Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीहरिवासरे हरिकीर्तन

Vṛndāvana Dāsa Ṭhākura3 min read
KrishnaMahaprabhuNityanandaHarinamJagannathBhakti
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श्रीहरिवासरे हरिकीर्तन विधान।नृत्य आरम्भिला प्रभु जगतेर प्राण॥
पुण्यवन्त श्रीवास-अंगने शुभारम्भ।उठिल कीर्त्तन ध्वनि गोपाल गोविन्द॥
मृदंग मन्दिरा बाजे शंख करताल।संकीर्त्तन संगे सब हइल मिशाल॥
ब्रह्माण्डे भेदिल ध्वनि पूरिया आकाश।चौदिकेर अमंगल जाय सर्वनाश॥
चतुर्दिके श्रीहरि मंगल संकीर्त्तन।मध्ये नाचे जगन्नाथ मिश्रेर नन्दन॥
सबार अंगेते शोभे श्रीचन्दन माला।आनन्दे गायेन कृष्णरसे हइ’ भोला॥
निजानन्दे नाचे महाप्रभु विश्वम्भर।चरणेर ताल शुनि अति मनोहर॥
भावावेशे माला नाहि रहये गलाय।छिण्डिया पड़ये गिया भक्तेर गाय॥
याँर नामानन्दे शिव वसन ना जाने।याँर रसे, नाचे शिव से नाचे आपने॥
याँर नामे वाल्मीकि हइला तपोधन।याँर नामे अजामिल पाइल मोचन॥
याँर नाम श्रवणे संसार-बन्ध घुचे।हेन प्रभु अवतरि कलियुगे नाचे॥
याँर नाम गाई शुक नारद बेड़ाय।सहस्त्र वदन - प्रभु यार गुण गाय॥
सर्वमहाप्रायश्चित ये प्रभुर नाम।से प्रभु नाचये देखे यत भाग्यवान्॥
श्रीकृष्ण चैतन्य नित्यानन्द चाँद जान।वृन्दावन दास प्रभु पदयुगे गान॥

हरिवासर तिथि को अर्थात् एकादशी तिथि को श्रीहरि-संकीर्तन का ही विधान है, इसलिये जगत् के प्रभु श्रीगौरहरि ने पुण्यवन्त श्रीवास के आंगन में नृत्य आरम्भ किया। जब श्रीवास आंगन में कीर्त्तन आरम्भ हुआ तो ‘गोपाल- गोविन्द’ ध्वनि दसों-दिशाओं में मुखरित हो उठी। संकीर्तन में मृदंग बज रहे हैं, मन्दिरा (छोटे छोटे करताल) बज रहे हैं तो शंख व करतालों की भी ध्वनियाँ हो रही हैं। जब कीर्त्तन आरम्भ हुआ तो उस संकीर्त्तन में सभी आकर सम्मिलित हो गये तथा संकीर्त्तन ध्वनि से सारा आकाश गूँज उठा। लगता था ध्वनि, ब्रह्माण्ड भेद कर जा रही हो। संकीर्त्तन से चारों दिशाओं में अमंगल समूल नष्ट हो रहा था। चारों ओर जो श्रीहरि का मंगलमय संकीर्त्तन हो रहा था उसमें अनेकों भक्तों के बीच श्रीजगन्नाथमिश्र नन्दन श्रीगौरहरि नृत्य कर रहे हैं। सभी के अंगों पर चन्दन व मालायें सुशोभित हो रही हैं तथा सभी परमानन्द में निमग्न होकर गा रहे हैं। अपने ही आनन्द में महाप्रभु विश्वम्भर नाच रहे हैं, जिनके चरणों की ताल सुनने में अति मनोहर लग रही थी। भावावेश में उनके गले में माला नहीं टिक रही थी, वह टूट-टूट कर भक्तों के ऊपर गिर रही थी। जिनके नामानन्द में नृत्य करते हुए शिवजी महाराज को अपने वस्त्रों की होश नहीं रहती, वे स्वयं गौरहरि जी ही अपने नाम के आनन्द में नृत्य कर रहे हैं। जिनके नाम के प्रभाव से वाल्मीकि जी महातपस्वी बन गये, जिनके नाम से अजामिल का उद्घार हो गया, जिनका नाम श्रवण करने से संसार-बन्धन खत्म हो जाता है — वही प्रभु इस कलियुग में अवतरित होकर नृत्य कर रहे हैं। जिनका नाम गाते हुये शुकदेव जी व नारद जी भ्रमण करते रहते हैं, सहस्र मुख वाले शेष जी जिनका गुणगान गाते रहते हैं, जिनका नाम तमाम पापों का महा-प्रायश्चित है, वे प्रभु आज स्वयं ही नृत्य कर रहे हैं और तमाम भाग्यवान लोग उसका दर्शन कर रहे हैं। श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु तथा श्रीनित्यानन्द प्रभु ही जिनके जीवन प्राण हैं, वही वृन्दावन दास ठाकुर जी अपने दोनों प्रभुओं के युगल-चरणों के सान्निध्य में उनकी लीलायें गान करते हैं।

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