Bhajana Gīti
Kirtan

जीव जाग, जीव जाग

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
Guru TattvaMahaprabhuHarinamBhakti
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जीव जाग, जीव जाग, गोराचाँद बले।कत निद्रा याओ माया-पिशाचीर कोले॥ 1॥
भजिब बलिया एसे’ संसार भितरे।भुलिया रहिले तुमि अविद्यार भरे ॥ 2॥
तोमारे लइते आमि हैनु अवतार।आमि बिना बन्धु आर के आछे तोमार॥ 3॥
एनेछि औषधि माया नाशिवार लागि’।हरिनाम - महामन्त्र लओ तुमि मागि’॥ 4॥
भक्तिविनोद प्रभु चरणे पड़िया।सेइ हरिनाम - मन्त्र लइल मागिया ॥ 5॥

महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव जी माया से ग्रसित जीवों को सम्बोधन करते हुए कहते हैं — हे जीव! जागो! हे जीव! जागो! मायारूपी पिशाची की गोद में और कितनी नींद सोओगे? जन्म के समय तुम प्रतिज्ञा करके आये थे कि संसार में जाकर मैं आपका भजन करूँगा परन्तु अविद्या के प्रभाव से तुम सब भूल गये हो। तुम्हें अपने धाम में ले जाने के लिये ही मैंने अवतार लिया है। मुझे छोड़कर इस संसार में तुम्हारा और कौन बन्धु है? माया को नाश करने के लिये अर्थात् माया के चंगुल से छुड़ाने के लिये मैं हरिनाम-महामन्त्र रूपी औषधि लेकर आया हूँ, तुम उसे माँग लो। उसी हरिनाम-महामन्त्र औषधि को श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने श्रीमन् महाप्रभु जी के चरणों में पड़कर माँग लिया।

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