अहो! कब ऐसा होगा, जब मैं भोजन के समय व शयनादि के समय अर्थात् हर समय गौरांग महाप्रभु जी का नाम उच्चारण करता रहूँगा और विरक्त होकर इस देह का यत्न छोड़ दूँगा। नवद्वीपधाम में, नगर-नगर में सारे जड़ीय अभिमानों को छोड़ कर धामवासियों के घर से माधुकरी लेकर पेट भर कर खाऊँगा। नदी के किनारे जाकर अन्जलि भर-भर कर प्रभु-पद-जल अर्थात् गंगा-जल का पान करूँगा तथा वृक्ष के नीचे निरालस्य भाव से रह कर शारीरिक बल भी पाऊँगा। अति-आर्ति के साथ ‘श्रीगौर-गदाधर’, ‘श्रीराधा- माधव’ आदि नामों को रोते-रोते उच्च स्वर से पुकारूँगा और सभी धामों का भ्रमण करूँगा। वैष्णवों का दर्शन करते ही उन्हें अपना हृदय-बन्धु समझ कर उनके चरणों में पड़ जाऊँगा। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि वैष्णव लोग ही मुझे अपना दास समझ कर श्रीमन् महाप्रभु जी के कीर्तन में अधिकार प्रदान करेंगे।