Bhajana Gīti
Kirtan

कबे आहा गौरांग

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuHarinamBhakti
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कबे आहा गौरांग बलिया।भोजन शयने, देहेर यतने, छाड़िब विरक्त हइया॥
नवद्वीप - धामे, नगर े- नगरे, अभिमान परिहरि’।धामवसि - घरे, माधुकरी ल’व, खाइब उदर भरि॥
नदीतटे गिया, अन्जली - अन्जली, पिव प्रभु-पदजल।तरुतले पड़ि’, आलस्य त्यजिव, पाइब शरीरे बल॥
काकुति करिया, ‘गौर-गदाधर’ ‘श्रीराधामाधव’ नाम।काँदिया-काँदिया, डाकि’ उच्चरवे, भ्रमिव सकल धाम॥
वैष्णव देखिया, पड़िव चरणे, हृदयेर बन्धु जानि।वैष्णव ठाकुर, प्रभुर कीर्तन, देखाइवे दास मानि’॥

अहो! कब ऐसा होगा, जब मैं भोजन के समय व शयनादि के समय अर्थात् हर समय गौरांग महाप्रभु जी का नाम उच्चारण करता रहूँगा और विरक्त होकर इस देह का यत्न छोड़ दूँगा। नवद्वीपधाम में, नगर-नगर में सारे जड़ीय अभिमानों को छोड़ कर धामवासियों के घर से माधुकरी लेकर पेट भर कर खाऊँगा। नदी के किनारे जाकर अन्जलि भर-भर कर प्रभु-पद-जल अर्थात् गंगा-जल का पान करूँगा तथा वृक्ष के नीचे निरालस्य भाव से रह कर शारीरिक बल भी पाऊँगा। अति-आर्ति के साथ ‘श्रीगौर-गदाधर’, ‘श्रीराधा- माधव’ आदि नामों को रोते-रोते उच्च स्वर से पुकारूँगा और सभी धामों का भ्रमण करूँगा। वैष्णवों का दर्शन करते ही उन्हें अपना हृदय-बन्धु समझ कर उनके चरणों में पड़ जाऊँगा। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि वैष्णव लोग ही मुझे अपना दास समझ कर श्रीमन् महाप्रभु जी के कीर्तन में अधिकार प्रदान करेंगे।

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