Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु जीवे

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuBhakti
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श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु जीवे दया करि ।स्वपार्षद स्वीय धाम सह अवतरि ॥ 1॥
अत्यन्त दुर्लभ प्रेम करिवारे दान ।शिखाय शरणागति भकतेर प्राण ॥ 2॥
दैन्य, आत्मनिवेदन, गोप्तृत्वे वरण।‘अवश्य रक्षिबे कृष्ण’— विश्वास पालन ॥ 3॥
भक्ति - अनुकूलमात्र कार्येर स्वीकार।भक्ति-प्रतिकूल-भाव वर्जन-अंगीकार ॥ 4॥
षडंग शरणागति हइबे याँहार।ताँहार प्रार्थना शुने श्रीनन्दकुमार ॥ 5॥
रूप - सनातन - पदे दन्ते तृण करि’।भक्तिविनोद पड़े दुई पद धरि’ ॥ 6॥
काँदिया काँदिया बले आमि त’अधम।शिखाये शरणागति करहे उत्तम ॥ 7॥

श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जी जीवों पर दया परवश होकर अपने पार्षदों एवं अपने धाम के साथ अवतीर्ण हुए।(1) श्रीचैतन्य महाप्रभु जी जीवों को अत्यन्त दुर्लभ प्रेम का दान करने के लिये ही अवतीर्ण हुए, इसलिये वे, भक्ति की जो प्राण है — शरणागति, उसकी शिक्षा देते हैं।(2) दीनता, आत्मनिवेदन करना, भगवान को अपने पालन-कर्ता के रूप में वरण करना, श्रीकृष्ण मेरी अवश्य रक्षा करेंगे, ऐसा दृढ़ विश्वास रखना, एवं भगवद्-भक्ति के जो अनुकूल कार्य हैं, उन्हें स्वीकार करना तथा भक्ति के प्रतिकूल भावों को छोड़ना।(3-4) छः अंगों वाली शरणागति जिनकी होगी, उनकी प्रार्थना को ही श्रीनन्दनन्दन भगवान सुनेंगे।(5) श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी श्रीरूप गोस्वामी प्रभु जी व श्रीसनातन गोस्वामी जी के चरणों में दाँतों में तिनका लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता के साथ गिर जाते हैं और रोते-रोते प्रार्थना करते हैं कि मैं तो अधम हूँ, शरणागति की शिक्षा देकर मुझे उत्तम बना दीजिये।(6-7)

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