क्रोध रहित एवं परमानन्द पूर्ण नित्यानन्द प्रभु अभिमान शून्य होकरनगर में भ्रमण कर रहे हैं। वे पतित जीवों के द्वार-द्वार पर जाकर हरिनाममहामन्त्र बांटते फिर रहे हैं। वे जिसको भी देखते हैं उससे दान्तों में तिनकालेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता से कहते हैं कि आप गौरहरि का भजन करो औरमुझे खरीद लो। इतना ही नहीं, ऐसा कहकर नित्यानन्द प्रभु प्रेमानन्द में विभोरहो जाते हैं तथा ज़मीन पर लोट-पोट होने लगते हैं। तब ऐसा लगता है मानोसोने का पर्वत ज़मीन पर लोट-पोट हो रहा हो। इस प्रकार के अवतार मेंजिसकी प्रीति उदित नहीं हुई, लोचन दास ठाकुर जी कहते हैं कि उसकीज़िन्दगी बेकार है। वह पापी तो समझो आया और गया।नदीया - गोद्रुमे नित्यानन्द महाजन ।पातियाछे नामहट्ट जीवेर कारण॥ 1॥
ज़िला नदिया के गोद्रुम धाम में महाजन श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु जी ने हरिनाम का बाज़ार खोल दिया है। वे जीवों को पुकार-पुकार कर कहते हैं — हे श्रद्धावान जन! हे श्रद्धावान जन!! भाईयो! मैं महाप्रभु जी की आज्ञा से आपके पास भीख माँगता हूँ — आप कृपा करके कृष्ण-कृष्ण कहिये, कृष्ण- भजन कीजिये तथा श्रीकृष्ण की जो शिक्षा है, उसे ग्रहण कीजिये।(1-2) अपराध शून्य होकर आप कृष्ण नाम लीजिये। कृष्ण ही माता हैं, कृष्ण ही पिता हैं तथा कृष्ण ही धन व प्राण-स्वरूप हैं।(3) आप तमाम प्रकार के अत्याचारों को छोड़कर कृष्ण-संसार कीजिये। जीवों पर दया करना व कृष्ण नाम करना — यही सभी धर्मों का सार है।(4)
निताई गुणमणि मेरे हैं, निताई गुणमणि मेरे हैं। इन्होंने कृष्ण-प्रेम की बाढ़ लाकर सारी पृथ्वी को उसमें डुबो दिया।(1) कृष्ण-प्रेम की बाढ़ लेकर नित्यानन्द प्रभु गौड़ देश में आये, जिस आनन्द में सारे भक्त डूब गये तथा जो दीन-हीन थे, वे भी उस प्रेम की बाढ़ में बह चले।(2) ब्रह्मा जी के लिए जो ‘कृष्ण-प्रेम’ दुर्लभ है वह प्रेम सभी को बाँट दिया। इन्होंने उससे दीन-हीन या पतितों को भी वन्चित नहीं रखा।(3) असीम करुणा-सागर नित्यानन्द प्रभु ने उस प्रेम के बाँध को तोड़ दिया जिससे वह कृष्ण-प्रेमामृत घर-घर में घुस गया।(4) लोचन दास जी कहते हैं कि इस प्रकार के दयालु-कृपालु जो मेरे नित्यानन्द प्रभु हैं, उनका जिसने भजन नहीं किया तो समझना होगा कि जानबूझ कर वह आत्म-हत्यारा बना।(5)
निताइ-पद-कमल, कोटि चन्द्र सुशीतल,ये छायाय जगत जुड़ाय।हेन निताइ बिने भाई, राधा कृष्ण पाइते नाइ,दृढ़ करि धर निताइर पाय॥
से सम्बन्ध नाहि यार, वृथा जन्म गेल तार,सेइ पशु बड़ दुराचार।निताइ ना बलिल मुखे, मजिल संसार सुखे,विद्याकुले कि करिबे तार॥
