महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव जी माया से ग्रसित जीवों को सम्बोधन करते हुए कहते हैं — हे जीव! जागो! हे जीव! जागो! मायारूपी पिशाची की गोद में और कितनी नींद सोओगे? जन्म के समय तुम प्रतिज्ञा करके आये थे कि संसार में जाकर मैं आपका भजन करूँगा परन्तु अविद्या के प्रभाव से तुम सब भूल गये हो। तुम्हें अपने धाम में ले जाने के लिये ही मैंने अवतार लिया है। मुझे छोड़कर इस संसार में तुम्हारा और कौन बन्धु है? माया को नाश करने के लिये अर्थात् माया के चंगुल से छुड़ाने के लिये मैं हरिनाम-महामन्त्र रूपी औषधि लेकर आया हूँ, तुम उसे माँग लो। उसी हरिनाम-महामन्त्र औषधि को श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने श्रीमन् महाप्रभु जी के चरणों में पड़कर माँग लिया।