श्रीगौरांग महाप्रभु जी के श्रीचरण युगल ही जिसकी धन-सम्पत्ति हैं, वह ही भक्तिरस के सार को जानता है। श्रीगौरांग महाप्रभु की मधुर लीला ने जिसके कानों में प्रवेश किया है, उसी का हृदय निर्मल हो गया। जो श्रीगौरांग महाप्रभु जी का नाम लेता है, उसके हृदय में प्रेमोदय हो उठता है, मैं उसके बलिहारी जाता हूँ। जो श्रीगौरांग महाप्रभु जी के गुणों से द्रवित हो उठता है, उसी के अन्तःकरण में भगवान की नित्यलीला का स्फुरण हो उठता है और वास्तव में वही भक्ति का अधिकारी है। श्रीगौरांग महाप्रभु के संगी-गणों को जो नित्य मानता है, वह व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण के पास पहुँच जाता है। श्रीगौड़मण्डल भूमि को जो चिन्तामणि की तरह समझता है,उसका ब्रजभूमि में वास होता है। गौर-प्रेमरस सागर की तरंगों में जो डूबता है, वह राधा-माधव जी का अन्तरंग जन होता है। चाहे कोई घर में रहे या वन में रहे, श्रीनरोत्तम दास ठाकुर जी कहते हैं कि यदि वह ‘हा गौरांग’ कह कर उच्च स्वर से पुकारता है तो मैं उसका संग चाहता हूँ।