अहंकारे मत्त हइया, निताइ - पद पासरिया,असत्येरे सत्य करि’ मानि।निताइयेर करुणा हबे, ब्रजे राधा - कृष्ण पाबे,धर निताइर चरण दु’खानि॥
निताइयेर चरण सत्य, ताँहार सेवक नित्य,निताइ-पद सदा कर आश।नरोत्तम बड़ दुःखी, निताइ मोरे कर सुखी,राख रांगा-चरणेर पाश।।श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु जी के चरण-कमल करोड़ों चन्द्रमाओं के समानसुशीतल हैं। उनकी छाया में सारा संसार शीतलता प्राप्त करता है। ऐसेनित्यानन्द प्रभु के बिना, अरे भाई! श्रीराधा-कृष्ण की प्राप्ति नहीं हो सकती।अतः दृढ़तापूर्वक नित्यानन्द प्रभु के पादपद्मों का अवलम्बन करो। उन पादपद्मोंसे जिसका सम्बन्ध नहीं है, उसका जीवन तो व्यर्थ ही चला गया। वह तो पशुहै, बड़ा दुराचारी है। मुख से ‘निताइ’ उच्चारण नहीं किया और सांसारिक सुखोंमें ही मशगूल रहा तो उसकी विद्या व उसका कुल उसका क्या करेगा? अहंकारमें मत्त होकर नित्यानन्द प्रभु के पादपद्मों को भुला बैठा और असत्य को ही सत्यसमझे बैठा है। नित्यानन्द प्रभु की करुणा होगी तो ब्रज में श्रीराधा-कृष्ण कीप्राप्ति होगी, इसलिये नित्यानन्द प्रभु के श्रीचरणों को भली-भाँति पकड़ लो।नित्यानन्द प्रभु के श्रीचरण सत्य वस्तु हैं, उनके सेवक भी नित्य हैं। इसलियेनित्यानन्द प्रभु जी के पादपद्मों की ही सदा अभिलाषा करो। श्रीनरोत्तम ठाकुरजी कहते हैं कि मैं अति दुःखी हूँ। हे नित्यानन्द प्रभु! मुझे अपने अरुणवर्ण केश्रीचरणों के पास रख कर सुखी कर दीजिये।आरे भाई! भज मोर गौरांग चरण।ना भजिया मैनु दुखे, डुबि’ गृह-विष-कूपे,दग्ध कैल ए पाँच पराण॥
अरे भाई! मेरे गौरांग महाप्रभु जी के चरणों का भजन करो। दुःख की बात यह है कि मैंने उनका भजन नहीं किया और ज़हर के समान शरीर व शरीर सम्बन्धी भोगों में पड़ा रहा, जिसने मेरे पाँचों प्राणों को जला डाला। त्रिताप रूपी विषाग्नि में दिन-रात मेरा हृदय जलता रहता है, शरीर हमेशा अचेतन सा रहता है, सारी इन्द्रियाँ शत्रुओं के वश में हो गयीं हैं चूँकि श्रीगौर पादपद्मों को मैंने भुला दिया, इसलिये परम धन से वन्चित भी हो गया हूँ। श्रीगौरांग महाप्रभु जी ऐसे दयामय हैं कि जो परम दुर्मति थे, उनका भी इन्होंने उद्घार कर दिया और वे भी पतित-पावन बन गये। इसलिये सब लाज-भय छोड़ कर शरीर और मन से इनकी शरण ग्रहण करो। द्विज नटराज श्रीगौरांग महाप्रभु को अपने हृदय के मध्य बाँध लो तो फिर सांसारिक काल तुम्हारा क्या कर लेगा। श्रीनरोत्तम दास जी कहते हैं कि गौरांग महाप्रभु के समान और कोई नहीं है। ये तो भजन न करने वाले को भी प्रेमधन प्रदान कर देते हैं।