Bhajana Gīti
Kirtan

कि रूपे पाइव

Narottama Dāsa Ṭhākura1 min read
KrishnaMahaprabhuNityanandaBhakti
PDF
कि रूपे पाइव किछु ना पाइ सन्धान।प्रभु-लोकनाथ पद नाहिक स्मरण॥
तुमि त दयाल प्रभु! चाह एकबार।नरोत्तम हृदयेर घुचाओ अन्धकार॥

हे श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु! आपकी जय हो। हे श्रीनित्यानन्द प्रभु! आपकी जय हो। हे श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु! आपकी जय हो? हे गौर भक्तवृन्द! आपकी जय हो। आप सभी कृपा करके मुझ पर करुणा कीजिये। मुझ अधम-पतित से घृणा न करना। बहुत सोच-विचार कर मैंने यह अनुभव किया है कि इस त्रिभुवन में आपके श्रीचरण ही सार-वस्तु हैं, इनके इलावा मेरी और कोई गति नहीं है। इन चरणों को पाने के लिये ही मेरे मन में व्यथा होती है और इन्हीं के लिये ये हृदय व्याकुल होकर क्रन्दन करता रहता है। इन चरणों की प्राप्ति कैसे होगी, इसका कोई अनुसन्धान नहीं मिलता। लोकनाथ प्रभु के चरणों का भी स्मरण नहीं होता। श्रीनरोत्तम दास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आप तो दयालु हैं, एक बार आप मेरी ओर निहारिये और मेरे हृदय का तमाम अन्धकार दूर कर दीजिये। गाय गोरा मधुर स्वरे।

Continue the Journey