Kirtan
संकीर्तन हैते
Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition1 min read
KrishnaRadhaHarinamBhakti
संकीर्तन हैते पाप - संसार नाशन।चित्तशुद्धि, सर्वभक्ति - साधन - उद्गम॥
कृष्ण प्रेमोद्गम, प्रेमामृत आस्वादन।कृष्ण प्राप्ति सेवामृत - समुद्रे- मज्जन॥
ये रूपे लइले नाम प्रेम उपजय।तार लक्षण-श्लोक शुन स्वरूप, रामराय॥
अविश्रान्त नामे, नाम - अपराध जाय।ताहे अपराध कभु स्थान नाहि पाय॥
बल कृष्ण, भज कृष्ण, गाओ कृष्ण-नाम।कृष्ण बिनु केह किछु ना भाविह आन॥
कि भोजने कि शयने किवा जागरणे।अहर्निश चिन्त कृष्ण बलह वदने॥
ग्राम्यकथा ना शुनिबे, ग्राम्यवार्ता ना कहिबे।भाल ना खाइबे आर भाल ना परिबे॥
अमानी मानद हञा कृष्ण नाम सदा लबे।व्रजे राधाकृष्ण सेवा मानसे करिबे॥
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
एतावानेव लोकेऽस्मिन पुंसां धर्मः परः स्मृतः।भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