Bhajana Gīti
Kirtan

उच्छ्वास

Locana Dāsa Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuBhakti
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कबे श्रीचैतन्य मोरे करिबेन दया।कबे आमि पाइब वैष्णव-पद छाया॥ 1॥
कबे आमि छाड़िब ए विषयाभिमान।कबे विष्णुजने आमि करिब सम्मान॥ 2॥
गलवस्त्र कृतान्जलि वैष्णव-निकटे।दन्ते तृण करि’ दाँड़ाइब निष्कपटे॥ 3॥
काँदिया काँदिया जानाइब दुःखग्राम।संसार अनल हैते मागिब विश्राम॥ 4॥
शुनिया आमार दुःख वैष्णव ठाकुर।आमा लागि’ कृष्णे आवेदिबेन प्रचुर॥ 5॥
वैष्णवेर आवेदने कृष्ण दयामय।ए हेन पामर प्रति हबेन सदय॥ 6॥
विनोदेर निवेदन वैष्णवचरणे।कृपा करि संगे लह एइ अकिन्चने॥ 7॥
श्रीचैतन्य महाप्रभु जी! आप मुझ पर कब कृपा करेंगे? कब मैं वैष्णवपदाश्रय ग्रहण करूँगा? कब मैं अपने विषयाभिमान को छोडूँगा तथा कब मैंविष्णु-जन अर्थात् वैष्णवों का सम्मान करूँगा? कब मैं गले में वस्त्र लेकर,हाथ जोड़कर व दान्तों में तृण लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता से वैष्णवों के पासउपस्थित होऊँगा? मैं रो-रोकर अपना दुःख उनके समक्ष ज्ञापन करूँगा औरसंसार रूपी आग से मुक्ति के लिए प्रार्थना करूँगा? वैष्णव ठाकुर मेरे दुःख कोसुनकर मेरे लिये कृष्ण से आवेदन करेंगे और वैष्णवों के द्वारा आवेदन करने सेश्रीकृष्ण इस प्रकार के पामर के प्रति अर्थात् मेरे प्रति सदय हो जायेंगे। श्रीलभक्तिविनोद जी वैष्णवों के चरणों में निवेदन करते हैं कि कृपा कर इस अकिन्चनको साथ ही ले लीजिये।अवतार-सार, गोरा अवतार, केन ना भजिलि ताँरे।करि’ नीरे वास, गेल ना पियास, आपन करम फेरे॥ 1॥
कन्टकेर तरु, सदाइ सेविलि (मन), अमृत पाइवार आशे।प्रेमकल्पतरु, श्रीगौरांग आमार, ताहारे भाविलि विषे ॥ 2॥
सौरभेर आशे, पलाश शुँकिलि (मन), नासाते पशिल कीट।इक्षुदण्ड’ भावि, काठ चुषिलि (मन), केमने पाइबि मिठ॥ 3॥
हार’ बलिया, गलाय परिलि (मन), शमन-किंकर साप।शीतल’ बलिया, आगुन पोहालि (मन), पाइलि वजर ताप॥ 4॥
संसार-भजिलि, श्रीगौरांग भुलिलि, ना शुनिलि साधुर कथा।इह-परकाल, दुकाल खोयालि (मन), खाइलि आपन माथा॥ 5॥

अवतारों के भी अवतारी हैं महाप्रभु गौरांगदेव जी, उनका भजन तूने क्यों नहीं किया? पानी में रहा पर तेरी प्यास न बुझी, ये तेरे अपने कर्मों का फेर है। अमृत पाने की इच्छा से काँटे वाले पेड़ की हमेशा सेवा की परन्तु प्रेम कल्पतरु जो मेरे गौरांग महाप्रभु जी हैं उनके प्रति तो तू ज़हर की सी भावना रखता था। सुगन्ध की आशा में पलाश फूल को सूंघ लिया और नाक में कीड़े घुस गये। गन्ना समझ कर लकड़ी को चूसने लगा तो भला उसने कैसे मीठा लगना था। हार समझ कर काल-सर्प को गले में पहन लिया तथा हे मन तूने शीतल समझ कर आग सेकी, जिससे भीषण ताप मिला। संसार का तो खूब भजन किया परन्तु श्रीगौरांग महाप्रभु जी को भूल गया। साधु की बात को सुना नहीं जिससे अपने वर्तमान को व भविष्य — दोनों को, तूने खो दिया और अपनी किस्मत को स्वयं ही खराब कर बैठा।

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