Bhajana Gīti
Kirtan

प्रातःकालीय कीर्त्तन

Bhaktivinoda Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuHarinamBhakti
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उदिल अरुण पूरवभागे, द्विजमणि गोरा अमनि जागे,भक्त समूह लइया साथे, गेला नगर - व्राजे ।ताथइ-ताथइ बाजल खोल, घन-घन ताहे झाँजेर रोल,प्रेमे ढलढल सोणार अंग, चरणे नूपुर बाजे॥ 1॥
मुकुन्द माधव यादव हरि, बलरे बलरे वदन भरि’,मिछे निदवशे गेलरे राति, दिवस शरीर साजे।एमन दुर्लभ मानव देह, पाइया कि कर भावना केह,एबे ना भजिले यशोदा-सुत, चरमे पड़िबे लाजे॥ 2॥
उदित तपन हइले अस्त, दिन गेल बलि’ हइबे व्यस्त,तबे केन एबे अलस हइ’, ना भज हृदयराजे।जीवन अनित्य जानह सार, ताहे नानाविध विपदभार,नामाश्रय करि यतने तुमि, थाकह आपन काजे॥ 3॥
कृष्णनाम-सुधा करिया पान, जुड़ाओ भक्ति विनोद-प्राण,नाम बिना किछु नाहिक आर, चौद्दभुवन माझे।जीवेर कल्याण साधन काम, जगते आसि’ ए मधुर नाम,अविद्या तिमिर तपनरूपे हृद्गगने विराजे॥ 4॥

पूर्व दिशा में अरुणोदय हो गया और द्विजमणि श्रीगौरहरि ने अपनी जागरण की लीला कर ली तथा बहुत से भक्तों को साथ लेकर नगर-भ्रमण को चले गये। ताथई-ताथई शब्द करते हुये मृदंगों का शब्द होने लगा। घन-घन करके झाँझों (एक प्रकार का बड़ा करताल) का शब्द होने लगा तथा सोने के समान अंगों वाले श्रीगौरहरि के श्रीअंग प्रेम में झूम रहे हैं तथा चरणों में नूपुरों की झंकार हो रही है। (1) मुकुन्द, माधव,यादव व हरि आदि भगवद्-नामों का खूब उच्चारण करो। व्यर्थ में तुम अपनी रात्रि सोने में व दिन शरीर को सजाने में गुज़ार देते हो, इस प्रकार के दुर्लभ मानव देह को पाकर तुम क्या कर रहे हो — क्यों नहीं सोचते हो? यदि अभी यशोदानन्दन श्रीकृष्ण का भजन नहीं किया तो अन्त में लज्जित होना होगा अर्थात् तुम्हें स्वयं पर शर्म आयेगी कि क्या करना था और मूर्ख की तरह क्या करते रहे। (2) जब दिन चला जायेगा, सूर्य अस्त हो जायेगा तब तुम कहोगे कि सारा दिन व्यस्तता-व्यस्तता में ही चला गया। तब, अब क्यों आलस्य करते हो, क्यों अपने हृदयराज — नन्दनन्दन श्रीकृष्ण का भजन नहीं करते? मैं निचोड़ बात तुमको बताता हूँ, समझ लो — सार बात यह है कि तुम्हारा ये जीवन अनित्य है तथा इसमें नाना प्रकार की आपत्तियाँ-विपत्तियाँ हैं, अतः यत्न के साथ तुम हरिनाम का आश्रय करो और अपना कार्य करते रहो। (3) भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि तुम कृष्णनाम सुधा का पान करके मेरे प्राणों को शीतलता प्रदान करो — हरिनाम के बिना इस सारे त्रिभुवन में और कुछ भी कल्याणकारक नहीं है। जीवों का कल्याण करने के उद्देश्य से ही ये मधुर हरिनाम इस जगत् में अवतीर्ण हुये हैं परन्तु मेरी अवस्था ये है कि मेरे हृदय रूपी आकाश में तो अविद्या रूपी घनघोर अन्धेरा छाया हुआ है और मुझे तापित कर रहा है। (4)

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