Bhajana Gīti
Kirtan

सावरण-श्रीगौरमहिमा

Narottama Dāsa Ṭhākura1 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuBhakti
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गौरांगेर दुटिपद,यार धन सम्पद,से जाने भक्ति-रस-सार।गौरांगेर मधुर लीला,यार कर्णे प्रवेशिला।हृदय निर्मल भेल तार॥
जे गौरांगेर नाम लय,तार हय प्रेमोदय,तारे मुञि याइ बलिहारी।गौरांग-गुणेते झुरे,नित्यलीला तारे स्फुरे,से जन भकति-अधिकारी॥
गौरांगेर संगि-गणे,नित्यसिद्ध करि’ माने,से याय व्रजेन्द्र-सुत पाश।श्रीगौड़मण्डल भूमि,येवा जाने चिन्तामणि,तार हय ब्रजभूमे वास॥
गौरप्रेमसरसार्णवे,से तरंगे येवा डुबे,से राधामाधव अन्तरंग।गृहे वा वनेते थाके,हा गौरांग ब’ले डाके,नरोत्तम मांगे तार संग॥

श्रीगौरांग महाप्रभु जी के श्रीचरण युगल ही जिसकी धन-सम्पत्ति हैं, वह ही भक्तिरस के सार को जानता है। श्रीगौरांग महाप्रभु की मधुर लीला ने जिसके कानों में प्रवेश किया है, उसी का हृदय निर्मल हो गया। जो श्रीगौरांग महाप्रभु जी का नाम लेता है, उसके हृदय में प्रेमोदय हो उठता है, मैं उसके बलिहारी जाता हूँ। जो श्रीगौरांग महाप्रभु जी के गुणों से द्रवित हो उठता है, उसी के अन्तःकरण में भगवान की नित्यलीला का स्फुरण हो उठता है और वास्तव में वही भक्ति का अधिकारी है। श्रीगौरांग महाप्रभु के संगी-गणों को जो नित्य मानता है, वह व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण के पास पहुँच जाता है। श्रीगौड़मण्डल भूमि को जो चिन्तामणि की तरह समझता है,उसका ब्रजभूमि में वास होता है। गौर-प्रेमरस सागर की तरंगों में जो डूबता है, वह राधा-माधव जी का अन्तरंग जन होता है। चाहे कोई घर में रहे या वन में रहे, श्रीनरोत्तम दास ठाकुर जी कहते हैं कि यदि वह ‘हा गौरांग’ कह कर उच्च स्वर से पुकारता है तो मैं उसका संग चाहता हूँ।

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