कबे गौर-वने, सुरधुनी-तटे, हा राधे हा कृष्ण, बले।काँदिया बेड़ाव, देह-सुख छाड़ि, नाना लता-तरुतले ॥ 1॥
श्वपच - गृहेते, मागिया खाइब, पिव सरस्वती-जल।पुलिने-पुलिने, गड़ागड़ि दिव, करि कृष्ण-कोलाहल॥ 2॥
धामवासि जने, प्रणति करिया, मागिव कृपार लेश।वैष्णव-चरण-रेणु गाय माखि, धरि अवधूत-वेश॥ 3॥
गौड़-व्रज-जने, भेद ना देखिव, हइब वरजवासी।धामेर स्वरूप, स्फुरिवे नयने, हइब राधार दासी॥ 4॥
कब गौर वन में, गंगा के किनारे नाना प्रकार के वृक्ष लताओं के नीचे, देह सुख की परवाह छोड़कर हा राधे! हा कृष्ण! उच्चारण करके रोता हुआ भ्रमण करूँगा। (1) चाण्डाल के घर से मांगकर खाऊँगा, सरस्वती जल पान करूँगा तथा पुलिन-पुलिन में कृष्ण-कृष्ण कह कर लोटपोट होऊँगा? (2)
धामवासियों को प्रणाम करके उनसे कृपा का लेश माँगूंगा तथा वैष्णव चरण- रेणु को अपने शरीर में मलकर अवधूत वेश धारण करूँगा। (3) गौड़ धाम तथा व्रज धाम में भेद नहीं देखूँगा, व्रजवासी होऊँगा तथा धाम का स्वरूप मेरे नयनों में स्फुरित होगा एवं राधा की दासी होऊँगा। (4)