ए सब ना छेड़े किसे पा’ वे राधाकृष्ण।साधुसंग बिना आर कोथा तव इष्ट?वैष्णव-चरणे मज, घुचिवे अनिष्ट॥
भावना से ऐ मन! तू बहुत ही दुष्ट है। तू विषय रूपी विष में अटकाहुआ है। तू काम-क्रोध-लोभ-मोह व अभिमान आदि से आविष्ट होने केकारण इन शत्रुओं के वश में है। असद्-वार्ता, भोग व मोक्ष की प्यास सेआकृष्ट है। असत्-चर्चा तुझे अच्छी लगती है। प्रतिष्ठा की आशा, कुटिनाटीव शठता आदि तुझमें घुसी हुई हैं। ऐ मन! तू सरल तो हो नहीं पाया। मेरेभाई! तुझे इन सब अनिष्टकारियों ने घेर रखा है। ये सब तेरे शत्रु हैं। यदिकाम-क्रोध, असद्-वार्ता व प्रतिष्ठादि का तू परित्याग नहीं करेगा तोश्रीराधा-कृष्ण की प्राप्ति कैसे करेगा? अतः यत्न के साथ इन्हें छोड़ दे, इन्हेंछोड़ दे। साधु-संग के बिना और कहाँ पर तेरा इष्ट है अर्थात् साधु-संग केबगैर न तो हरिनाम व न ही हरिकथा का आस्वादन होता है, न धाम कादर्शन होता है, न ही भक्त, गुरु व भगवद्-तत्व का ही ज्ञान होता है और नही भगवद्-दर्शन होता है। इसलिए हे मन! तू साधु-संग कर। ऐ मन! तूवैष्णवों के श्रीचरणों में समर्पित हो जा, तब तेरे सारे अनिष्ट खत्म हो जायेंगे।ऐ मन! जो बातें मैंने तुझे कही हैं, उन्हें कम-से-कम एक बार विचार करकेतो देख।भज रे भज रे आमार मन अति मन्द।(भज) व्रजवने राधाकृष्ण-चरणारविन्द॥ 1॥
ऐ मेरे मन! तू भजन कर, भजन कर। भजन के बिना सुगति नहीं है। ज्ञान व कर्म की चेष्टा को परित्याग करके भजन कर। व्रजवन में श्रीराधा-कृष्ण जी के पादपद्मों का, श्रीगौरांग महाप्रभु, श्रीगदाधर प्रभु, श्रीअद्वैत आचार्य, श्रील गुरुदेव व नित्यानन्द प्रभु जी का भजन कर।(1) किस प्रकार से? श्रीगौरांग महाप्रभु जी को श्रीकृष्ण से अलग मत समझना। श्रीगौरांग महाप्रभु जी व श्रीकृष्ण एक ही हैं — इसे जानकर तथा गुरुदेव श्रीकृष्ण के प्रियजन हैं — ये जानकर श्रीगौरांग महाप्रभु व गदाधर प्रभु आदि का नाम-भजन कर। श्रीगौरहरि के प्रेम में प्रमत्त होकर श्रीनिवास आचार्य, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीमुरारी व श्रीमुकुन्द जी को स्मरण कर, स्मरण कर। (2) देख मन! यदि भजन करना है तो श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी व श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी का स्मरण कर, यदि श्रीकृष्ण-प्रेम प्राप्ति की इच्छा है तो श्रीराघव पण्डित, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी, श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी व श्रीराय रमानन्द जी को स्मरण कर। (3) ऐ मन! तू गोष्ठी सहित श्रीकर्णपूर जी को व शिवानन्द सेन जी को लगातार स्मरण कर, इन्हें निरन्तर स्मरण कर और यदि तेरी ब्रजवास करने की इच्छा है तो रूपानुग साधुओं के भजनानन्द को स्मरण कर। (4)