कब मेरी ऐसा दशा होगी जब मैं तमाम जड़ीय आशाओं को छोड़कर, नाना प्रकार के बन्धनों वाले इस घोर संसार को छोड़ दूँगा। (1) वृन्दावन से अभेद जो नवद्वीप धाम है, वहाँ पर एक कुटिया का निर्माण करके शचीनन्दन श्रीगौरहरि जी के श्रीचरणों के आश्रय में रहूँगा तथा उन्हीं से अपना सभी प्रकार का सम्बन्ध जानूंगा। (2) जाह्नवी पुलिन के चिन्मय कानन में एकान्त स्थान पर बैठ कर निरन्तर कृष्ण-नामामृत का पान करूँगा तथा गौरांग नाम लेकर उन्हें उच्च स्वर से पुकारूँगा। (3) हे गौरहरि! हे नित्यानन्द प्रभु! आप दोनों भाई तो पतितों के बन्धु हैं और मैं अधम हूँ, पतित हूँ, दुर्जन हूँ, इसलिये मेरे प्रति आप अपना कृपा-सिन्धु रूप प्रकाशित कीजिये अर्थात् मुझ अधम-पतित व दुर्जन व्यक्ति पर कृपा कीजिये। (4) आपकी कृपा पाकर मैं प्रेम-विह्वल होकर सोलह कोसमय जो धाम है, वहाँ गंगा जी के दोनों ओर प्रेम में क्रन्दन करते- करते भ्रमण करूँगा और इस प्रकार भ्रमण करते-करते कभी भाग्य-फल से, यदि किसी वृक्ष के नीचे आपकी मनोहर लीला की एक झलक भी मिल जायेगी तो हा! हा! क्या मनोहर मैंने देखा — ऐसा कहकर मूर्च्छित हो जाऊँगा और जब मेरी मूर्च्छा हटेगी, मुझे ज्ञान होगा, तब मैं आप दोनों की कृपा को स्मरण कर-करके एकान्त में रोता रहूँगा। (5-6) ओहे! प्रमेर ठाकुर गोरा! प्राणेर यातना, किबा कब नाथ! ह’येछि आपन हारा। कि आर बलिब, ये काजेर तरे, एनेछिले नाथ! जगते आमारे, एत दिन परे, कहिते से कथा, खेदे दुःखे हइ सारा। तोमार भजने, ना जन्मिल रति, जड़ मोहे मत्त, सदा दुरमति, विषयीर काछे, थेके-थेके आमि, हइनु विषयी पारा। के आमि केन ये, एसेछि एखाने, से कथा कखनो, नाहि भाबि मने, कखनो भोगेर, कखनो त्यागेर, छलनाय मन नाचे। कि गति हइबे, कखनो भाबिना, हरि भक्तेर, काछेओ याइना, हरि विमुखेर, कु-लक्षण यत, आमातेइ सब आछे। श्रीगुरु कृपाय, भेंगेछे स्वपन, बुझेछि एखन, तुमिइ आपन, तव निज-जन, परम बान्धव, संसार कारागारे। आर ना भजिब भक्त पद बिनु, (ऐ) रातुल चरणे, शरण लइनु, उद्धार’ हे नाथ! मायाजाल ह’ते, ए दासेरे केशे धरे’। पातकीरे तुमि, कृपा कर नाकि? जगाइ माधाइ, छिल ये पातकी, ताहाते जेनेछि, प्रेमेर ठाकुर! पापीकेओ ता’र तुमि। आमि भक्तिहीन, दीन अकिन्चन, अपराधी शिरे दाओ दु’चरण, तोमार अभय, श्रीचरणे चिर, शरण लइनु आमि। प्रेम के ठाकुर हे गौरहरि। इस दुनियाँ में मिलने वाली यातनाओं के बारे में मैं क्या बताऊं, मैंने तो अपने आपको ही खो दिया। और क्या बताऊँ नाथ! जिस कार्य के लिये आप मुझे जगत् में लाये थे, इतने दिन बाद उसके बारे में कहते हुये मुझे अत्यन्त खेद हो रहा है — आपके भजन में ज़रा सी भी रति उदित नहीं हुई। मैं दुर्गति हमेशा ही जड़ीय मोह में मत्त रहा। विषयी लोगों के पास रहते-रहते मैं घोर विषयी हो गया हूँ। मैं कौन हूँ तथा किसलिए मैं यहाँ आया हूँ ? — इस बारे में मैंने कभी भी मन में सोचा ही नहीं। मेरा मन तो बस कभी भोग, तो कभी त्याग की छलना में नाचता रहता है। मेरी क्या गति होगी — इस बारे में भी मैंने कभी सोचा नहीं, न कभी मैं हरि-भक्तों के पास ही जाता हूँ। हरि के विमुख व्यक्ति के जो-जो कु-लक्षण होते हैं, वे सब के सब मुझमें ही घर किये बैठे हैं। श्रीगुरु कृपा से अब मेरा स्वप्न भंग हुआ और अब समझ में आया कि सिर्फ आप ही मेरे अपने हो तथा आपके निज-जन ही इस संसार कारागार में परम- बान्धव हैं। मैंने संकल्प लिया है कि अब मैं भक्तों के चरणों को छोड़ कर और किसी की भी सेवा नहीं करूँगा। इन रातुल चरणों में अब मैंने शरण ले ली है। इसलिए हे नाथ! अब आप मुझे केशों से पकड़ कर इस मायाजाल से मेरा उद्घार कीजिये। पापी व्यक्ति पर आप कृपा नहीं करते क्या? लेकिन जगाई-माधाई भी तो पापी ही थे। उन पर हुई कृपा से ही मालूम हुआ कि हे प्रेम के ठाकुर! आप पापियों का भी उद्घार करते हो। मैं भक्तिहीन, दीन, अकिंचन हूँ। आप कृपा करके इस अपराधी के सिर पर अपने दोनों श्रीचरण रख दो, आपके अभय श्रीचरणों में मैंने चिरकाल के लिये शरण ले ली है।