दारुण विधिर नाट, भांगिल प्रेमेर हाट,तिलमात्र ना राखिल ता’र।कहे नरोत्तमदास, कि मोर जीवने आश,छाड़ि’ गेल व्रजेन्द्र कुमार॥
मैं कब कृष्ण-धन प्राप्त करूँगा और उसे अपने हृदय के मध्य में रखूँगातथा इन तापित प्राणों को शीतल करूँगा। अपने हृदय को सजा कर उसमेंप्राणप्रिया को विराजमान करके, उनके चन्द्रमुख का दर्शन करूँ गा, हे सजनी!मेरा ऐसा शुभ दिन कब होगा? कब फिर मैं उन प्राणनाथ के साथ सुखमययमुना पुलिन पर भ्रमण करूँगा? ललिता व विशाखा जी के साथ जाकर नानाप्रकार के उपहारों को उन्हें भेंट करूँगा। विधाता दयालु होकर उन गुणनिधिको मुझसे मिला दें, क्या ऐसा मेरा सौभाग्य होगा? विधि का विधान बड़ा क्रूरहै, उसी ने इस प्रेम के बाज़ार को ऐसा उजाड़ा कि तिलमात्र भी उसका शेष नरहा। श्रीनरोत्तम ठाकुर जी कहते हैं कि जब व्रजेन्द्र-कुमार ही मुझे छोड़कर चले गये हैं, तब मेरे जीवन की क्या आशा है अर्थात् तब जीने काही क्या तात्पर्य है?हरि हे!प्रपन्चे पड़िया, अगति हइया, ना देखि’ उपाय आर।अगतिर गति, चरणे शरण, तोमाय करिनु सार॥ 1॥
अनेक यतने, से सब दमने, छाड़ियाछि आशा आमि।अनाथेर नाथ ! डाकि तव नाम, एखन भरोसा तुमि॥ 4॥
हे हरि! इस सांसारिक प्रपंच में पड़कर मेरी ऐसी दुर्गति हो गयी है कि अब इससे बाहर निकलने का कोई भी उपाय नज़र नहीं आ रहा है। आप तो गति-हीनों की भी गति हैं,इसलिए मैंने आपके चरणों में शरण ली है। आपको ही मैं सर्वस्व समझता हूँ। (1) कर्म-ज्ञान, कुछ भी मेरे पास नहीं है, साधन- भजन भी नहीं है। आप कृपामय हो, मैं तो कंगाल हूँ, इसलिये अहैतुकी कृपा चाहता हूँ। (2) वाक्य-वेग, मन का वेग, क्रोध-वेग, जिह्वा का वेग,उदर-वेग और उपस्थ-वेग — ये सभी मिलकर मुझे संसार में डुबा रहे हैं तथा बहुत उद्वेग दे रहे हैं। (3) इनको दमन करनेका मैंने बहुत यत्न किया, मगर अब मैंने इन सबको दमन करने की आशा छोड़ दी है। हे अनाथों के नाथ! मैं आपका नाम लेकर पुकार रहा हूँ , अब आप ही मेरा भरोसा हो। (4)