Bhajana Gīti
Kirtan

भाले गोरा गदाधरेर (मंगल-आरती)

Bhaktivinoda Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuBhakti
Study with Shastra AIPDF
भाले गोरा - गदाधरेर आरती नेहारि।नदिया - पूरब भाबे याँउ बलिहारी॥ 1॥
कल्पतरुतले रत्नसिंहासनोपरि।सबु सखी वेष्टित किशोर - किशोरी॥ 2॥
पुरट - जड़ित कत मणि - गजमति।झमकि’ झमकि’ लभे प्रति अंग ज्योति॥ 3॥
नील नीरद लागि, विद्युत माला।दुहुँ अंग मिलि’ शोभा भुवन-उजाला॥ 4॥
शंख बाजे, घण्टा बाजे बाजे करताल।मधुर मृदंग बाजे परम रसाल॥ 5॥
विशाखादि सखीवृन्द दुहुँ गुण गाओये।प्रियनर्मसखीगण चामर ढुलाओये॥ 6॥
अनंगमंजरी, चुया चन्दन देओये।मालतीर माला रूप-मंजरी लागाओये॥ 7॥
पंच प्रदीपे धरि’ कर्पूर बाति।ललितासुन्दरी करे युगल - आरती॥ 8॥
देवी-लक्ष्मी-श्रुतिगण धरणी लोटाओये।गोपीजन अधिकार रओयत गाओये॥ 9॥
भक्तिविनोद रहि’ सुरभिकि कुंजे।आरती - दर्शने प्रेम - सुख भुंजे॥ 10॥

नदिया के पूर्व भाव में अर्थात् व्रज-भाव में उत्तम प्रकार से हो रही श्रीगौर-गदाधर जी की आरती को देखकर मैं बलिहारी जाता हूँ। कल्पवृक्ष के नीचे, रत्नों के सिंहासन के ऊपर सब सखियों से घिरे नित्य-किशोर श्रीकृष्ण एवं नित्य-किशोरी श्रीमति राधा जी विराजमान हैं। वहाँ जड़ित सोना व गजमुक्ता आदि अनेकों मणियाँ झलमल-झलमल कर रही हैं तथा दोनों के अंगों से ज्योति बिखर रही है। घने बादलों की तरह घनश्याम श्रीकृष्ण एवं विद्युत-सी श्रीमति राधा जी की शोभा सारी पृथ्वी को आलोकमय कर रही है। शंख बज रहे हैं, घण्टे बज रहे हैं, करताल बज रहे हैं तथा परम-रसमय-ताल पर मधुर मृदंग बज रहे हैं। विशाखा आदि सखियाँ श्रीराधा-कृष्ण जी के गुणगान गा रही हैं तथा प्रियनर्म सखियाँ चामर ढुला रही हैं। अनंग मंजरी नामक गोपी विशेष सुगन्धित द्रव्य तथा चन्दन लगा रही हैं तथा रूप मंजरी नामक गोपी मालती के फूलों की माला अर्पण कर रही हैं। पंच-प्रदीप द्वारा कर्पूरयुक्त बत्तियों को जलाकर ललिता सुन्दरी जी दोनों की आरती कर रही हैं। सभी देवियाँ, लक्ष्मी जी व श्रुतियाँ धरती पर लोट-पोट कर गोपियों के इस अधिकार की महिमा को रो-रो कर गा रही हैं। भक्तिविनोद ठाकुर जी सुरभि-कुंज में रहकर इस आरती को दर्शन करके प्रेम-सुख का आस्वादन कर रहे हैं।

Continue the Journey