यामुन-जीवन,केलि-परायण,मानस-चन्द्रचकोर।नामसुधारस,गाओ कृष्ण-यश,राख वचन मन मोर॥ 8॥
रात्रि शेष हो गयी है अर्थात रात बीत गई है व प्रकाश का प्रवेश हो रहा है। अतः हे जीव! तुम अब निद्रा छोड़कर उठो तथा हरि-हरि-मुकुन्द- मुरारी, राम, कृष्ण, हयग्रीव नृसिंह, वामन, मधुसूदन, पूतनाको मारनेवाले तथा कैटभ नामक असुर का नाश करनेवाले ब्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर का नाम लो। रावण का वध करने के लिए जो दशरथनन्दन राम के रूप में अवतरित हुए, जो यशोदा के लाड़ले हैं, उन गोपाल का नाम लो। जो वृन्दावन में सर्वश्रेष्ठ हैं, गोपियों के प्रियतम हैं तथा राधिकारमण हैं, त्रिभुवन में जिनके समान सुन्दर अन्य कोई नहीं है। जो घर-घर से माखन चुराने वाले हैं, गोपियों के वस्त्र हरण करने वाले हैं, ब्रज एवं ब्रजवासियों के रखवाले, वंशी के द्वारा सबके चित्त को हरण करने वाले, जो योगियों के वन्दनीय हैं, तथा समस्त ब्रजवासियों के भय को हरण करने वाले हैं, तुम उन नन्दनन्दन का नाम लो। जिनका रूप नवीन मेघों के समान अत्यन्त ही मनोहर है, जो वंशीविहारी हैं, जो मैया यशोदा के नन्दन परन्तु कंस के संहारक हैं, जो निकुंजों एवं कदम्ब-कानन में रास रचाने वाले हैं, गोपियों के आनन्द को विशेष रूप से वर्द्धन करने वाले हैं एवं प्रेम के भंडार हैं तथा जो पुष्पबाण के द्वारा गोपियों के काम को बढ़ाने वाले हैं, जो गोपियों के चित्त को आनन्दित करने वाले एवं समस्त गुणों के आश्रय हैं, जो यमुनाजीके जीवनस्वरूप हैं, यमुना के तट पर नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हैं तथा जो राधा जी के मनरूपी चन्द्र के चकोर हैं — श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि मेरी बात मान लो, ये श्रीहरिनाम अमृत व आनन्दमय हैं, तुम हमेशा कृष्ण-यश का गान करते रहो।