ना चेयेओ नामेर गुणे ओ सब फल पाइ रे।विनोद बले याइ ल’ ये नामेर बालाइ रे॥
हरि बोलो, हरि बोलो, हरि बोलो, भाई रे! हमारे दुःखों को देखकर ही इस हरिनाम को श्रीगौरांग महाप्रभु जी व श्रीनित्यानन्द प्रभु लेकर आये हैं। हरिनाम के बिना जीवों का अन्य और कोई धन नहीं है। हरिनाम के द्वारा ही जगाई व माधाई शुद्ध हो गये। वे दोनों बहुत बड़े पापी थे। क्यों व्यर्थ माया में आबद्ध होकर अपने जीवन को बिता रहे हो। माया में फंसकर ही मैं-मेरा, मैं- मेरा, कहते रहते हो। आशाओं के गुलाम बनकर इस प्रकार भ्रमण करते-करते और कहाँ तक जाओगे। याद रखना इन आशाओं की कहीं भी समाप्ति नहीं है। हरि-हरि कहकर इन आशाओं के मुँह पर राख दे मारो। भाई, निराशा ही तो सुख है। भोग व मोक्ष की कामना छोड़कर, शुद्ध-सात्त्विकता को ग्रहण करते हुए हरिनाम गाओ। दुनियावी तुच्छ नाशवान फलों के लिए ज्यादा दौड़-भाग मत करो, हरिनाम करो। हरिनाम के प्रभाव से ये सांसारिक फल तो बिना मांगे ही मिल जाते हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि क्यों तुम इन नाम-अपराधों को ढो रहे हो अर्थात् क्यों तुम नामापराध कर रहे हो — इन नामापराधों को छोड़ दो।