब मैं आप दोनों के श्रीअंगों का स्पर्श करूँगा, आप दोनों के श्रीअंगों का दर्शन करूँगा तथा आप दोनों ही का भजन करूँगा। श्रीललिता व श्रीविशाखा जी के साथ सुखपूर्वक आपकी सेवा करूँगा तथा विभिन्न प्रकार के पुष्पों से आपके लिये माला पिरोऊँगा। सोने की डिबिया में कर्पूरयुक्त ताम्बूल सजा कर उसे आप दोनों के अधर-युगल में अर्पण करवाने में सहयोग करूँगा। श्रीराधा-श्रीकृष्ण व श्रीधाम वृन्दावन, ये ही मेरे प्राणधन हैं, ये ही मेरे जीने के साधन हैं। हे पतितपावन! आपकी जय हो। आप कृपा करके मुझे बस यही धन दीजिये कि मुझे आपके सिवाय और कोई भी व कुछ भी अच्छा न लगे। श्रीगुरुदेव करुणा के सिन्धु हैं, अधमजनों के बान्धव हैं तथा मेरे गुरुदेव लोकनाथ जी तमाम मनुष्यों के जीवन स्वरूप हैं। हा हा प्रभु! मुझ पर दया कीजिये। मुझे अपने पादपद्मों की छाया प्रदान कीजिये, ये नरोत्तम आपकी शरण ग्रहण करता है।