Bhajana Gīti
Kirtan

दयाल निताई चैतन्य

Locana Dāsa Ṭhākura2 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaBhakti
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दयाल निताई चैतन्य ब’ले नाचरे आमार मन।(एक बार) नाचरे आमार मन, नाचरे आमार मन॥
(एमन दयाल तो नाइ हे, मार खेये प्रेम देय)।(ओरे) अपराध दूरे यावे पावे प्रेमधन ॥
(ओ नामे अपराध विचार तो नाइ हे)।(तखन) कृष्णनामे रुचि ह’वे घुचिबे बन्धन॥
(कृष्ण नामे अनुराग तो ह’बे हे)।(तखन) अनायासे सफल हबे जीवेर जीवन॥
(कृष्णरति — बिना जीवन तो मिछे हे)।(शेषे) वृन्दावने राधा श्यामेर पावे दरशन॥
दयालु नित्यानन्द प्रभु व श्रीचैतन्य महाप्रभु जी का नाम उच्चारणकरके हे मेरे मन! तू नृत्य कर। ऐ मेरे मन! तू नृत्य कर, तू नृत्य कर। सारीदुनियाँ में ऐसा दयालु और कोई नहीं है जो स्वयं मार खाकर भी प्रेम प्रदान करे।ऐसा करने से तेरे पिछले सारे अपराध खत्म हो जायेंगे और तुझे भी उस कृष्ण-प्रेम धन की प्राप्ति हो जायेगी। एक और विशेषता इन नामों की है — वह ये किइनमें अपराध का भी विचार नहीं है। तब तुम्हारी कृष्ण नाम में रुचि होगी औरसारे बन्धन खत्म हो जायेंगे। कृष्ण नाम में अनुराग भी होगा और तब अनायासमें ही जीवन सफल हो जायेगा। श्रीकृष्ण में यदि रति-मति न हो तो इसके बिनाजीवन तो बेकार है जबकि दूसरी ओर यदि तुम गौर-नित्यानन्द नाम का कीर्त्तनकरोगे तो गौर-कृपा होने से परिणाम में तुम्हें वृन्दावन में श्रीराधा-श्यामसुन्दरजी के दर्शन होंगे।श्रीगौर-नित्यानन्देर दयापरम करुण, पँहु दुइजन, निताइ गौरचन्द्र।सब अवतार-सार-शिरोमणि, केवल आनन्द-कन्द॥ 1॥
भज भज भाई, चैतन्य निताइ, सुदृढ़ विश्वास करि।विषय छाड़िया, से रसे मजिया, मुखे बल हरि हरि॥ 2॥
देख ओरे भाइ, त्रिभुवने नाइ, एमन दयाल दाता।पशु पाखी झुरे, पाषाण विदरे, शुनि’ यार गुणगाथा॥ 3॥
संसारे मजिया, रहिलि पड़िया, से पदे नहिल आश।आपन करम, भुञ्जाये शमन, कहये लोचनदास॥ 4॥

श्रीनित्यानन्द प्रभु व श्रीगौरचन्द्र जी दोनों ही परम करुणामय हैं। वे सभी अवतारों के मूल शिरोमणि व केवल आनन्दकन्द हैं। (1) हे भाई! तुम अवश्य ही सुदृढ़ विश्वास के साथ श्रीचैतन्य महाप्रभु व श्रीनित्यानन्द प्रभु का भजन करो। विषय भोगों को छोड़कर उस अप्राकृत रस में निमग्न होकर मुख से हरि-हरि उच्चारण करो। (2) देखो भाई! इस सारे त्रिभुवन में इस प्रकार का दयालु व इस प्रकार का दाता नहीं है। इनका गुणगान सुनकर तो पशु-पक्षी भी प्रेम विह्वल हो उठते हैं तथा पत्थर भी पिघल जाते हैं। (3) तुम तो संसार में प्रमत्त हुये पड़े हो। तुम्हें तो ज़रा सी भी उन पादपद्मों की अभिलाषा नहीं है। लोचन दास जी कहते हैं कि तुम्हारे सभी कर्मों को काल तुमसे भुगवायेगा।(4)

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