Bhajana Gīti
Kirtan

गोरा पँहु (आक्षेप)

Narottama Dāsa Ṭhākura1 min read
MahaprabhuBhakti
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गोरा पँहु ना भजिया मैनु ।प्रेम - रतन - धन हेलाय हाराइनु॥
अधने यतन करि धन तेयागिनु।आपन करम दोषे आपनि डुबिनु॥
सत्संग छाड़ि कैनु असते विलास।ते-कारणे लागिल ये कर्मबन्ध-फाँस॥
विषय विषम विष सतत खाइनु।गौर कीर्त्तन - रसे मगन ना हैनु॥
केन वा आछये प्राण कि सुख पाइया।नरोत्तमदास केन ना गेल मरिया॥

श्रीगौरांग जी के चरणों का मैंने भजन नहीं किया, प्रेम-रत्न-धन को लापरवाही में ही खो डाला। जो धन नहीं है उसके लिए मैंने प्रयत्न किया परन्तु असली धन को त्याग दिया। अपने कर्मों के दोष से अपने आप ही डूब गया हूँ। मैंने सत्संग को छोड़ कर असत् में विचरण किया, इसलिये मुझे कर्मबन्धन रूप फाँसी लग गयी। विषय रूप विष को मैंने निरन्तर खाया परन्तु गौर-कीर्त्तन रस में कभी मग्न नहीं हुआ। श्रीनरोत्तम दास ठाकुर जी कहते हैं कि मेरी समझ में नहीं आता है कि मुझमे प्राण क्यों बचे हुये हैं, इन्हें क्या सुख मिल रहा है? मैं मर क्यों नहीं गया?

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